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ईरान में है औरतों को परदे में रखने का कानून
पहले ये वाला मामला कायदे से सुलटा लेते हैं तो आगे बढ़ते हैं. दरअसल ईरान में औरतों को हिजाब में रहने की हिदायत है. इसके लिए बाकायदा कानून है. चॉइस सिर्फ काले या किसी और डार्क कलर का हिजाब चुनने में हो सकती है. लेकिन बिना हिजाब के, गैर मर्द के सामने या पब्लिक प्लेस पर हाथ और चेहरे के अलावा कुछ न दिखे. नहीं तो 60 दिन की जेल या 70 कोड़े मारने की सजा मिलती है. लेकिन ये नियम बाहर से आने वाली राजकीय मेहमान औरतों पर लागू नहीं होता. सुषमा को कौन सजा देता. उन्होंने बस उनकी धार्मिक भावनाओं को न भड़काने की नीयत से ऐसा किया होगा. लेकिन सवाल ये है कि,क्या ईरान वाले दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हैं?
यही ईरानी राष्ट्रपति हैं हसन रुहानी, जो इसी साल जनवरी में इटली पहुंचे थे. इटली के प्राइम मिनिस्टर के साथ मटेयो रेनजी के साथ उनकी मीटिंग थी. मीटिंग रखी गई थी कैपिटलाइन म्यूजियम में. ये म्यूजियम ऐसा है कि यहां तमाम आदमकद स्कल्पचर सजे हुए हैं. पूरी तरह नंगे पुंगे. हसन रुहानी की धार्मिक भावनाएं आहत न हों. इसके लिए इन मूर्तियों को सफेद पटरों से कवर कर दिया गया था.
और जब इनके मंत्री विदेश जाते हैं तो?
ये तस्वीर देखो. फ्रांस की है. पेरिस में 28 जनवरी 2016 को ये मीटिंग थी. पीछे खड़े हैं फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद. ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी. आगे बैठे हैं फ्रांस के विदेश मंत्री लॉरेंट फैबिअस. और उनके साथ हिजाब लिए बैठी हैं ईरान की पर्यावरण मंत्री मासूमा इब्तेकार. फ्रांस में भी उनका हिजाब बरकरार है, जबकि फ्रांस में हिजाब गैरकानूनी है.
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ये फोटो मार्च 2006 की है. दाईं तरफ उस वक्त इलेक्शन जीती चिली की प्रेसिडेंट मिशेल बैशलेट हैं. बाईं तरफ हैं ईरान की वाइस प्रेसिडेंट फातिमा जवादी. और ये जगह है चिली की राजधानी सैन्टियागो.

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ये तस्वीर विएना की है. तारीख 13 सितंबर 2011. ईरान की वाइस प्रेसिडेंट नसरीन सुल्तानखाह ने विएना में न्यूज कॉन्फ्रेंस अटेंड की थी. हिजाब के साथ.

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तो ऐसा ही है जैसी ये तस्वीरें दिखाती हैं. अगर यह धार्मिक भावनाओं के सम्मान का मसला है तो यह हमेशा ईरान जैसे कट्टरपंथी मुस्लिम देश के पक्ष में ही क्यों होता है? उनके पुरुष-महिला नेता दूसरे देशों में जाते हैं तो अपनी पोशाकें क्यों नहीं बदलते? और अगर यह संस्कृति के सम्मान का मसला है, समरसता के भाव से घुलने-मिलने का भारतीय तरीका, तो क्या आप ऐसे ईरानी प्रतिनिधिमंडल की कल्पना कर सकते हैं जो साड़ी और कुर्ता पायजामा पहने हुए भारत आए?
हिजाब भारत में चॉइस है. महिलाएं चाहें तो पहनें, चाहे न पहनें. लेकिन ईरान में जहां हिजाब न पहनने पर कोड़े मारने की सजा है, उनकी धार्मिक भावनाएं हमारी चिंता के दायरे में क्यों हैं? और हैं तो यह चिंता एकतरफा क्यों है?













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