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पाकिस्तान में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने गुरुद्वारे में लगाया ताला, कहा- 'ये मस्जिद है'

पाकिस्तान सरकार की संस्था भी कट्टरपंथियों के साथ मिलकर सिखों को गुरुद्वारे में जाने नहीं दे रही

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लाहौर का ऐतिहासिक गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारु सिंह | फ़ाइल फोटो: फेसबुक

पाकिस्तान (Pakistan) के लाहौर (Lahore) में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने एक गुरुद्वारे पर ताला जड़ दिया है. जानकारी के मुताबिक अल्पसंख्यक समुदायों के पूजा स्थलों की देखरेख करने वाले पाकिस्तान सरकार के इवेक्यूइ ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ETPB) भी इसमें शामिल है. वो कट्टरपंथियों के साथ मिलकर गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारु सिंह में श्रद्धालुओं को नहीं जाने दे रहा रहा है.

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आजतक से जुड़े सतेंदर चौहान के मुताबिक मुस्लिम कट्टरपंथियों ने कहा है कि ये गुरुद्वारा नहीं, बल्कि एक मस्जिद है. और इसलिए ही गुरुद्वारे पर ताला लगाया गया है. इस घटना के बाद स्थानीय सिख समुदाय काफी नाराज है.

हालांकि, गुरुद्वारा शहीद गंज भाई तारु सिंह को मस्जिद बताने की ये पहली घटना नहीं है. करीब दो साल पहले भी ऐसा ही वाकया हुआ था, जब इस ऐतिहासिक गुरुद्वारे को मस्जिद बताया गया था. हालांकि तब भारत की ओर से पाकिस्तान के सामने कड़ा विरोध दर्ज कराया गया था. भारत ने कहा था कि गुरुद्वारा श्रद्धा का स्थान है और सिख समुदाय इसे पवित्र मानता है.

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वहीं, पाकिस्तान की एजेंसी डॉन की एक रिपोर्ट के मुताबिक लाहौर के इस गुरुद्वारा को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है. यहां हर दिन गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ किया जाता है. गुरुद्वारा शहीद गंज में गतिविधियां होती रहती हैं. इसमें सिख समुदाय के लोग शामिल होते हैं.

गुरुद्वारे को लेकर दोनों पक्षों का क्या कहना है?

आजतक के मुताबिक मुस्लिम कट्टरपंथियों का मानना है कि यह गुरुद्वारा कभी लाहौर के गवर्नर दारा शिकोह का प्रसिद्ध महल था, यहां मस्जिद थी जिसपर कब्जा करके गुरुद्वारा बना दिया गया. वहीं सिखों का मानना है कि हजारों निर्दोष लोगों को मरवाने वाले लाहौर के गवर्नर और मुगल साम्राज्य के प्रतिनिधि मीर मन्नू की इजाजत से इस गुरुद्वारे का निर्माण अलग से किया गया था.

सिखों का दावा है कि मीर मन्नू ने एक डील के तहत गुरुद्वारे के निर्माण की अनुमति दी थी. इस डील के अनुसार दीवान कौरा मल ने जब मीर मन्नू की मदद के लिए सहमति दी, तब उसने यहां एक गुरुद्वारा स्थापित करने की अनुमति दी थी. इसके बाद मीर मन्नू द्वारा कौरा मल को मुल्तान का प्रभार भी दिया गया था.

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