अगर ये लोग शांत नहीं होते हैं तो इन्हें थप्पड़ मार कर बाहर कर दीजिए. सबको बाहर निकालिए.

नागपुर रैली में नितिन गडकरी
कितना सही, कितना गलत आप जब कोई बात कहना चाहें और कोई आपकी बात सुने बिना टोक दे. फिर टोकता ही जाए, बोलता ही जाए, तो ज़ाहिर सी बात है कि कोई भी फ्रस्टिया जाएगा. बहुत से लोग शायद इस बात पर आपा भी खो बैठें. बहुत सीधी सी बात लगती है. पर नितिन गडकरी पब्लिक फिगर हैं. नेता हैं. उनके पास फ्रस्टियाने की, आपा खोने की लग्ज़री नहीं है. होनी भी नहीं चाहिए. क्योंकि जब आपने लोगों का नेतृत्व करने का फैसला लिया है. लोगों के प्रतिनिधि बने हैं. तो लोगों की हर एक आवाज़ सुनना भी आपका धर्म है. विदर्भ के विभाजन के लिए जो लोग परेशान हैं. नारे लगा रहे हैं. वो परेशान होंगे तभी न नारे लगा रहे हैं. गडकरी एक चिट्ठी मंगवा सकते थे कि बात क्या है. और क्या मांगें हैं? हालांकि शायद वे भाषण में यही बताना चाह रहे थे. पर नारे और थपड़ियाने की धमकी के बीच जो जरूरी संवाद था, वो बलि चढ़ गया.
पहले जब गडकरी ने लोगों को रोका था तो बहुत तारीफ हुई थी गडकरी अरविंद केजरीवाल के साथ एक कार्यक्रम में बैठे थे. केजरीवाल बोल रहे थे. वहां बैठी जनता केजरीवाल की खांसी का मजाक उड़ाने के लिए खांसने लगी. केजरीवाल ने जनता से शांत होने का निवेदन किया तो खांसियां और बढ़ गईं. तब गडकरी केजरीवाल के बचाव में आए.
उन्होंने जनता को टोका और कहा –
(केजरीवाल से) आप शुरू करिए. (जनता से) ज़रा शांत रहिए प्लीज़. सरकारी कार्यक्रम है, शांत रहिए.
बातें दोनों एक जैसी ही हैं. दोनों में ही नेताओं की बात काटकर उन्हें बोलने से रोका जा रहा है. पर एक तरफ जनता मजाक उड़ा रही है तो दूसरी ओर मांग रख रही है. एक तरफ गडकरी खुद के लिए बोल रहे हैं तो दूसरी तरफ विपक्षी नेता के लिए खड़े हैं. वो कहते न - "क्रेडिट्स वेयर क्रेडिट इज़ ड्यू". मतलब जहां किसी की तारीफ बनती है वहां जरूर की जानी चाहिए.
बहुत पुरानी है विदर्भ की मांग विदर्भ क्षेत्र में नागपुर समेत महाराष्ट्र के 11 पूर्वी जिले आते हैं. यह भाग प्रदेश का 31 प्रतिशत क्षेत्रफल कवर करता है और 21 प्रतिशत जनसंख्या यहां रहती है. यहां चावल, बिजली, कपास और खनिज संपदाएं बहुत हैं. फिर भी राज्य के बाकी हिस्से की तुलना में विदर्भ कम विकसित है. इसलिए यहां अलग राज्य बनाने की मांग उठती रही है.
1956 में राज्यों को बांटने के लिए फज़्ल अली कमीशन बना. इसके पहले तक विदर्भ क्षेत्र सेंट्रल प्रोविंसेज का हिस्सा था. यानी अभी के मध्यप्रदेश वाले इलाके के साथ था. इसके पहले भी 1 अक्टूबर 1938 को सेंट्रल प्रोविंसेज की विधानसभा में विदर्भ को अलग राज्य बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ था. पर ऐसा नहीं हुआ. 1956 में फज़्ल अली कमीशन ने भी विदर्भ को अलग राज्य बनाने की रिकमेंडेशन दी. पर इसे माना नहीं गया, और एक भाषा एक राज्य के हिसाब से इसे नव-गठित महाराष्ट्र में जोड़ दिया गया. तब से ये मांग लगातार उठाई जाती रही है.
योगी आदित्यनाथ भी भड़के थे जनता पर 2 मार्च को आदित्यनाथ किसानों को संबोधित कर रहे थे. जनता के बीच मौजूद पुलिस आरक्षक भर्ती के अभ्यर्थी हंगामा करने लगे. बैनर-पोस्टर के साथ नारेबाजी होने लगी. कुछ देर आदित्यनाथ सुनते रहे. जब नारेबाजी नहीं रुकी तो भड़क कर धमकाने के लहज़े में कहा -
ये जो नारेबाजी कर रहे हैं उन्हें बाहर कर दो यहां से और इनके नाम नोट कर लो थोड़ा. इनके नाम नोट करके मुझे उपलब्ध करा देना. इन सबके नाम.अब आवाज उठाने वालों के नाम नोट करा के योगीजी ने क्या किया वो योगी ही जानें.

गोरखपुर की रैली में योगी आदित्यनाथ
बाहर निकालने की बात हो या नाम नोट करने के आदेश, ये जनता की उठती आवाज को अनसुना करने का ही प्रयास है. भले ही कोई बाहर न निकला हो या किसी का नाम नोट न किया गया हो, पर जनता के प्रतिनिधियों को, इस तरह जनता की आवाज अनसुना करने, आवाज दबाने या इससे बच निकल कर भागने की आजादी नहीं होनी चाहिए.
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