"इन लड़कियों को 'महिला पायलट' नहीं, 'फाइटर पायलट' कहा जाएगा. यही इनकी पहचान होगी. जब ये अपनी ट्रेनिंग पूरी कर दूसरे मर्द फाइटर पायलट्स के स्तर पर आ जाएंगीं, इन्हें फाइटर पायलट घोषित कर दिया जाएगा. फिलहाल सेना में औरतों की संख्या 2.5 फीसदी है. जो अधिकतर नॉन-कॉम्बैट पदों पर हैं. यानी लड़तीं नहीं हैं... औरतों की भर्ती तो हम 1991 से कर रहे हैं. पर उन्हें लड़ने की इजाजत नहीं थी. वो या तो हेलिकॉप्टर उड़ाती थीं, या ट्रांसपोर्ट सेवा में होती थीं. मैं रक्षा मंत्री का शुक्रगुजार हूं कि उन्होंने औरतों को फाइटर प्लेन उड़ाने का मौका दिया." -अरूप राहा, एयर चीफ मार्शलअरूप राहा ने 2014 में औरतों के पायलट बनने की बात पर ये कहा था कि औरतें शारीरिक रूप से फाइटर पायलट बनने के लिए ठीक नहीं होतीं. क्योंकि हेल्थ को लेकर उन्हें तकलीफें होती हैं. प्रेगनेंसी हो जाए तो उन्हें लंबी छुट्टी लेनी पड़ती है. लेकिन उसी साल अक्टूबर में अपने विचार बदलते हुए अरूप ने महिलाओं को ट्रेनिंग के लिए भर्ती करना शुरू किया. बीते फरवरी राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने औरतों को सेना में लड़ने की परमिशन दे दी थी. ये तीनों लड़कियां देश की पहली फाइटर पायलट बनेंगीं. देखिए क्या कहती हैं ये लड़कियां: फ्लाइंग कडेट भावना कांत
भावना का ये कहना था ट्रेनिंग के वक्त. वो बिहार से हैं. उन तीन लड़कियों में से एक जो कल से सेना के लिए जहाज उड़ा रही होंगी. बचपन से पायलट बनना चाहती थीं भावना. "मेरे मम्मी-पापा ने मुझे कभी ऐसा नहीं फील होने दिया कि मैं एक लड़की हूं इसलिए लड़कों से अलग हूं. लेकिन केवल लड़के ही पायलट बन सकते हैं, ऐसा माना जाता था. इसी मान्यता को तोड़ना चाहती थीं. भावना कहती हैं, लड़कियों के फाइटर पायलट बनने के लिए यही सही समय नहीं है. हमेशा से सही समय रहा है. मैं शुक्रगुजार हूं कि ऐसा फाइनली हो रहा है."
फ्लाइंग कडेट मोहना सिंह
मोहना के दादाजी और पापा दोनों ही एयर फोर्स में थे. लेकिन वो फाइटर पायलट नहीं थे. ट्रांसपोर्ट में थे. उनके लिए पायलट बनना खानदान के मान को जिंदा रखना था. मोहना कहती हैं, "मैंने बीटेक किया. उसके बाद हर इंजिनियर की तरह कॉग्निजेंट कंपनी जॉइन कर ली. लेकिन जी एयर फोर्स में ही लगा हुआ था. तो नौकरी के साथ-साथ सेना जॉइन करने की तैयारी करती रही... फाइटर पायलट बनने का इन्सपिरेशन हमें हमारे इंस्ट्रक्टर से मिला. जब 8 लड़कियों के ग्रुप में हम तीन लड़कियां शॉर्टलिस्ट हुईं तो हमने तुरंत मौका लपक लिया."
फ्लाइंग कडेट अवनी चतुर्वेदी
अवनी मध्यप्रदेश के रीवा शहर से हैं. कहती हैं, "लड़की का फाइटर पायलट होना एक लड़के के फाइटर पायलट होने से किसी तरह से अलग नहीं है. लड़के और लड़कियों, दोनों के ही लिए चुनौतियां एक सी होती हैं. हमें लड़कों की ही तरह काम करना होता है, न हमें स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है, न ही हम कोई स्पेशल ट्रीटमेंट चाहते हैं.












भावना का ये कहना था ट्रेनिंग के वक्त. वो बिहार से हैं. उन तीन लड़कियों में से एक जो कल से सेना के लिए जहाज उड़ा रही होंगी. बचपन से पायलट बनना चाहती थीं भावना. "मेरे मम्मी-पापा ने मुझे कभी ऐसा नहीं फील होने दिया कि मैं एक लड़की हूं इसलिए लड़कों से अलग हूं. लेकिन केवल लड़के ही पायलट बन सकते हैं, ऐसा माना जाता था. इसी मान्यता को तोड़ना चाहती थीं. भावना कहती हैं, लड़कियों के फाइटर पायलट बनने के लिए यही सही समय नहीं है. हमेशा से सही समय रहा है. मैं शुक्रगुजार हूं कि ऐसा फाइनली हो रहा है."
मोहना के दादाजी और पापा दोनों ही एयर फोर्स में थे. लेकिन वो फाइटर पायलट नहीं थे. ट्रांसपोर्ट में थे. उनके लिए पायलट बनना खानदान के मान को जिंदा रखना था. मोहना कहती हैं, "मैंने बीटेक किया. उसके बाद हर इंजिनियर की तरह कॉग्निजेंट कंपनी जॉइन कर ली. लेकिन जी एयर फोर्स में ही लगा हुआ था. तो नौकरी के साथ-साथ सेना जॉइन करने की तैयारी करती रही... फाइटर पायलट बनने का इन्सपिरेशन हमें हमारे इंस्ट्रक्टर से मिला. जब 8 लड़कियों के ग्रुप में हम तीन लड़कियां शॉर्टलिस्ट हुईं तो हमने तुरंत मौका लपक लिया."
अवनी मध्यप्रदेश के रीवा शहर से हैं. कहती हैं, "लड़की का फाइटर पायलट होना एक लड़के के फाइटर पायलट होने से किसी तरह से अलग नहीं है. लड़के और लड़कियों, दोनों के ही लिए चुनौतियां एक सी होती हैं. हमें लड़कों की ही तरह काम करना होता है, न हमें स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता है, न ही हम कोई स्पेशल ट्रीटमेंट चाहते हैं.


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