5 जुलाई का दिन 'आहत भावनाओं' पर मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट के लिए याद रखा जायेगा. चीफ जस्टिस संजय किशन कॉल और जस्टिस पुष्पा सत्यनारायण की बेंच ने पेरूमल मुरुगन की किताब 'मधोरुबागन' पर मचे बवाल को लेकर कहा: मार्किट से किताब हटाने की जरूरत नहीं. जिसको नहीं पढ़नी, फेंक दे.
किताब में क्या था?
पेरूमल मुरुगन ने तमिल हिन्दुओं की एक बहुत पुरानी प्रथा को लेकर एक उपन्यास लिखा: मधोरुबागन. अंग्रेजी में इस किताब का नाम है:
One Part Woman. इसमें एक दंपत्ति की कहानी है जिनके बच्चा नहीं है. उनके बीच लव और सेक्स की कमी नहीं है. दोनों खुश हैं. पर समाज बच्चे को लेकर उन पे ताने मारते रहता है. तानों से निजात पाने का एक मौका उनको मिलता है. अर्द्धनारीश्वर भगवन के मंदिर में फेस्टिवल होता है. उस रात वहां किसी को किसी से भी सेक्स करने की आजादी रहती है. दंपत्ति को लगता है कि शायद इस रात उनकी संतान की इच्छा पूरी हो जाएगी. मतलब बीवी किसी भी अनजान मर्द के साथ सेक्स कर लेगी. शायद बच्चा हो जाये. पर इसके ससाथ ही उनके सुखी और सेक्स से भरपूर अपनी जिंदगी के टूटने का खतरा है. क्योंकि किसी और के साथ सोने पर शायद आपस का रिश्ता खराब न हो जाये. इन्हीं जटिलताओं की कहानी है ये.
बवाल क्या हुआ?
कुछ हिन्दू ग्रुप्स को लगा कि पेरूमल मुरुगन ने कैलाशनाथ मंदिर और वहां की औरतों को बदनाम किया है. शायद वहां पर बहुत पहले ये प्रथा थी. उन लोगों ने डिमांड की कि किताब को बैन कर दिया जाए और मुरुगन को गिरफ्तार कर लिया जाए. ये मामला कोर्ट में चल रहा था. जनवरी 2015 में मुरुगन ने फेसबुक पर लिखा था: 'लेखक मुरुगन तो अब मर चुका है. वो ईश्वर नहीं कि दुबारा जिन्दा हो जाये. अब बस मुरुगन के अन्दर का टीचर जिन्दा है.'
कोर्ट ने क्या कहा?
कोर्ट ने कहा:
Let the author be resurrected to what he is best at. Write. मतलब लेखक वो करने दो जो वो सबसे अच्छा करता है यानी लिखने दो. आगे कहा:
Art is often provocative and is meant not for everyone, nor does it compel the whole society to see it. The choice is left with the viewer. मतलब आर्ट दिमाग को हिलाने के लिए ही होता है. सबके लिए नहीं होता. सबको देखने के लिए फ़ोर्स भी नहीं करता. देखने न देखने की चॉइस बस देखनेवाले की है. देखना है देखो, पढ़ना है पढ़ो. नहीं पढ़ना, फेंक दो. इन्हीं जज साहब ने 2008 में मशहूर पेंटर एम एफ हुसैन के इंडिया से 'निर्वासन' को रद्द कर दिया था. हुसैन को देवी-देवताओं की नंगी फोटो बनाने के लिए देश छोड़ना पड़ा था. जजमेंट में कहा:
Our culture breeds tolerance- both in thought and in actions. I have penned down this judgment with this fervent hope that it is a prologue to a broader thinking and greater tolerance for the creative field. A painter at 90 deserves to be in his home ' painting his canvass'! हमारा कल्चर 'सहिष्णु' है. विचार और कर्म दोनों में. मेरा ये जजमेंट इस विचार और सहिष्णुता को आगे बढ़ाएगा. एक 90 साल के पेंटर को अब अपने घर में कैनवास पर पेंटिंग करनी चाहिए. जी हां, बिल्कुल. पहलाज निहलानी के 'उड़ता पंजाब' पर बैन से लेकर लोगों के जोक और कार्टून पर नाराजगी सब बेवकूफाना चीजें हैं. जिसको अच्छा लगता है, देखे. नहीं लगता नहीं देखे. कलाकारों को किसी भी तरह कोई भी दबाव देना दुष्टता है.