1971 के युद्ध में 1 साल थे बंदी
5 दिसंबर 1971. फ्लाइट लेफ्टिनेंट जे एल भार्गव के एयरक्राफ्ट HF-24 ने बाड़मेर से उड़ान भरी. जब एयरक्राफ्ट पाकिस्तान की सीमा में था, तभी उस पर जमीन से फायर किया गया और विमान क्रैश हो गया. भार्गव ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि वे समय रहते जहाज से बाहर निकल गए. जमीन पर उतरने के बाद सबसे पहले उन्होंने सर्वाइवर किट को निकाला और अपने सूट को झाड़ियों के नीचे गाड़ दिया. अपनी घड़ी का समय पाकिस्तान के समय के हिसाब से सेट किया और पैदल ही चलना शुरू कर दिया. करीब 12 घंटे तक भार्गव को कोई पहचान नहीं पाया. वो खुद को पाकिस्तान एयर फोर्स का पायलट मंसूर अली बताते और सबूत के तौर पर पाकिस्तानी करेंसी दिखाते.

एयर कमोडोर भार्गव का मानना है वीडियो वायरल होना अभिनंदन के लिए सबसे अच्छी बात साबित हुई. (फोटो साभार: फेसबुक)
पाक रेंजर्स ने कहा- कलीमा पढ़ो
भार्गव जिस गांव में थे. वहां के स्कूल मास्टर को उन पर शक हो गया. तब फ्लाइट लेफ्टिनेंट रहे भार्गव बताते हैं,
''उसने मुझसे मेरे घर का पता पूछा. मैंने कहा- रावलपिंडी उसने पूछा - रावलपिंडी में कहां? मैंने जवाब दिया- माल रोड इसके बाद उसने मुझे उलझाने की कोशिश की. कहा कि मैं एक भारतीय गांव में हूं. मैंने उससे रिक्वेस्ट किया कि मुझे पाकिस्तान वापस जाने दो. इससे मास्टर को मेरे पाकिस्तानी होने का यकीन हो गया. उसने मुझसे कहा, मैं पाकिस्तानी सीमा में ही हूं. लेकिन तब तक पाकिस्तानी रेंजर्स आ चुके थे. उन्होंने मुझसे कलीमा पढ़ने को कहा. मैं नहीं पढ़ सका. मेरा पर्दाफाश हो चुका था. मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और पाकिस्तानी सेना के हवाले कर दिया गया.''इसके एक महीने के बाद पाकिस्तान ने भार्गव के कब्जे में होने की बात स्वीकार की. अधिकारिक फुटेज भी जारी किए. जिसके बाद इंटरनैशनल एजेंसियों ने मामले में दखल दिया. एक साल पाकिस्तान की हिरासत में बिताने के बाद भार्गव वापस आए थे.
सर्वाइवर किट में दी जाती है पाकिस्तानी करेंसी
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक भार्गव ने बताया कि इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए पायलटों को खास ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें एक सर्वाइवर किट भी दी जाती है. जिसमें एक पिस्टल और कुछ पाकिस्तानी करेंसी भी होती है. भार्गव ने बताया कि हिरासत के दौरान उन्हें काफी यातनाएं भी दी गईं. वो हमें सोने नहीं देते थे. हमेशा सवाल पूछते रहते थे. हर बार ना कहना भी मुश्किल होता था. इसलिए जब वे मुझसे मेरे स्क्वॉड्रन के साथियों के बारे में पूछते थे तो मैं अपने भाईयों और रिश्तेदारों के नाम बताता था. मैं ठीक वहीं नाम दूसरे लोगों के सामने भी दोहराता था.
जब भारतीय पायलट पर पाकिस्तानी समझकर हमला कर दिया
लड़ाई के समय में प्लेन क्रैश होने के बाद पायलट जमीन पर तो सुरक्षित आ जाता है, लेकिन भीड़ से बच पाना बहुत मुश्किल होता है. अभिनंदन इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि पाकिस्तानी सेना ने उन्हें बचा लिया. एयर कमोडोर भार्गव के मुताबिक 1965 की जंग के दौरान फ्लाइट लेफ्टिनेंट हुसैन का विमान भारतीय सीमा में ही क्रैश हो गया. हुसैन सुरक्षित बाहर निकल गए थे. लेकिन भीड़ के हत्थे चढ़ गए. भीड़ को उनके नाम से पाकिस्तानी होने का संदेह हुआ. भीड़ ने उनके साथ मारपीट शुरू कर दी. बाद में सच्चाई पता चलने पर वही भीड़ उन्हें खून देने के लिए जालंधर कैंटोनमेंट भी गई.
वीडियो ने बचाई अभिनंदन की जान
अगर भीड़ यह वीडियो न बनाती तो फिर अभिनंदन को जिंदा साबित करना हमारे लिए मुश्किल हो जाता. इस्लामाबाद इससे बड़ी आसानी से मुकर जाता. उनकी बाकी जिंदगी पाकिस्तान की किसी जेल में कट जाती. उनका भी वही हाल होता जो 1971 के युद्ध में 54 भारतीय सैनिकों का हुआ था. जो मिसिंग इन एक्शन घोषित कर दिए गए हैं.
वीडियो देखें: जानिए क्या है जेनेवा समझौता? विंग कमांडर अभिनंदन के मामले में ये कहां से आया?






















