'बिजनेस टुडे' के मुताबिक आरबीआई ने ये चौंकाने वाले आंकड़े एक आरटीआई के जवाब में दिए हैं. आंकड़ों के मुताबिक बीते तीन साल में बैंकिंग फ्रॉड के मामले करीब 16 गुना बढ़ गए. यह इस ओर भी इशारा करता है कि देश में कैशलेस ट्रांजैक्शन और पेमेंट ऐप्स के बढ़ते चलन के बीच यह जोखिम सबसे ज्यादा बढ़ा है. तीन साल में फ्रॉड बढ़े, रिकवरी ना के बराबर साल 2007-08 में केवल 3,367 बैंकिंग फ्रॉड सामने आए थे. अगले 9 साल तक, हर साल औसतन इतने ही या थोड़े ज्यादा मामले सामने आते रहे. साल 2016-17 में बैंकिंग धोखाधड़ी के कुल 5071 मामले दर्ज हुए थे. लेकिन उसके बाद ऐसे मामलों की बाढ़ सी आ गई. तीन साल के भीतर ही यानी 2020-21 में धोखाधड़ी के सालाना आंकड़े 83,638 तक पहुंच गए.

2020-21 में हुई धोखाधड़ी की महज 0.7 फीसदी रकम ही अब तक रिकवर हो पाई है
आंकड़ों के मुताबकि साल 2008 से 2016 तक धोखाधड़ी की रफ्तार भी थमी रही और रकम की रिकवरी भी ज्यादा हुई. 2008 में बैंकिंग फ्रॉड की 47.3 फीसदी रकम जब्त कर ली गई. वहीं 2015-16 में 80 फीसदी से भी ज्यादा रिकवरी हुई. लेकिन इसके बाद धोखाधड़ी तो बढ़ी, रकवरी के नाम पर ज्यादा कुछ हाथ नहीं लग सका. आंकड़ों के मुताबिक 2020-21 में हुई धोखाधड़ी की महज 0.7 फीसदी रकम ही अब तक रिकवर हो पाई है. कोरोना में डबल हुए ऑनलाइन फ्रॉड आरबीआई के आंकड़ों से अलग नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की मानें तो कोविड महामारी के दौरान ऑनलाइन बैंकिंग ट्रांजैक्शन से जुड़े फ्रॉड दोगुना रफ्तार से बढ़े. साल 2019 में ऑनलाइन ट्रांजैक्शन से जुड़े 2093 फ्रॉड दर्ज हुए, वहीं एक साल के भीतर यह संख्या करीब 4000 पहुंच गई. इनमें आधे से ज्यादा मामले बड़े शहरों में दर्ज हुए. हैदराबाद और मुंबई में सबसे ज्यादा फ्रॉड सामने आए. यह भी कम चौंकाने वाला नहीं है कि जिस हैदराबाद में कोविड से पहले तीन साल में ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड का एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ था, वहां साल 2020 में 1366 मामले दर्ज हुए. मुंबई में साल 2017 में 185 केस दर्ज हुए थे, जो 2020 में बढ़कर 289 हो गए. आपको बता दें कि ऑनलाइन फ्रॉड के 85 फीसदी मामले सिर्फ 5 राज्यों - उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, ओडिशा और आंध्र प्रदेश - में दर्ज हुए हैं.
























