एक पुरानी कचरा छाप परंपरा को ढोते हुए आगे न बढ़ने की कसम खा चुके हैं लोग. दुकानें चलाने वाले नाई खुद को मजबूर बताते हैं. अपना पुश्तैनी धंधा पकड़े हैं. कहते हैं गांव के ठाकुर मना करते हैं दलितों के बाल काटने से. हम क्या करें? क्या अपने हाथ पैर तोड़वाएं.
देखो ये हैं दलित राम भोले. बताते हैं कि न हमारे बड़े बुजुर्गों के बाल काटे जाते. न हमारे बच्चों के. सालों से यह सिलसिला चल रहा है.

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लेकिन आदमी कब तक बर्दाश्त करे. आखिर इन गांव वालों के सब्र का प्याला छलका और अपने हक का एहसास हुआ. अब ये इकट्ठा होकर आंदोलन करने की ठान चुके हैं. नीचे कुछ तस्वीरें हैं. उन गांव वालों की, जिन्होंने इस ढपोरसंखी परंपरा से लड़ने का मन बनाया है.

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हरीश कहते हैं "अब हम विरोध करने के लिए एकजुट हो गए हैं. हमें संविधान के अनुसार हर नागरिक के बराबर अधिकार चाहिए."
'शहीद को चिता की जमीन नहीं देंगे, क्योंकि 'नीची' जाति का था'















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