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भारत को विदेशी मदद नहीं लेने की 16 साल पुरानी पॉलिसी क्यों बदलनी पड़ी है?

यहां तक कि 2017 में शत्रु बन गए चीन से भी मदद ली जा रही है. जानें एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

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भारत को अब चीन से ऑक्सीजन से जुड़े उपकरण और जीवन रक्षक दवाएं खरीदने में कोई वैचारिक समस्या नहीं है. (पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की फाइल फोटो)
ऑक्सीजन, दवाएं और कोरोना के इलाज से जुड़े मेडिकल उपकरण. इनकी अपने यहां जितनी भारी कमी हो गई है, उसे देखते हुए इंडिया ने दुनिया के कई देशों से गिफ्ट, डोनेशन और मदद लेनी शुरू की है. और ये कोई आम घटना नहीं है. बल्कि इसे बीते 16 साल में इंडिया में एक बड़े पॉलिसी चेंज के रूप में देखा जा रहा है.
इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, विदेशी सहायता लेने के मामले में दो बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं. अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि चीन से ऑक्सीजन संबंधी उपकरण और जीवन रक्षक दवाएं खरीदने को लेकर भारत को अब कोई वैचारिक समस्या नहीं है. सूत्र ने अखबार को बताया कि राज्य सरकारें, विदेशी एजेंसियों से जीवन रक्षक दवाएं खरीद सकती हैं. केंद्र सरकार उनके रास्ते में नहीं आएगी.

बड़ी-बड़ी आपदाओं में भी भारत ने 16 साल मदद नहीं ली

कोरोना क्राइसिस के दौरान विदेशी सहायता लेने का फैसला, भारत सरकार की रणनीति में बदलाव के बड़े संकेत की तरह देखा जा रहा है. क्योंकि हाल तक भारत एक उभरती ग्लोबल सुपरपावर और आत्मनिर्भर देश वाली अपनी छवि पर जोर दे रहा था. 16 साल पहले, यानी 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने विदेशी सोर्स से अनुदान और सहायता न लेने का फैसला किया था. उससे पहले भारत ने कई इवेंट्स में विदेशी सरकारों से मदद कुबूल की थी. जैसे - उत्तरकाशी भूकंप (1991), लातूर भूकंप (1993), गुजरात भूकंप (2001), बंगाल चक्रवात (2002) और बिहार बाढ़ (2004) के दौरान.
दिसंबर, 2004 में भयंकर सुनामी आई थी. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने घोषणा करते हुए कहा कि -
"हमारा मानना है, हम अपने आप इस स्थिति का सामना कर सकते हैं. अगर जरूरत पड़ी तो हम उनकी (विदेश) मदद लेंगे."
मनमोहन सिंह का ये बयान भारत की आपदा सहायता नीति में एक बड़ा चेंज था. इसके बाद आई आपदाओं के टाइम भी भारत इसी नीति पर टिका रहा. मसलन, 2013 में आई केदारनाथ त्रासदी, 2005 के कश्मीर भूकंप और 2014 की कश्मीर बाढ़ के समय भारत ने विदेशी सहायता लेने से साफ मना कर दिया था.
Covid Help कोरोना संकट के समय दुनिया के कई देश भारत की मदद के लिए आगे आए हैं. रूस से भी मेडिकल से जुड़े समान भारत पहुंचा है. (फोटो-PTI)

साल 2018 में केरल में भारी बाढ़ आई. तब भी भारत ने विदेशों से कोई सहायता कुबूल नहीं की. केरल सरकार ने केंद्र को बताया था कि यूएई ने 700 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने की पेशकश की है, लेकिन केंद्र सरकार ने किसी भी तरह की विदेशी मदद लेने से मना कर दिया था. केंद्र ने कहा था कि राहत और पुनर्वास की जरूरतों को वह अपने तरीकों से पूरा करेगा.

बीते साल मोदी सरकार ने इसमें चेंज के संकेत दिए

मोदी सरकार के राज में फॉरेन हेल्प पॉलिसी में बदलाव के संकेत 2020 में मिल गए थे. जब भारत ने पीएम केयर्स फंड के लिए विदेशों से योगदान को लेने का फैसला किया था. लेकिन इस सबमें एक बात ये भी है कि सरकार अपने नजरिए में इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर रही है. सूत्र कहते है कि ये दान या सहायता नहीं है. क्योंकि भारत ने मदद के लिए "अपील" नहीं की है. और ये खरीद से जुड़ा फैसला है. जैसे, एक सूत्र ने कहा -
"अगर कुछ सरकारें या निजी संस्थाएं उपहार के रूप में दान करना चाहती हैं, तो हम इसे कृतज्ञता के साथ स्वीकार करते हैं"
इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि विदेशी सरकारों के ये उपहार और दान दरअसल, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन से लेकर वैक्सीन जैसी उन आपातकालीन मेडिकल सप्लाई के बदले में आ रहे हैं जो भारत ने उन्हें भेजी थी. भारत ने 80 से ज्यादा देशों को लगभग 6.5 करोड़ वैक्सीन भेजी हैं.
China Coronavirus चीन ने भारत की मदद की पेशकश की है.  (सांकेतिक तस्वीर: एपी)

लेकिन फिर भी चीन जैसे देश से ऑक्सीजन संबंधी उपकरणों की आपात खरीद मायने रखती है. क्योंकि 2017 में इन दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर खूनी झड़प और वॉर जैसी सिचुएशन देखने को मिली, जिसमें गतिरोध अब भी पूरी तरह सुलझा नहीं है.
भारत में चीन के राजदूत सुन वेइदॉन्ग ने पुष्टि की है कि चीन द्वारा भारत में 25,000 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर्स की सप्लाई की जाएगी. उन्होंने ट्वीट किया है कि चीन के मेडिकल सप्लायर्स भारत से ऑर्डर मिलने के बाद ओवरटाइम काम कर रहे हैं. हाल के दिनों में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर के लिए कम से कम 25,000 ऑर्डर मिले हैं. कार्गो विमानों से मेडिकल सप्लाई की योजना है.
इंडियन एक्सप्रेस लिखता है कि - सूत्रों ने कहा चीन से खरीद हो रही है और नई दिल्ली में अब "कोई वैचारिक समस्या नहीं है."

एक्सपर्ट लोग इस पर क्या कहते हैं?

16 साल बाद इस पॉलिसी में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी? ये समझने के लिए हमने बात की दिल्ली यूनिवर्सिटी के शहीद भगत सिंह कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर और चीन मामलों की जानकार डॉक्टर रित्यूषा मणि तिवारी से. रित्यूषा ने बताया कि -
"पिछले दो दशकों में डिजास्टर मैनेजमेंट में इंडिया की पॉलिसी कमजोर हुई है. जिस तरीके से हमने आत्मनिर्भरता की बेहतरीन शुरुआत की थी, वो हम जारी नहीं रख पाए हैं. मुझे लगता है कि कहीं न कहीं सीरियस गर्वनेंस इश्यू है. जो जवाबदेही है सरकार और हमारे खुद के रिस्पॉन्स की भी, उसकी बहुत ज्यादा गंभीर विवेचना की जरूरत है. जवाबदेही फिक्स करनी होगी. आत्मनिर्भरता की बजाय हम दूसरे देशों की ओर देख रहे हैं. 2018 का ही उदाहरण हमारे सामने है. केरल की बाढ़ से लेकर यहां तक हम कैसे पहुंचे, इन सब चीजों के बारे में सोचना होगा."

हालांकि रित्यूषा मणि तिवारी ये भी कहती हैं कि - भारत में कोरोना की जो स्थिति है, उसे देखते हुए अन्य देशों की ओर से दी गई मदद को स्वीकार करने के अलावा हमारे पास बहुत ज्यादा ऑप्शन नहीं है. जिन देशों से हमारी अनबन रही है, उनकी ओर से आ रही मदद भी हम नहीं लेंगे तो ये असंवेदनशील फैसला होगा. हमें इस समय सबकी मदद की जरूरत है. ऐसे में चीन से खरीदे जाने वाले उपकरण भी ख़ासे मायने रखते हैं. अगर हम उन्हें कहीं और से खरीदते हैं या खुद बनाते हैं और उसमें देरी होती है, तो ये ठीक न होगा क्योंकि अभी लोग मर रहे हैं और ये हमारे लिए बड़ा मानवीय संकट है. ऐसे में चीन से, पाकिस्तान से या जिस भी देश से मदद की पेशकश आ रही है, उसे स्वीकार करने के अलावा सरकार के पास कोई और ऑप्शन होना भी नहीं चाहिए. वे कहती हैं कि -
"कोरोना काल में जिस तरह भारत की मदद के लिए चीन से प्रस्ताव आए हैं, इससे ये काफी हद तक उजागर होता है कि दो देशों के बीच महज बॉर्डर या मिलिट्री के रिलेशन ही नहीं हो सकते हैं. ये भी बहुत ज्यादा मायने रखता है कि उनके मानवीय संबंध कैसे हैं. जो द्विपक्षीय संबंध हैं वो मानवीय पक्ष पर ज्यादा टिका होना चाहिए. अगर आप विपत्ति के समय अपने पड़ोसी देशों के रिस्पॉन्स पॉजिटिव रख सकते हैं तो ये एक बहुत बड़ी सफलता है."
डॉक्टर रित्यूषा का कहना है कि ये जो पॉलिसी है उसका रिव्यू होना चाहिए कि ये करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या हम अपने दम पर संसाधन जुटा सकते थे? पहले चरण के बाद और दूसरे चरण के बीच हमारे पास एक पीरियड था जिसमें हमें लगा कि हमने बीमारी रोक ली है. इस तरह के आंकड़े आ रहे थे कि महामारी को कंट्रोल कर लिया गया है. अगर हमारे पास इस तरह के आंकड़े थे, तो हम वहां से यहां तक कैसे पहुंचे कि अब हमें किसी भी देश से आ रही मदद लेनी ही पड़ेगी. अगर हम जीवन बचाना चाहते हैं तो डिजास्टर मैनेजमेंट के बाद इस पर बहुत ज्यादा ध्यान देना होगा कि ऐसा क्यों हुआ. अगर हम अपने आपको विश्व में आत्मनिर्भर देश के रूप में देख रहे हैं तो इस बारे में सोचना होगा.  

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