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यहां पुलिस की कस्टडी में कितने ही 'सरबजीत' मर गए

बदायूं जेल के पूरे प्रशासन पर मुकदमा हुआ है. उनकी कस्टडी में एक कैदी की मौत हो गई. ऐसी कितनी ही मौतें पुलिस कस्टडी में हो जाती हैं.

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फोटो - thelallantop
पहले तो बदायूं की ये खबर पढ़ो. बदायूं डिस्ट्रिक्ट जेल के सारे के सारे अधिकारियों पर मुकदमा हुआ है. जेल में रविवार की रात को एक कैदी, तुक्नेश यादव की मौत हो गई. ये कैदी मर्डर का आरोपी था. जेल प्रशासन पर IPC की धारा 302, यानी कि मर्डर का चार्ज लगा है. इन पर क्रिमिनल कॉन्स्पिरेसी का भी मुकदमा दर्ज हुआ है. तुक्नेश ने पहले ही शिकायत की थी कि जेल वाले उसे टॉर्चर करते हैं. उसे बुरे अंजाम कि धमकी भी दी गई थी. 7 अप्रैल को उसने अपने परिवार को चार पन्नों की एक चिट्ठी लिखी थी. उसमें उसने अपने घरवालों को बताया था कि अगर उसे कुछ हुआ तो इसकी जिम्मेदारी जेल प्रशासन की होगी. तुक्नेश के घर वालों ने सुप्रिटेंडेंट, जेलर और दो डिप्टी जेलर के खिलाफ FIR लिखाई है. उनका आरोप है कि कुछ पड़ोसियों ने जेल के अधिकारियों के साथ मिल के तुक्नेश को पीट-पीट कर मार डाला. तुक्नेश मार्च 2014 से जेल में बंद था. घरवालों ने अधिकारियों के अलावा पने गांव के तीन लोगों पर भी मुकदमा किया है.

पहरेदारों पर पहरा कौन दे

एक फिल्म आई थी अजय देवगन की गंगाजल. शुरू में ही डिस्क्रिप्शन लिख के आता था 'सत्य घटना पर आधारित.' वो भागलपुर का केस था. जहां पुलिस वालों ने कस्टडी में मौजूद कैदियों की आंखें फोड़ दी थीं. बहुत खौफनाक हरकत थी कानून के रक्षकों की. उनकी आधी किस्मत तेज रही होगी. जो आंख चली गई, जान बच गई. ऐसे ज्यादातर केसेज में गवाही देने या अपने साथ हुई ज्यादती की दास्तान बताने के लिए विक्टिम बचते ही नहीं. पुलिस कस्टडी में ही उनका राम नाम सत्य कर देती है. वो कैसे मरा, क्यों मरा, ये सबको पता होता है. लेकिन साबित करना मुश्किल होता है. उनके साथ सहानुभूति भी नहीं होती लोगों की. क्योंकि वो जेल में होते हैं, तो जाहिर है किसी जुर्म की वजह से होंगे. वो जुर्म साबित नहीं हुआ होता तब तक. उसका कोर्ट में ट्रायल चल रहा होता है. और कस्टडी में पुलिस उन पर थर्ड डिग्री ट्राई कर रही होती है.

तो सरबजीत पर क्यों उबलते हैं लोग

सरबजीत की कहानी बड़ी रोमांचक है. उस पर फिल्म भी बन रही है. सरबजीत की बहन के साथ पूरे देश ने आवाज उठाई थी उसकी रिहाई के लिए. जब वो पाकिस्तान की जेल में बंद थे. उनके साथ सबकी संवेदनाएं थीं. जबकि पाकिस्तान उन पर देश के खिलाफ साजिश और जासूसी का केस चला रहा था. जब तक वो जीते रहे, उनकी चिट्ठियां आती रहीं. जिसमें वो अपने साथ होती ज्यादतियां बताते थे. कि कैसे पाकिस्तान की उस नर्क जैसी जेल में उनको टॉर्चर किया जा रहा था. लोगों को उसकी कहानी पढ़, देख, सुन कर आंसू आ जाते हैं. वो दोषी थे या नहीं इसका फैसला पाकिस्तान उनकी जिंदगी रहते नहीं कर सका. फिर उनकी लाश ही आई. लेकिन वो पाकिस्तान की जेल में था. इसलिए हमको गुस्सा आता है. क्योंकि हमारे लिए देशभक्ति दिखाने को छोटा जरिया पाकिस्तान को गाली देना ही मिलता है. अगर सरबजीत इंडिया की किसी जेल में पड़ा होता तो उसके घर वालों की लड़ाई कोई नहीं लड़ने जाता.

कस्टडी में मरने वालों की लंबी कतार है

मुजफ्फर नगर का वो केस याद होगा जब बुढ़ाना थाने के SHO समेत 5 पुलिस वाले नप गए थे. उनकी कस्टडी में नवाब कुरैशी की डेथ हो गई थी. ये दिसंबर 2014 की बात है. जुलाई 2015 में केरल पुलिस की कस्टडी में 40 साल के मजदूर सिबी की मौत हुई थी. उस पर बड़ा बवाल हुआ था. जुलाई 2015 में ही महाराष्ट्र अहमद नगर के 6 पुलिस वालों पर केस चला था. उनके टॉर्चर से 28 साल के दलित की मौत हो गई थी. नितिन बालू सात्ये नाम था इसका. 27 मई 2015 को पार्नेर तहसील जवाले गांव से चोरी की पूछताछ करने को अरेस्ट किया था. कस्टडी में नंगा करके रखा. जब उसने भागने की कोशिश की तो पकड़ लिया. इसके बाद बुरी तरह पीटा. फिर प्राइवेट हॉस्पिटल ले गए. जहां उसे मरा हुआ घोषित कर दिया गया. जनवरी 2014 में गाजियाबाद के लोनी थाने में शौकत नाम के आदमी को टॉर्चर करके मारा गया. उसके ऊपर रुपए चुराने का आरोप था. मई 2014 में तमिलनाडु सरकार ने पांच GRP वालों को सस्पेंड कर दिया था. कस्टडी में आऱ जयावेलू की मौत हो गई थी. हॉस्पिटल से रिपोर्ट आई थी कि वो हार्ट अटैक से मरा. सीएम जयललिता ने उसके घर वालों को 5 लाख रुपए की मदद भी की थी. जुलाई 2014 में यूपी पुलिस की कस्टडी में आजमगढ़ के एक स्कूल टीचर की मौत हुई थी. अगस्त 2013 में कन्नौज जेल में एक डेथ हुई थी. अनेक पाल नाम का वो विक्टिम जिस पर मर्डर का केस चल रहा था. फैमिली ने कहा कि ये बीमार था. पुलिस ने टॉर्चर किया, जिसकी वजह से इसकी मौत हो गई. ये कुछ कहानियां हैं. इसके जैसी तमाम कहानियां ऑफिसियल रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं. और कितनी ही ऐसी हैं जिनका कोई लेखा जोखा नहीं. तो पुलिस की कस्टडी में मरने वाले जो लोग होते हैं. उन पर केस चल रहे होते हैं. उनका फैसला अगर वहीं उनको दर्दनाक मौत देकर कर दिया जाता है. और हम सिर्फ सरबजीत पर दुखी होते हैं, उन पर नहीं. फिर कोई भी इस त्रासदी का शिकार हो सकता है. और कोई भी किसी के लिए आंसू नहीं बहाएगा. कोई किसी की लड़ाई लड़ने आगे नहीं आएगा.

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