कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच दिल्ली में लॉकडाउन लगने की घोषणा हुई. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बताया कि 19 अप्रैल की रात 10 बजे से सोमवार 26 अप्रैल सुबह 6 बजे तक दिल्ली में लॉकडाउन रहेगा. साथ ही ये भी कहा कि सरकार को पता है ये फैसला आसान नहीं है. इसका गरीबों पर असर होगा. उन्होंने लोगों से अपील की कि लोग पैनिक ना हो. दिल्ली छोड़कर न जाएं.
“मैं हूं ना, मुझ पर भरोसा रखें...” लेकिन मुख्यमंत्री की इन बातों पर शायद जनता को भरोसा नहीं हुआ. या कहें उन तक बात सही से नहीं पहुंची. पहुंचा सिर्फ एक शब्द, 'लॉकडाउन'. नतीज़ा, पिछले साल जैसा माहौल एक बार फिर राजधानी दिल्ली में दिखाई दिया. शाम होते-होते आनंद विहांर बस टर्मिनल लोगों की भीड़ जुट गई. लोग अपने घर जाने के लिए सामान सहित यहां पहुंचे. अधिकतर लोग बिहार और उत्तर प्रदेश की बसों में बैठ घर पहुंच जाना चाहते थे.
इसी बीच हमारे रिपोर्टर विकास कुमार मौके पर पहुंचे. और वहां का नज़ारा भयावह था. ना तो वहां सोशल डिस्टेंसिंग नज़र आई और नज़र आने वाली थी. आप ये नज़ारा यहां देख सकते हैं.
दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर #लॉकडाउन
के बाद घर लौटती भीड़. सोशल डिस्टेंसिंग का कोई नाम (और चांस) नहीं.
दिल्ली में कुछ-कुछ पिछले साल जैसा भयावह माहौल बनता दिख रहा है!
प्रवासी फिर अपने घर की तरफ चल दिए हैं.
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दिल्ली में लॉकडाउन लगने की घोषणा के बाद आनंद विहार पर कुछ ऐसा नज़ारा देखने को मिला.
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— The Lallantop (@TheLallantop) April 19, 2021
हमारे रिपोर्टर ने लोगों से बात की तो उनका डर समझ आया. लोग कहते मिले कि सरकार कुछ कर नहीं रही. कोरोना के भय पर बोले, "भूखे मरने से बेहतर है गांव जाएंगे, दाल-रोटी खाएंगे." देखिए ये वीडियो.
क्या हुआ था पिछले साल
सिलसिला शुरू हुआ था 24 मार्च 2020 को. जब रात आठ बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संपूर्ण लॉकडाउन की घोषणा की. कहा, ''हिंदुस्तान को बचाने के लिए, हिंदुस्तान के हर नागरिक को बचाने के लिए, आपको बचाने के लिए, आपके परिवार को बचाने के लिए, रात 12 बजे से लॉकडाउन लगाया जा रहा है.'' घरों से निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई. प्रधानमंत्री ने ये भी अपील की कि जो जहां हैं वहीं रहें. तीन सप्ताह के इस लॉकडाउन में लोग घर से बिल्कुल बाहर ना निकलें.
अपनी इस घोषणा में पीएम उन लोगों का ज़िक्र करना भूल गए जो अपने घर, अपने गांव से दूर, इमारतों या फैक्ट्रियों में मज़दूर के तौर पर काम कर रहे थे. जो झुग्गियों या फुटपाथ पर चटाई बिछाकर सो जाते थे. उनका गुज़र बसर कैसे होगा, इसकी कोई बात नहीं हुई. सरकार चाहती तो लॉकडाउन लगाने से पहले इन लोगों के लिए कुछ इंतज़ाम कर सकती थी. जो शायद बाद में आत्मनिर्भर भारत पैकेज की घोषणा करके उन्होंने किया भी. लेकिन प्रवासी मजदूरों की आप बीती सुनी तो ये बात सामने आई कि सरकार से उन्हें कोई भी मदद नहीं मिली. जिस वजह से उनके पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.

पिछले साल ये तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी.
अगले तीन दिनों के भीतर यानी 28 मार्च 2020 आते-आते, सड़कों, रेलवे लाइनों और कच्चे रास्तों पर पैदल अपने गांव लौटने वाले प्रवासियों का हुजूम दिखने लगा. कोई अपने कंधों पर बच्चों को लादे जा रहा था. तो कोई नंगे पैर ही बस अपने घर पहुंच जाना चाहता था. हर घंटे के स्तर पर देश भर की सड़कों पर प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ती गई. मुंबई से लेकर दिल्ली और अहमदाबाद से पंजाब के बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों ने पैदल अपने घरों की तरफ चलना शुरू कर दिया.
बात यहीं खत्म नहीं होती. त्रासदी तो तब शुरू हुई जब कई-कई लोगों को कुछ ही किलोमीटर चलने में करीब हफ्तों लगे. कितने ही लोगों ने रास्ते में दम तोड़ दिया. कई मांओं ने सड़कों पर ही बच्चे को जन्म दिया. सड़क पर चलते-चलते कुछ बच्चों की भी मौत हो गई. इसके बाद पीएम मोदी ने ''मन की बात'' की. इसमें लोगों को हो रही परेशानी के लिए माफी मांगी.
इस साल कोरोना के आंकड़े उम्मीद जताई जा रही है कि इस बार लॉकडाउन लगाकर बढ़ते हुए कोविड केस को कम किया जा सकता है. कई राज्यों में वीकेंड लॉकडाउन लगा है. आंकड़ों की बात करें, तो सोमवार यानी 19 अप्रैल को राजधानी दिल्ली में कोरोना के 23,686 नए मामले सामने आए. इस दौरान 240 लागों की मौत भी हुई. अब राज्य में 76,887 सक्रिय मामले हो गए है. वहीं देश में कुल 2,59,170 नए मामले दर्ज हुए. जिनमें 1761 लोगों की मौत हो गई. अब देश में कुल एक्टिव केस 20 लाख 31 हज़ार 977 हो गई है.
मुश्किल समय है, लेकिन हमारी यही प्रार्थना है कि लोग जहां हैं, वहीं रहें. समस्याएं हैं, तो मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ भी है. लॉकडाउन में भारी भीड़ के बीच सफ़र करके आप न सिर्फ खुद को, बल्कि घर पहुंचकर घरवालों को भी वायरस के खतरे में डालेंगे. बेहतरी इसी में है कि जैसे भी हो सके, भीड़ से बचें.
हमारे रिपोर्टर ने लोगों से बात की तो उनका डर समझ आया. लोग कहते मिले कि सरकार कुछ कर नहीं रही. कोरोना के भय पर बोले, "भूखे मरने से बेहतर है गांव जाएंगे, दाल-रोटी खाएंगे." देखिए ये वीडियो.
अपनी इस घोषणा में पीएम उन लोगों का ज़िक्र करना भूल गए जो अपने घर, अपने गांव से दूर, इमारतों या फैक्ट्रियों में मज़दूर के तौर पर काम कर रहे थे. जो झुग्गियों या फुटपाथ पर चटाई बिछाकर सो जाते थे. उनका गुज़र बसर कैसे होगा, इसकी कोई बात नहीं हुई. सरकार चाहती तो लॉकडाउन लगाने से पहले इन लोगों के लिए कुछ इंतज़ाम कर सकती थी. जो शायद बाद में आत्मनिर्भर भारत पैकेज की घोषणा करके उन्होंने किया भी. लेकिन प्रवासी मजदूरों की आप बीती सुनी तो ये बात सामने आई कि सरकार से उन्हें कोई भी मदद नहीं मिली. जिस वजह से उनके पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.

पिछले साल ये तस्वीर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई थी.
अगले तीन दिनों के भीतर यानी 28 मार्च 2020 आते-आते, सड़कों, रेलवे लाइनों और कच्चे रास्तों पर पैदल अपने गांव लौटने वाले प्रवासियों का हुजूम दिखने लगा. कोई अपने कंधों पर बच्चों को लादे जा रहा था. तो कोई नंगे पैर ही बस अपने घर पहुंच जाना चाहता था. हर घंटे के स्तर पर देश भर की सड़कों पर प्रवासी मजदूरों की संख्या बढ़ती गई. मुंबई से लेकर दिल्ली और अहमदाबाद से पंजाब के बड़े शहरों से प्रवासी मजदूरों ने पैदल अपने घरों की तरफ चलना शुरू कर दिया.
बात यहीं खत्म नहीं होती. त्रासदी तो तब शुरू हुई जब कई-कई लोगों को कुछ ही किलोमीटर चलने में करीब हफ्तों लगे. कितने ही लोगों ने रास्ते में दम तोड़ दिया. कई मांओं ने सड़कों पर ही बच्चे को जन्म दिया. सड़क पर चलते-चलते कुछ बच्चों की भी मौत हो गई. इसके बाद पीएम मोदी ने ''मन की बात'' की. इसमें लोगों को हो रही परेशानी के लिए माफी मांगी.

इस साल कोरोना के आंकड़े उम्मीद जताई जा रही है कि इस बार लॉकडाउन लगाकर बढ़ते हुए कोविड केस को कम किया जा सकता है. कई राज्यों में वीकेंड लॉकडाउन लगा है. आंकड़ों की बात करें, तो सोमवार यानी 19 अप्रैल को राजधानी दिल्ली में कोरोना के 23,686 नए मामले सामने आए. इस दौरान 240 लागों की मौत भी हुई. अब राज्य में 76,887 सक्रिय मामले हो गए है. वहीं देश में कुल 2,59,170 नए मामले दर्ज हुए. जिनमें 1761 लोगों की मौत हो गई. अब देश में कुल एक्टिव केस 20 लाख 31 हज़ार 977 हो गई है.
मुश्किल समय है, लेकिन हमारी यही प्रार्थना है कि लोग जहां हैं, वहीं रहें. समस्याएं हैं, तो मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ भी है. लॉकडाउन में भारी भीड़ के बीच सफ़र करके आप न सिर्फ खुद को, बल्कि घर पहुंचकर घरवालों को भी वायरस के खतरे में डालेंगे. बेहतरी इसी में है कि जैसे भी हो सके, भीड़ से बचें.
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