साल 1975 की बात है. मिथिला से आने वाले बिहार के एक बहुत बड़े नेता हुआ करते थे. नाम था ललित नारायण मिश्र. बिहार के लोगों के लिए इस नाम को इन्डट्रोडक्शन की जरुरत नहीं है. उस दौर का कोई आदमी साल 2022 में भी ये नाम सुन ले तो कहे, ललित बाबू होते तो बिहार कुछ और होता. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के कार्यकाल में उन्हें संसदीय सचिव का पदभार मिला. और इंदिरा गांधी के दौर में वो रेल मंत्री के पद पर पहुंच गए. बताते हैं कि जब तक ललित बाबू रहे, उन्होंने इंदिरा और जय प्रकाश नारायण के बीच मतभेदों को पाटने की कोशिश की. “यूं हो तो क्या होता..’ कि तर्ज़ पर ये भी कयास लगाए जाते हैं कि अगर ललित बाबू जिन्दा रहे होते तो शायद जेपी का आंदोलन शुरू नहीं होता. इमरजेंसी न लगती और और शायद ललित बाबू आगे चलकर प्रधानमंत्री भी बन जाते.
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जब तक ललित बाबू रहे, उन्होंने इंदिरा और जय प्रकाश नारायण के बीच मतभेदों को पाटने की कोशिश की.
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