निचले हिमालय और मैदानी इलाक़ों से बर्फ़ीले हिमालय की ओर सदियों से आध्यात्म, दर्शन और सुकून की तलाश में कई पगडंडियां बढ़ती रही हैं. इन पगडंडियों ने गहरे हिमालय में कई रोमांचक जगहों की तलाश की है. ऐसी ही एक पगडंडी उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम की ओर भी जाती है, जिसके रास्ते पर तक़रीबन आखिरी छोर पर एक क़स्बा पड़ता है जिसका नाम है 'जोशीमठ'. धार्मिक किताबों में तलाशेंगे तो जोशीमठ का नाम आपको 'ज्योतिर्मठ' भी मिलेगा.
किस वजह से दरक रही है जोशीमठ की जमीन?
ठोस कदम नहीं उठाए गए तो किस्से कहानियों में ही रह जाएगा जोशीमठ.


आदि-शंकराचार्य के बसाए चार मठों में से एक. जोशीमठ पहुंचने के लिए आप हिमालय की तलहटी पर बसे ऋषिकेश से अगर शुरूआत करें तो, गंगा नदी के साथ-साथ एक सर्पीली सड़क से होते देवप्रयाग तक पहुंचेंगे. यहां संगम पर, भागीरथी का आप साथ छोड़ देंगे और अलखनंदा आपको रूद्रप्रयाग तक ले चलेगी. वहां मंदाकिनी नदी से मुलाक़ात कर आप फिर अलखनंदा के साथ कर्णप्रयाग से होते नंदप्रयाग, और फिर कुल मिलाकर ढाई सौ किलोमीटर की दूरी पार कर, जोशीमठ पहुंचेंगे. अब तक आप 6150 फ़ुट की ऊंचाई पर आ चुके हैं. वनस्पति विहीन बर्फ़ीले पहाड़ों को आपकी नज़रें क़रीब से छू रही हैं और आप बेशुमार ख़ूबसूरती से भरपूर जोशीमठ में हैं.

बद्रीरनाथ और हेमकुंड साहिब के दर्शन का रास्ता यहीं से होकर जाता है. आम दिनों में अगर आप यहां हो तो खूबसूरती के साथ रोमांच का एहसास होगा, फिलवक्त डर का माहौल है. जमीन दरक रही है, पूरे शहर पर ढह जाने, तबाह हो जाने का खतरा मंडरा रहा है. आपने सोशल मीडिया या खबरों में जोशीमठ के बारे में लगातार सुन रहे होंगे. वहां हो रहे प्रदर्शनों की तस्वीर भी देखी होगी.
पिछले कुछ दिनों से जोशीमठ के घरों में लगातार दरार की खबरें आ रही थीं, बीते साल नवंबर में ये सिलसिला शुरू हुआ. अब नेशनल लेवल पर चर्चा तब होने लगी, जब मुख्य सड़क में बड़ी दरार आ गई. घरों के ढह जाने का खतरा बढ़ा तो स्थानीय लोग सड़क पर मशाल जुलूस के जरिए विरोध प्रदर्शन करने लग गए.
जोशीमठ के मारवाड़ी वार्ड में 6 जनवरी 2023 यानी आज की दोपहर बाद जमीन फाड़कर अचानक से पानी निकलने लगा. वहां जेपी कंपनी के 35 भवनों को आनन-फानन में खाली कराया गया. क्योंकि वहां पानी का जलस्तर दोगुना हो गया है. कई लोगों ने अपना घर छोड़ रिश्तेदारों के यहां पनाह ली, तो प्रशासन ने भी ऐतिहात के तौर पर 93 मकानों को लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया. स्थानीय प्रशासन के मुताबिक इलाके में 561 मकानों में दरारें आ चुकी हैं. इनमें रविग्राम में 153, गांधीनगर में 127, मनोहरबाग में 71, सिंहधार में 52, परसारी में 50, अपर बाजार में 29, सुनील में 27, मारवाड़ी में 28 और लोअर बाजार में 24 मकान खतरे की नोंक पर टिके हैं.
जोशीमठ में भू-धंसाव को लेकर बृहस्पतिवार को क्षेत्र में बाजार पूरी तरह से बंद रहा. प्रभावित लोगों ने दिनभर बदरीनाथ हाईवे पर चक्काजाम रखा. लोगों की चिंताएं और गुस्सा जायज है. क्योंकि यहां किसी भूकंप की वजह से दरार नहीं आई. ना ही कोई हिमस्खलन हुआ है. बल्कि ये एक तरह का मैन-मेड-डिजास्टर है. सरकार और कंपनियों की गलती का नतीजा. क्या है वो गलितयां जिसमें लालच छिपा है. इस पर आएं, उससे पहले ये समझना जरूरी है कि ये लालच किसी चीज को लील रहा है. सिर्फ इंसानी जमीन नहीं इतिहास में खतरे में है. क्या है इतिहास?
उत्तराखंड का गढ़वाल मंडल. यहां चमोली जिला और वहां मौजूद जोशीमठ. सातवीं से 11 वीं सदी के बीच ये इलाका कत्यूरी वंश के अधीन रहा. एक समय पर उन्होंने यहां अपनी राजधानी भी बनाई. हिन्दू धर्म में जोशीमठ का महत्त्व इस बात समझिए कि आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों में से एक जोशीमठ है. तब इसे ज्योतिर्मठ के नाम से जाना गया. जोशीमठ में भगवान् विष्णु का एक मंदिर है. सर्दियों में जब बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्री की प्रतिष्ठा इसी मंदिर में होती है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जोशीमठ के नरसिंह मंदिर में बनी भगवान नरसिंह की मूर्ति का बायां हाथ लगातार क्षीण होता जाएगा. और जब ये गिर जाएगा जो नर और नारायण नाम के दो पर्वत आपस में मिल जाएंगे. इस तरह बद्रीनाथ का रास्ता हमेशा के लिए बंद हो जाएगा और भगवान बद्रीनाथ की पूजा भविष्य बद्री में हुआ करेगी.
जोशीमठ में विष्णु भगवान को समर्पित एक लोकप्रिय मंदिर है. इसके अतिरिक्त नरसिंह, वासुदेव, नवदुर्गा आदि के मंदिर भी यहां पर हैं. जोशीमठ का रिश्ता इतिहास की एक और बड़ी घटना से है. जोशीमठ से कुछ 15 किलोमीटर दूर एक गांव पड़ता है. रैणी नाम का. मार्च 1974 की में इसी गांव की रहने वाली गौरा देवी गांव की औरतों को लेकर जंगल पहुंची. और उनसे चिपट गई. पेड़ काटने वाले लोगों को चेतावनी देते हुए उन्होंने कहा, “अगर पेड़ काटने हैं तो पहले हम पर गोली चलाओ”. यहां से शुरुआत हुई चिपको आंदोलन की. जिसके चलते सरकार को झुकना पड़ा और इस इलाके में पेड़ काटने पर रोक लगा दी गई. वर्तमान आपदा से इस आंदोलन का एक रिश्ता ये भी है कि कुछ वक्त पहले आपदा के कारण गौरा देवी की मूर्ति रैणी से जोशीमठ तहसील में ट्रांसफर करनी पड़ी थी. तो ये सिर्फ किसी शहर के दरकने की घटना नहीं है, बल्कि हमारे पुरखों का समृद्ध इतिहास उन दरारों में फंसा हुआ है. सुनिए यहां के इतिहास पर लंबे समय से जोशीमठ की लड़ाई लड़ रहे स्थानीय एक्टिविस्ट अतुल सति क्या कहते हैं
"कहा जाता है कि कत्यूरी वंश के यहां से जाने का एक कारण प्राकृतिक आपदा भी था. हजारों साल पुराने शहर को सरकार एक बड़े पनबिजली प्रोजेक्ट के चलते बर्बाद करना चाहती है. सरकार चाहती तो यहां कई छोटे-छोटे हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी प्रोजेक्ट लगा सकती थी, जिससे पर्यावरण पर भी इतना असर नहीं पड़ता. लेकिन सरकार का ये बड़ा लालच शहर के लिए खतरा बन गया है."
जिस लालच की बात अतुल सती ने कही, अब उसे जान लेते हैं. आपको याद हो तो फरवरी 2021 में ग्लेशियर टूटने की वजह से चमोली में मौजूद NTPC के प्लांट में तबाही हुई थी. दर्जनों लोगों की जान गई. स्थानीय लोग कहते हैं उसी एनटीपीसी की निर्माणाधीन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना इसकी जिम्मेदार हैं. जोशीमठ की पहाड़ी के नीचे से सुरंग निकाली जा रही है. जोशीमठ में भूमिगत टनल के निर्माण को लेकर विस्फोट किए गए थे, जिसकी वजह से हालत खराब हो रही है. इसके अलावा हेलांग विष्णुप्रयाग बाईपास की खुदाई को भी समस्या का कारण माना जा रहा है.
ऐसा नहीं है कि ये आपदा कोई अचानक से आ गई है. 1976 यानी आज से 48 साल पहले, जोशीमठ पर बढ़ते इस खतरे पर मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट में आगाह कर दिया गया था. 1976 में जब उत्तराखंड यूपी का हिस्सा हुआ करता था, तब तत्कालीन गढ़वाल के कमिश्नर एमसी मिश्रा की अध्यक्षता में 18 सदस्यीय टीम ने एक रिपोर्ट तैयार की थी. जिसमें शहर के धंसने का जिक्र है. बढ़ती जनसंख्या की वजह से हुए भवन निर्माण से सत्तर के दशक में भी लोगों ने भूस्खलन और सड़क में दरार की शिकायत की थी. जिसके बाद कमेटी बनी, रिपोर्ट के मुताबिक जोशीमठ प्राचीन भूस्खलन क्षेत्र में मौजूद है और ये शहर पहाड़ से टूटे टुकड़ों और मिट्टी के अस्थिर ढेर पर बसा है. जिसकी वजह से नींव कमजोर है. समिति ने भूस्खलन और भू-धसाव वाले क्षेत्रों को ठीक कराकर वहां पौधे लगाने की सलाह दी थी, बड़े निर्माण ना करने की चेतावनी भी.
साल 2001 में उत्तराखंड स्पेस एप्लिकेशन सेंटर के निदेशक MPS बिस्ट और पीयूष रौतेला ने भी एक ऐसा ही रिसर्च सबमिट की थी, जिसमें जोशीमठ के सेंट्रल हिमालयन और भूकंप जोन होने की बात लिखी गई थी. तमाम संकेतों और सुझावों को दरकिनार किया गया. किसी सरकार ने इस दिशा में काम नहीं किया. नतीजा सामने है. सुनिए स्थानीय एक्टिविस्ट और क्या वजह मानते हैं
इसके अलावा अलकनंदा और धौलीगंगा दोनों ही नदियां जोशीमठ शहर के नीचे की मिट्टी का कटान कर रही हैं, जानकार मानते हैं कि भूस्खलन के मामले में ये क्षेत्र ज्यादा संवेदनशील है. हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि शहर में ड्रेनेज सिस्टम न होने की वजह से ज्यादा समस्या हो रही है. यहां पर्यटकों की लगातार बढ़ रही संख्या और अनियोजित विकास भी समस्या की वजह है. जोशीमठ में भारी भवन निर्माण की शुरुआत साल 1962 के बाद से हुई. 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद इलाके में तेजी के साथ सड़क मार्ग का विकास हुआ. सेना के कैंप बनने के अलावा हेलिपैड बने. शहर के बढ़ते महत्व को देखते हुए यहां बसावट बढ़ती चली गई. कई होटल खुले. लोगों ने कारोबार शुरू किया. औली और बद्रीनाथ समेत हेमकुंड साहिब तीर्थ ने उनके कारोबार को बढ़ाने के साथ-साथ इसे देशभर के लोगों का पसंदीदा शहर बना दिया. यहां कई ऐसे होटल हैं, जो 5 से 7 मंजिला तक बनाए गए. अब सबकुछ खतरे में है.
टाइम्स इंटरनेट की रिपोर्ट के मुताबिक देहरादून के वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने जोशीमठ में तेजी से हो रहे भू-धंसाव का अध्ययन किया है. उन्होंने आर्काइव सैटलाइट तस्वीरों की मदद से यह निष्कर्ष निकाला है कि जोशीमठ का रविग्राम हर साल 85 मिलीमीटर की रफ्तार से धंस रहा है. इसका मतलब यह भी है कि ये कोई भूस्खलन का असर नहीं है, बल्कि ये हर साल 85 मिलीमीटर की रफ्तार से धंस रहा है. जो बहुत ही ज्यादा यानी अलार्मिंग सिग्नल है. और जो सबसे दुखद बात है वो ये कि भू वैज्ञानिक ये मानते हैं कि अब इन दरारों को भर पाना लगभग असंभव है. एक पूरा शहर तबाह हो जाने की दिशा में बढ़ चुका है. सुनिए भू वैज्ञानिक डॉ एसपी सती बहुत गंभीर बात बता रहे हैं.
"जोशीमठ के धंसते हुए हिस्से को बचाया नहीं जा सकता. अब शासन और प्रशासन का ध्यान सिर्फ वहां रहने वाले लोगों को बचाने पर होना चाहिए."
मतलब साफ है कि स्थिति भयावह हो चली है. मकान-दुकान को छोड़ दीजिए, अब हजारों लोगों की जिंदगी खतरे में है. देर हो चुकी है, मगर अब प्रशासन हरकत में है. बिगड़ते हालात को ध्यान में रखते हुए जोशीमठ शहर में एनटीपीसी के तपोवन विष्णुगढ़ हाइड्रोपावर प्लांट पर काम रोक दिया गया है. इसके साथ ही हेलांग बाइपास रोड के काम को भी रोक दिया गया है. साथ ही एशिया के सबसे लंबे रोपवे 'ऑली रोपवे' के परिचालन को भी रोक दिया गया है. स्थानीय प्रशासन के अलावा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि जोशीमठ में स्थिति पर करीब से नजर रखी जा रही है, भूकंप के अत्यधिक जोखिम वाले ‘जोन-5’ में आने वाले इस शहर का सर्वे करने के लिए विशेषज्ञों का एक दल भी गठित किया गया है. मुख्यमंत्री दौरा करने वाले हैं.
दुर्भाग्य ये है कि सरकारें तब जागती हैं, जब जिंदगियां खतरे में आ चुकी होती हैं. एक समृद्ध विरासत, अध्यात्म, धर्म और पर्यटन का शहर, जहां जमीन के नीचे की धूल धीरे-धीरे गुबार का शक्ल ले रही है. वक्त रहते अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो किस्से कहानियों में ही जोशीमठ रह जाएगा. यहां के पहाड़ अब और बोझ बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं और ना ही किसी सुरंग की सुराख सहने की.





















