"मैंने बिना किसी शर्त के कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली है. मेरा मकसद कर्नाटक में चल रहे जेडीएस और बीजेपी के अनैतिक गठबंधन को पटखनी देना है. लेकिन मैं यह नहीं कहूंगा कि मेरी कोई महत्वाकांक्षा नहीं है. राजनीति में हर कोई कुछ न कुछ बनने आता है. हम लोग संन्यासी नहीं हैं."
कर्नाटक: सोनिया, राहुल और खरगे सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार में से किसे CM बनाएंगे?
क्या सिद्दारमैया एक बार फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने वाले हैं?


22 जुलाई 2006. कांग्रेस की सदस्यता लेने के बाद सिद्दारमैय जब ये बयान दे रहे थे तो उनके बगल मल्लिकार्जुन खरगे भी खड़े थे. और मंच पर सोनिया गांधी भी मौजूद थी. कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद 15 मई, 2023 को सिद्दारमैया पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से मुकालात कर रहे थे तब भी उन्होंने शायद यही बयान दोहराया होगा कि- "राजनीति में हर कोई कुछ न कुछ बनने आता है."
क्या सिद्दारमैया एक बार फिर कर्नाटक के मुख्यमंत्री बनने वाले हैं? ये सवाल हर किसी के ज़हन में हैं? लेकिन उससे भी बड़ा सवाल ये है कि
>1989 में देवगौड़ा को हराने वाले,
>2002 में महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार के लिए सहारा बनने वाले.
>2017 में सोनिया गांधी के खासमखास अहमद पटेल को राज्यसभा पहुंचाने में संकटमोचक की भूमिका निभाने वाले.
>कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष.
और इस बार मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार डीके शिवकुमार को पार्टी मनाएगी कैसे?
इन सारे सवालों पर लौटेंगे लेकिन पहले बात सिद्दू की. जी हां, सिद्दारमैया को कर्नाटक में कई लोग इसी नाम से जानते हैं. उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत ही कांग्रेस के विरोध से की थी. वो नेता जो कभी देवगौड़ा का सबसे चहेता था. लेकिन पुत्रमोह ने देवगौड़ा को सिद्दारमैया से दूर कर दिया. और नतीजा ये हुआ कि आज देवगौड़ा अपने ही गढ़ में अपनी साख बचाने में नाकामयाब होते दिख रहे हैं.
2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जनादेश त्रिशंकु था. बीजेपी 79 सीट के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. 65 सीटों के साथ कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही. 58 सीटों के साथ सत्ता की चाबी जेडीएस के हाथ में आ गई. चुनाव के बाद जनता दल और कांग्रेस के बीच सेकुलरिज्म के नाम पर समझौता हो गया. सत्ता का बंटवारा महाराष्ट्र मॉडल पर किया गया. इसके तहत मुख्यमंत्री की कुर्सी कांग्रेस के पास रहने वाली थी और दूसरे बड़े मंत्रालय जेडीएस के पास जाने थे. धरम सिंह कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री बने और सिद्धा को जेडीएस के खाते से उपमुख्यमंत्री बनाया गया. देवेगौड़ा परिवार का सियासी रसूख बनाए रखने के लिए उनके बड़े बेटे एचडी रवन्ना को PWD और सिंचाई विभाग की कमान दे दी गई.
लेकिन यह दौर नए नायकों के उभरने का था. देवेगौड़ा के छोटे बेटे एचडी कुमारस्वामी को विधायक होने के बावजूद धरम सिंह के मंत्रिमंडल में कोई जगह नहीं दी गई थी. इसके बजाए उन्हें पार्टी का काम देखने के लिए कह दिया गया था. कुमार ने एक साल के भीतर जेडीएस के संगठन पर मजबूत पकड़ बना ली. इस दौरान उनकी नजर उपमुख्यमंत्री के पद पर लगी हुई थी. धीरे-धीरे उन्होंने सिद्धा की जड़ें काटनी शुरू कर दीं. वो पार्टी दफ्तर में बैठकर सिद्धा के मंत्रालय से जुड़े प्रस्ताव पास करते और उन्हें लागू करने के लिए भेज देते. सिद्धा अपने काम में इस किस्म की दखलंदाजी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं थे. वो कुमारास्वामी की बातों को सुना-अनसुना करने लगे.
कुमारास्वामी और सिद्धा के बीच का यह टकराव काफी बढ़ चुका था. सिद्धा को उम्मीद थी कि देवेगौड़ा अपने बेटे की तरफ से की जा रही ज्यादती को बंद करवाएंगे. इसके उलट वो चुपचाप इस खटपट को देखते रहे. आखिरकार सिद्धा ने बगावत का मन बना लिया. 25 जुलाई 2005 को हुबली जिले में अहिंदा रैली थी. ‘अल्पसंख्यक, पिछड़े और दलितों के सियासी गठजोड़ को कन्नड़ में ’अहिंदा' के नाम से जाना जाता है. इस रैली में लगे बैनर खुले तौर पर बगावत का ऐलान कर रहे थे. पीले रंग के इन बैनरों पर कन्नड़ में लिखा हुआ था, "अन्डू देवराज अर्स, इन्डू सिद्धारमैया". इसका हिंदी तर्जमा इस तरह से होता है, "तब देवराज अर्स, अब सिद्धारमैया."
सिद्धा के कदम ने देवेगौड़ा को चिंता में डाल दिया. उन्होंने सिद्धा के सफाए की योजना बनानी शुरू कर दी. 3 अगस्त 2005 को सिद्धा को जनता दल के विधायक दल के नेता के पद से हटा दिया गया. एमपी प्रकाश को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई. इसके दो दिन बाद 'पार्टी विरोधी गतिविधि' के चलते सिद्धा की प्राथमिक सदस्यता रद्द कर दी गई.
अक्टूबर 2005. सिद्धारमैया जेडीएस के खिलाफ दूसरी बड़ी बगावत को अंजाम देने जा रहे थे. उन्होंने सीके इब्राहीम, बीआर पाटिल, सी. नरसिंहप्पा को अपने खेमे में मिलाया और जेडीएस से अलग हो गए. उन्होंने अपनी पार्टी का नाम रखा 'अखिल भारतीय प्रगतिशील जनता दल'. कर्नाटक यह नाम पहले भी सुन चुका था. 2002 में रामकृष्ण हेगड़े और एसआर बोम्मई ने इसी नाम से एक पार्टी बनाई थी. यह पार्टी 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले जनता दल (यूनाइटेड) से मिल गई थी.
उस समय धरम सिंह सूबे के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. जेडीएस और कांग्रेस का गठबंधन सत्ता में था. धरम सिंह भी अंदरूनी तौर पर कुमारस्वामी की सरकार में दखलंदाजी से परेशान थे. दिसंबर 2005 में सूबे में पंचायत चुनाव हुए. इस चुनाव में कांग्रेस ने कई जगहों पर सिद्धारमैया की प्रगतिशील जनता दल का समर्थन कर दिया. इसके दो महीने के भीतर ही एचडी कुमारस्वामी ने औचक तरीके से कांग्रेस से समर्थन खींच लिया. वो बीजेपी के समर्थन से खुद मुख्यमंत्री बन गए.
जेडीएस और बीजेपी का गठबंधन सिद्धा के लिए मौका बनकर आया. 2006 की शुरुआत में उन्हें समझ में आ चुका था कि अपनी पार्टी बनाने का प्रयोग बहुत समझदारी भरा फैसला नहीं है. सो वो कांग्रेस में शामिल हो गए. उनके आने के बाद 2008 की मई में विधानसभा चुनाव हुए. और चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन कुछ सुधरा भी. लेकिन सत्ता भाजपा के हाथ ही गई. अगले कुछ महीनों में धरम सिंह, मल्लिकार्जुन खरगे, और एसएम कृष्णा जैसे सिद्धारमैया के तमाम प्रतिद्वंद्वी दिल्ली की राजनीति करने चले गए. सिर्फ एक चुनौती बची - डीके शिवकुमार.
2013 में कांग्रेस विधानसभा चुनाव जीती, तो सिद्धारमैया सीएम तो बने, लेकिन DK की उनकी नज़रों में बने रहे. अब जब सिद्दारमैया दूसरी बार CM बन सकते हैं, DK ही उनका रास्ता रोके हुए हैं. डीके ऐसा कर पा रहे हैं, तो उसकी वाजिब वजह भी है. डीके का कद ऐसे ही इतना बड़ा नहीं हो गया. ये आमफ़हम बात है कि शिवकुमार पार्टी के लिए फंड जुटाते हैं. 1999 के लोकसभा चुनाव में डीके शिवकुमार ने कुमारस्वामी को हरा दिया. फिर 2004 में कांग्रेस की तेजस्विनी ने देवगौड़ा को लोकसभा चुनाव हराया. माना जाता है कि देवगौड़ा की इस हार के सूत्रधार भी डीके ही थे. तेजस्विनी फिलहाल बीजेपी में हैं.
डीके के बढ़ते कद को देखते हुए उन्हें कांग्रेस की एसएम कृष्णा सरकार में मंत्री बनाया गया. डीके को शहरी विकास मंत्रालय का जिम्मा दिया गया. इस बीच डीके का राजनीतिक रसूख भी बढ़ा और संपत्ति भी. पर समय बदला और 2006 के बाद कर्नाटक की सत्ता से कांग्रेस की विदाई हो गई. अब डीके के बुरे दिन भी शुरू हो गए. अवैध संपत्ति के आरोप लगे. जांच एजेंसियों के रेडार पर आए. अवैध खनन की एक जांच में उनसे जुड़ी दो कंपनियों और उनके भाई और डीके सुरेश से जुड़ी एक कंपनी का नाम था. इन मामलों ने डीके के दामन पर दाग लगा दिया था.
2013 में राज्य में एक बार फिर कांग्रेस की वापसी हुई. कई नेता मुख्यमंत्री पद की लालसा लिए बैठे थे लेकिन जैसा कि हमने थोड़ी ही देर पहले आपको बताया, कुर्सी मिली सिद्दारमैया को. डीके यहां झटका खा गए. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि सिद्दारमैया ने डीके शिवकुमार को अपने मुख्य कैबिनेट में शामिल करने से ही मना दिया. सिद्दा ने कहा कि वो दागी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करेंगे. कहा जाता है कि भारी मान मुनव्वल और आलाकमान के लगातार बढ़ते दबाव के कारण किसी तरह डीके को 6 महीने बाद कैबिनेट में शामिल किया गया.
इस बार डीके को ऊर्जा मंत्रालय मिला. सत्ता में रहते हुए डीके की ऊर्जा भी बढ़ी, ताकत भी बढ़ी और संपत्ति भी बढ़ी. लेकिन डीके बिग पिक्चर में आए 2017 में. जब अहमद पटेल राज्यसभा का चुनाव लड़ रहे थे. सोनिया गांधी के इस सिपहसालार को राज्यसभा में जाने से रोकने के लिए अमित शाह ने पूरा जोर लगा दिया था. गुजरात कांग्रेस के विधायकों के लिए सेफ हाउस चाहिए था. तब न सिद्दारमैया को याद किया गया और न तब कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष जी परमेश्वर को. अहमद पटेल के लिए विधायकों को बचाकर रखने के लिए जिम्मेदारी दी गई डीके शिवकुमार को. उनके पास धनबल की कोई कमी नहीं थी.
डीके के ने ये काम बखूबी किया. अहमद पटेल राज्यसभा पहुंच गए. यहां कांग्रेस के लिए डीके की एक संकटमोचक के तौर पर इमेज बनी. फिर 2018 में जब कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की बारी आई तब भी डीके शिवकुमार का काफी एक्टिव रोल रहा. कुमारस्वामी सरकार में डीके मंत्री भी बने. डीके तब भी एक्टिव हुए जब कुमारास्वामी की सरकार गिराने के लिए 13 कांग्रेस और 3 जेडीएस विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. बागी विधायकों को मनाने के लिए डीके मुंबई के एक पांच सितारा होटल के बाहर बैठे दिखे. हालांकि तब काम बन नहीं सका.
राज्य में बीजेपी की सरकार बनने के बाद 2019 में डीके शिवकुमार को ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ़्तार कर लिया. करीब 50 दिन में जेल में बिताने के बाद डीके बाहर आए. डीके जब जेल में थे तब सोनिया गांधी उनसे मिलने गईं थी. ये बात नतीजों के दिन डीके ने मीडिया को बताई भी.
सोनिया का जेल में डीके से मिलने जाना अपने आप में बड़ी बात है. और सिद्दा का कुर्सी तक पहुंचने में सबसे बड़ा अड़ंगा भी यही है. बताया जा रहा है कि राहुल गांधी तो सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री बनाने का मन बना चुके हैं. लेकिन सोनिया की मुहर अभी नहीं लगी है. और सोनिया के मन में डीके शिवकुमार के लिए एक सॉफ्ट कॉर्नर तो है ही. और यहीं फंस रहा है पेंच.
दरअसल, डीके शिवकुमार कुर्सी पर अपना दावा छोड़ने को तैयार नहीं हैं. कांग्रेस आलाकमान को इस बात का आभास पहले से रहा भी होगा. सूत्र ये भी बता रहे हैं कि डीके चाहते हैं कि अगर ढाई-ढाई साल का फार्मुला तय हो तो उसे सार्वजनिक किया जाए. इस पर आलाकमान शायद ही राज़ी हो. डीके जानते हैं कि इस तरह के फॉर्मुले पहले भी बनाए गए हैं. लेकिन बाद में कारगार नहीं साबित होते.
हालांकि एक दिन पहले तक खराब तबीयत की बात कर रहे डीके अब दिल्ली पहुंच चुके हैं. यहां आकर उन्होंने प्रेस से कहा- मैं पार्टी लाइन को क्यों क्रॉस करूं. मैं धोखा नहीं दूंगा और ना ही मैं ब्लैकमेल करूंगा. जिनकी संस्कृति में ये है, उन्हें करने दीजिए.
कांग्रेस दफ्तर पर जमे पत्रकार इस बात का दावा कर रहे हैं कि देर भले हो रही हो लेकिन डीके को मना लिया जाएगा. क्योंकि सिद्दा का कद कर्नाटक में डीके से बड़ा है. सिद्दा का कर्नाटक में जनाधार है. उनकी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज अच्छी पकड़ है. और यहीं पर डीके पिछड़ते नजर आते हैं. डीके वोक्कलिगा समाज के नेता तो माने जाते हैं. वोक्कलिगा बाहुल दक्षिण कर्नाटक में इस बार कर्नाटक ने बेहतरीन प्रदर्शन भी किया. लेकिन बाकी जातियों में उनकी उतनी मजबूत पकड़ नहीं है.
सीएम रेस में डीके के पिछड़ने की एक वजह ये भी है कि कल जब जीते हुए विधायकों ने मुख्यमंत्री चुनने के लिए वोटिंग की तो सिद्दा, डीके से बहुत आगे निकल गए.
कांग्रेस के सामने एक चुनौती ये भी है कि अगर सिद्दा को मुख्यमंत्री ना बनाया गया तो रायता ज्यादा फैल जाएगा. डीके बार बार कह रहे हैं कि वो पार्टी को धोखा नहीं देंगे. वो पार्टी नहीं तोड़ेंगे. लेकिन सिद्दा को अगर मुख्यमंत्री नहीं गया और उन्होंने पार्टी तोड़ने की कोशिश की तो कांग्रेस ज्यादा मुश्किल में फंस सकती है. सिद्दारमैया जेडीएस के साथ ऐसा कर भी चुके हैं.
इस बीच ये भी चर्चा चल रही है कि अगर सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार की ये टसल दो तीन दिन और चली तो किसी तीसरे नाम पर भी गौर फरमाया जा सकता है. तो फिलहाल स्थिति ये है कि सुनील कोनुगुलु की स्ट्रैटेजी, डीके शिवकुमार का मैनेजमेंट और सिद्दारमैया के जनाधार ने कांग्रेस को कर्नाटक तो जिता दिया लेकिन मामला मुख्यमंत्री पद पर फंसा हुआ है.
लेकिन इस बीच ममता का एक बयान आज हर अखबार की हेडलाइन बन गया. ममता ने कहा-
जहां कांग्रेस मज़बूत है, वहां दूसरी पार्टियां उसका साथ दें. जहां दूसरी पार्टियां मजबूत हैं, वहां कांग्रेस जगह छोड़ दे. ममता ने ये भी कहा कि 2024 में कांग्रेस 200 सीटों पर मज़बूत है. ये पहली बार है, जब ममता ने कांग्रेस-सम्मत विपक्ष की बात की है. इससे पहले नीतीश और शरद पवार भी विपक्षी एकता की बात कर चुके हैं.
















.webp?width=120)

.webp?width=120)



