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सिर्फ अन्नू मलिक ही नहीं मजरूह सुल्तानपुरी भी हुए हैं ट्रोल

मजरूह नज्म लिखते. जर्राह उसकी पैरोडी लिख देता. इधर नज्म मार्केट में आई और उधर जर्राह की पैरोडी भी.

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फोटो - thelallantop
सोशल मीडिया पर किसी को ट्रोल करना 2016 में लोकप्रिय होता जा रहा मानव व्यवहार है. लेकिन सोसायटी में ऐसा 1945 के करीब भी हुआ. ट्रोलिंग, वो भी मजरूह सुल्तानपुरी की जो देश के सबसे महत्वपूर्ण और पॉपुलर शायरों और गीतकारों में रहे हैं. के एल सहगल का गाया जब दिल ही टूट गया हो या फिल्म जो जीता वही सिकंदर का गाना पहला नशा जिसे आमिर खान पर फिल्माया गया था, ऐसे अनेक गाने उन्होंने लिखे. उन्हें ट्रोल करते थे शायर मसीउद्दीन मसीह. मजरूह को नापसंद करने वाले जितने भी लोग थे, उनमें मसीउद्दीन सबसे खास थे. ये तब की बात है जब शायर के रूप में मजरूह का कद बढ़ रहा था. मुशायरों में वे पढ़ते तो कोई चूं तक नहीं करता. कहीं कोई शब्द मिस न हो जाए. तब मजरूह से ईर्ष्या करने और उन्हें फूटी आंख न पसंद करने वाले लोग कई थे. ऐसे ही लोगों ने मसीउद्दीन को सिर चढ़ा रखा था. इनके कहने पर मसीउद्दीन ने अपना नाम तक जर्राह रख लिया. इसके भी पीछे लॉजिक था. चूंकि मजरूह के नाम का अर्थ होता है घायल तो मसीउद्दीन ने जर्राह नाम चुना जिसका मतलब होता है इलाज करने वाला. अब मजरूह जैसे ही कोई नज्म लिखते. जर्राह तुरंत उसका मजाक उड़ाने के लिए उसकी पैरोडी लिख देते. इधर मजरूह की नज्म मार्केट में आई नहीं कि उधर उस पर लिखी जर्राह की पैरोडी भी. जर्राह को मजरूह से जलने वाले उनके दुश्मनों का साथ और बढ़ावा काफी मिला था. बहुत कम लोगों को पता है कि मजरूह पहले हकीमी किया करते थे. सुल्तानपुर के पलटन बाजार में उनकी दुकान हुआ करती थी. मसीउद्दीन, मजरूह के इस हकीमी पेशे का भी मजाक उड़ाया करते थे. मसीउद्दीन जर्राह एकदम हाथ धो के मजरूह के पीछे पड़ गए थे. उनकी हर नज्म और गजल की वे मौज लेते, इसकी उन्होंने खुली घोषणा भी की थी:- जर्राह हूं मैं सिन्फ़-ए-जराहत की कसम वो शेर पढ़ें और मैं ऑपरेशन कर दूं
  एक मुशायरे के दौरान मसीउद्दीन ने ये नज्म पढ़ी. इसका मतलब था कि शेर-ओ-शायरी खत्म हो गई है चलो. मजरूह आ रहे हैं अब तो गाना-बजाना होगा. इससे पता चलता है मसीउद्दीन, मजरूह से कितनी नफरत करते रहे होंगे:- बज़्मे अदब अब खत्म हुई अब चल दो ऐ मसीह मजरूह आ रहे हैं जनाब, सारंगी उठाइए
  मसीउद्दीन यानी जर्राह ने मजरूह को तंग करने के लिए क्या-क्या नहीं लिखा. उनको मुल्ला कहा, कौवा कहकर मजाक उड़ाया. खुद ही पढ़िए:- फिरऔन पे मूसा उतरे थे मजरूह के लिए जर्राह आया हो गई सारी हिक़मत ग़ायब मुल्ला गाए जा, कौवे गाए जा

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