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क्या है बिहार में हुए खेल की पूरी कहानी?

तेजस्वी यादव ने किसे फोन किया?

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जेडीयू और आरजेडी फिर से बनाएंगे सरकार (फाइल फोटो)

बिहार में अंतरआत्मा की आवाज़ ने अपनी फ्रीक्वेंसी बदल ली है. अपना वजूद बचा लेने की चाहत हो या फिर एक और बार पटना से दिल्ली को साधने की हसरत - वजह जो भी हो, नीतीश कुमार NDA से अलग हो गए और अपने पुराने ''ब्रदर बिहारी'' के पास चले गए. अभी ज़्यादा दिन नहीं हुए, जब नीतीश के सम्मानजनक पुनर्वास की बात होती थी. कयास लगते थे कि नीतीश राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति या फिर किसी महत्वपूर्ण राज्य के राज्यपाल बना दिए जाएंगे. और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी का अश्वमेध बिहार में आगे बढ़ेगा. लेकिन बिहार के घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जहां बात गैर-कांग्रेस विपक्ष की आती है, वहां भाजपा के लिए राह उतनी भी आसान नहीं. पार्टी इस बात से संतोष कर सकती है कि कभी न कभी तो उसे अपना रास्ता अलग करना ही था, सो आज सही.

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बिहार में नीतीश कुमार का इस्तीफा हो गया. नई सरकार का दावा हो गया. बन भी जाएगी. बाकी सबकुछ न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत कुछ देख सुन रहे होंगे. लल्लनटॉप शो में आज के सारे घटनाक्रम तो बताएंगे ही. मगर थोड़ा आगा-पीछा भी विस्तार से समझ लें तो कहानी ज्यादा दिलचस्प लगेगी. नीतीश कुमार के अद्भुत किरदार को समझने में भी आसानी होगी. बात को थोड़ा पीछे से शुरू करते हैं.

जेपी आंदोलन के दौरान बिहार में युवा आंदोलनकारियों की एक बड़ी खेप तैयार हुई. उसमें लालू भी थे, पासवान भी, शरद कुमार और नीतीश कुमार भी. जनता पार्टी 1988 में जनता दल हुआ और फिर जनता दल के भी टुकड़े हुए. बीते तीन दशकों से बिहार की राजनीति लालू यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. दोनों ने राजनीति की शुरुआत भी कमोबेश एक साथ या आस-पास ही की. लंबे समय तक दोनों साथ रहे. दोनों के बीच लंबे समय तक दूरी का भी इतिहास है. क्या है वो इतिहास?

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कांग्रेस के एक छत्र राज को खत्म करते हुए, 90 के दशक के शुरुआत तक दोनों ही जनता दल के चक्र तले राजनीति करते थे. चक्र तब जनता दल का चुनाव निशान था. वो दौर लालू यादव के जलजले का था. बिहार के सीएम थे और नीतीश कुमार का कद किसी सामान्य नेता सरीखा हो चुका था. फिर आता है 1994 का साल. नीतीश कुमार ने लालू यादव के जनता दल से अलग होकर पार्टी बना ली. पहले नाम रखा जनता दल (ज), ज का मतलब यहां जॉर्ज से था. क्योंकि जॉर्ज फर्नांडिज तब उसके नेता हुआ करते थे.

31 अक्टूबर 1994 को पटना के गांधी मैदान में एक बड़ी रैली हुई और जनता दल ज का नाम समता पार्टी रख दिया गया है. चुनाव निशान मिला जलती हुई मशाल. लालू और नीतीश की राहें तब पहली बार अलग हुईं. फिर आता है 1997 का साल. केंद्र में तीसरे मोर्चे की सरकार का दौर. जनता दल तब तक पैन इंडिया पार्टी हुआ करती थी. लालू यादव ने अध्यक्षी के सवाल पर पार्टी तोड़ दी. बिहार में 5 जुलाई 1997 को लालू ने RJD यानी राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया. इधर 1996 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की समता पार्टी ने पहली बार बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया. आगे चलकर शरद यादव के पास बची जनता दल का 1999 में समता पार्टी के साथ विलय भी हो गया. आगे चलकर यही पार्टी जेडीयू यानी जनता दल यूनाइटेड हो गई.

1999 में जनता दल का एक धड़ा तोड़ देवेगौड़ा ने जनता दल सेकुलर यानी JDS बना ली. जनता दल का चक्र अब तक विलुप्त हो चुका था, उसकी जगह लालटेन, तीर, अनाज उठाए महिला सरीखे निशानों ने ली थी. हम वापस से बिहार पर फोकस करते हैं. 2000 के साल के आस-पास बिहार में नीतीश कुमार की बीजेपी के साथ वाली राजनीति परवान पर थी. 1998 में वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री का ओहदा भी नीतीश संभाल चुके थे. 2000 का साल वो साल था जब पहली बार नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने. मात्र 7 दिन के लिए. बहुमत था नहीं, सरकार टिक नहीं पाई.

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चुनाव हुए तो 2001 में फिर से RJD की जीत हुई है, सीएम राबड़ी देवी बनीं. नीतीश वापस से केंद्र की राजनीति करने लगे. एक दफा और वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री बने. विपक्ष में रहे और बीजेपी के साथ ही राजनीति करते रहे. 2005 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू और बीजेपी गठबंधन की बंपर जीत हुई, नीतीश कुमार दूसरी बार और इस बार पूरी ताकत के साथ मुख्यमंत्री बने. नीतीश का काम जनता को पंसद आया और गाड़ी चल निकली. 2010 में फिर से जीते. एक ब्रीफ हिस्ट्री हो गई.

तो 1996 से चले आ रहे नीतीश-बीजेपी के अघट प्रेम में पहली बार दरार साल 2013 में आई. 17 साल का गठबंधन पहली बार नरेंद्र मोदी के नाम पर टूट गया. बीजेपी ने तब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया था. इसी बात से नाराज नीतीश कुमार ने बीजेपी से रास्ते अलग कर लिए. तब नीतीश की जेडीयू के पास अकेले दम पर 116 विधायक थे. बिहार में बहुमत का आंकड़ा 122 है. किसी के समर्थन की जरूरत पड़ी नहीं, इधर-उधर से ही मैनेज कर लिया गया. नीतीश कुमार का मोदी से नाराजगी और मधुर संबंधों का भी एक इतिहास है.

दरअसल 2002 के दंगों के बाद से ही नीतीश कुमार ने तत्कालीन गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी से दूरी बना ली थी. मुस्लिम वोटों के छिटकने का डर था. दोनों की दूरी को दूर करती एक तस्वीर साल 2009 में आई. पंजाब के लुधियाना में NDA की रैली के दौरान नरेंद्र, नीतीश कुमार हाथ उठाए नजर आए. दोनों के चेहरे पर मुस्कान थी. लगा कि अब ये दूरी खत्म हो गई है. मगर ऐसा हुआ नहीं. 2010 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी चाहती थी कि नरेंद्र मोदी बतौर स्टार प्रचारक बिहार में प्रचार करें. मगर नीतीश ने तब ऐसा होने नहीं दिया था. बात वही मुस्लिम वोटों के छिटकने की आशंका.

इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है. साल 2008 में बिहार में बाढ़ आई हुई थी. गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने बिहार को 5 करोड़ रुपये की मदद की. बात अंदर ही अंदर रही. 10 मई 2010 को चुनाव से ठीक पहले बिहार में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होनी थी. उसी बैठक के दिन सुबह-सुबह अखबारों में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की यही फोटो छपी और उसमें गुजरात की तरफ से बिहार को बाढ़ में की गई मदद का प्रचार किया गया. विज्ञापन किसने छपवाया, ये आज तक नहीं पता चला. मगर कहते हैं नीतीश कुमार इससे चिढ़ गए. उन्होंने विज्ञापन को एहसान लादने जैसा माना. उसी दिन नीतीश ने एक डिनर पार्टी रखी थी, जिसे कैंसिल कर दिया गया.

बाद में नरेंद्र मोदी की तरफ से इसे थाली छिनने जैसा बताया गया. नीतीश कुमार ने 5 करोड़ का चेक भी वापस कर दिया. दोनों के बीच तकरार वहीं से बढ़ती गई. जो 2013 में हुई टूट के तौर देखी भी गई. 2014 का चुनाव भी बीजेपी और जेडीयू ने अलग-अलग लड़ा. 27 अक्टूबर 2013 को पटना के गांधी मैदान में पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैली हुई. वहीं पर सारा गुबार निकाला गया. जो जेपी को छोड़ सकता है वो बीजेपी को क्यों नहीं छोड़ देगा. और भी बहुत कुछ कहा गया. नीतीश कुमार ने भी बीजेपी पर हमले करने का मौका नहीं छोड़ा.

नीतीश कुमार ने खीजते हुए कहा था, मिट्टी में मिल जाएंगे मगर आपके साथ नहीं जाएंगे. आपके साथ मतलब बीजेपी के साथ ना जाने से था. नीतीश कुमार ने ये बयान बीजेपी नेता नंदकिशोर के बयान के जवाब में दिया था. बोले ऐसे थे कि लगा ये पत्थर की लकीर हो जाएगी. मगर वैसा हुआ नहीं. 2015 का विधानसभा चुनाव आरजेडी, कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा. इस दौरान तो DNA तक पर पीएम मोदी ने सवाल उठा दिए. नीतीश ने भी खूब खरी खोटी सुनाई. 2017 आते-आते चीजें फिर बदली हैं. अंतरात्मा की आवाज नीतीश बाबू को झकझोरने लगी, सत्य फिर से परेशान होने लगा. पराजित ना हो इसलिए पाला बदलने की घड़ी आ गई. आपको याद होगा, उस दौरान IRCTC मामले में लालू परिवार के ऊपर छापेमारी हुई, जमीन घोटाले में तेजस्वी यादव का नाम आया. और तब नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार के मुद्दे का हवाला देते हुए लालू का साथ फिर छोड़ दिया. जो नीतीश ये कहते थे कि मिट्टी में मिल जाएंगे मगर बीजेपी के साथ नहीं आएंगे, वो यू-टर्न लेते हुए फिर से बीजेपी में आ गए.

नीतीश कुमार का एक वाक्य तब बहुत प्रसिद्ध हुआ था, अतंरात्मा की आवाज वाला. नीतीश जब बीजेपी के साथ 4 साल की रुसवाई के बाद गए तो उनकी तरफ से भी खुले दिल से स्वागत हुआ. जश्न मना. RJD कैंप ने पलटूराम की संज्ञा दी. लालू ने केचुली बदलने लेने वाला सांप कहा. rjd समर्थक बोले  जनादेश का अपमान हुआ. अब एक बार वक्त ने फिर से कांटा बदला है और नीतीश कुमार ने पाला. डायलॉग सेम है. कहने वाले किरदार बदल गए. 2017 में RJD कह रही थी जनादेश का अपमान हुआ, अब बीजेपी कह रही है जनादेश का अपमान हुआ. तब RJD पलटूराम कह रही थी, अब बीजेपी पलटी मारने वाला कह रही है. हालात के साथ जज्बात बदल चुके हैं.

रही बात सोशल मीडिया पर चर्चा की. जिन लोगों के लिए महाराष्ट्र की सरकार पलटना मास्टरस्ट्रोक था, उनके लिए बिहार में लोकतंत्र लुट गया. जनादेश का अपमान हुआ. जिनके लिए महाराष्ट्र में लोकतंत्र को लूटा था, उनके लिए बिहार मास्टरस्ट्रोक हो गया. बिना रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के हुए खेल को लोग उपलब्धि मान रहे हैं. खेमे बंटे हैं. भावानाओं से उनके-उनके पार्टी प्रेम का अंदाजा लगा सकते हैं.

आज सुबह 11 बजे के बाद जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस ने बारी-बारी से अपने विधायक दलों की बैठक की. प्लान पहले से ही तैयार था, बस ऐलान का इंतजार था. दोपहर के करीब 1 बजे ये खबर भी ब्रेकिंग की शक्ल में फूट गई. नीतीश कुमार ने NDA से अलग होने का ऐलान कर दिया. राज्यपाल हाउस पहुंचे और इस्तीफा भी दे दिया. इस दौरान राबड़ी आवास में तालियों की गूंज के बीच नीतीश कुमार का स्वागत हुआ. चाचा-भतीजे की जोड़ी एक बार फिर से बन गई.  

दोनों ने ही बीजेपी पर ताबड़तोड़ प्रतिक्रिया दी. नीतीश कुमार ने इशारों में कहा कि बीजेपी के साथ बहुत दिक्कत हुई. क्यों हुई वो हमारे लोग बता देंगे. तेजस्वी ने तो खुलकर कहा- बीजेपी क्षेत्रीय पार्टियों को खत्म करना चाहती है. नीतीश की पार्टी ने भी यही आरोप लगाया था, चर्चा टेप कांड की भी है. सूत्रों के मुताबिक जेडीयू के पास कुछ टेप हैं, जिसमें विधायकों की खरीद फरोख्त की बात है. कुल टेप की संख्या 3 बताई जा रही है. RCP सिंह के साथ बीजेपी पर आरोप लगाए जा रहे हैं और जेडीयू समर्थक कह रहे हैं कि ये नीतीश कुमार हैं, उद्धव ठाकरे नहीं. जबकि इसके जवाब में बीजेपी की भी प्रतिक्रिया आई.

जनादेश का अपमान, जनता सबक सिखाएगी. बीजेपी की ये प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी. जनता के बीच हर 5 साल में नेता पहुंचते हैं. चुनाव होता है. बिहार में नतीजे तय होते हैं. कभी बीजेपी हारती है, कभी आरजेडी-कांग्रेस हारती है. इन सबके बीच एक चीज सतत है, वो हैं नीतीश कुमार, हारे कोई भी मगर जीतते हर बार नीतीश कुमार ही हैं. आपको ऐसा उदाहरण भारतीय राजनीति में ढूंढे नहीं मिलेगा. नीतीश कुमार चुनाव किसी के साथ लड़ते हैं. सरकार किसी के साथ बना लेते हैं और दिलचस्प तो ये है कि तीसरे नंबर की पार्टी होने के बावजूद सीएम वही होते हैं. बीजेपी के लिए उन्हें सीएम बनाना मजबूरी थी तो सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद RJD के लिए भी मजबूरी सेम है. RJD, कांग्रेस, लेफ्ट, हम के समर्थन के बाद सरकार के पास 160 से ज्यादा का नंबर होगा, जो बहुमत के आंकड़े 122 से बहुत ज्यादा है.

रिकॉर्ड 8वीं बार नीतीश कुमार सीएम पद की शपथ लेंगे, ज्योति बसू के नाम पर सबसे लंबे समय तक सीएम रहने का रिकॉर्ड है. मगर 8 बार शपथ तो वो भी नहीं ले पाए थे. ये विरला रिकॉर्ड नीतीश कुमार के ही नाम है.
2000
2005
2010
2015 में दो बार, क्योंकि 2014 में मांझी को सीएम बनाया था, फिर हटाकर खुद बन गए थे.  
2017
2020
और अब
2022
कुल 8 बार. कई लोग तो मौज में कह रहे हैं नीतीश बाबू को अब सीएम पद की शपथ तो मुंह जबानी याद हो गई होगी. शपथ हो जाएगी, सरकार बन जाएगी. मंत्रिमंडल का बंटवारा भी हो जाएगा. मगर सवाल कि क्या खेल सिर्फ यहीं तक सीमित है या फिर लंबा है. निगाहें यहीं पर हैं या फिर 2024 के लोकसभा पर टिकी हैं.

भविष्य में क्या होगा, कोई कह नहीं सकता है. मगर ये बात तो सही है कि JDU, RJD, CONG, LEFT और तमाम छोटी-छोटी पार्टियों के गठबंधन का वोट शेयर देखेंगे तो 60 फीसदी के आस-पास बैठता है. जो बीजेपी के मुकाबले कहीं ज्यादा है. अगर ये गठबंधन 2024 का चुनाव भी साथ मिलकर लड़ता है तो निश्चित ही बीजेपी को बड़ी चुनौती मिलने वाली है. कई लोग कह सकते हैं कि यूपी में भी तो अखिलेश-मायावती साथ लड़े थे, क्या हुआ. मगर बिहार का संघर्ष, यूपी से बिलकुल अलग है. जातियों में बंटा जनाधार और उस जनाधार के अलग-अलग हिस्सेदार. जब बड़ी ताकतें साथ होती हैं, तभी जीत होती है. चाहे वो जेडीयू-बीजेपी हो या फिर जेडीयू-आरजेडी. दूसरी बात ये भी कि सूबे में सरकार होने का भी अपना अलग फायदा मिलता है. मगर सवाल है जनता को आज क्या मिला? या फिर 2017 में क्या मिला था? वो जनादेश किसी और गठबंधन को देती है, चुनाव बाद कोई और गठबंधन रूप ले लेता है. नेता अपने हिसाब से सत्ता बनाते-बिगाड़ते हैं, जनता हर बार सिर्फ दर्शक बनकर रह जाती है. 5 साल के इंतजार में…

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