रिजर्व बैंक देश के कुछ बैंकों में इस्लामिक विंडो खोलने के बारे में सोच रहा है. ये बैंक इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम पर आधारित होंगे. केंद्र और रिजर्व बैंक लम्बे समय से ऐसा सोच रहे थे. रिजर्व बैंक का कहना है कि जो लोग धार्मिक वजहों से बैंकिंग से दूर हैं, उन्हें इससे जोड़ा जाएगा. इसके लिए रिजर्व बैंक ने फाइनेंस मिनिस्ट्री को एक पत्र भी लिखा है. उसने कहा है कि हमारी बैंकिंग को अभी इस सिस्टम का अनुभव नहीं है. इसलिए इस दिशा में धीरे-धीरे कदम रखा जा सकता है. जब अनुभव बढ़ जाएगा तो इसे पूरी तरह लागू किया जा सकता है. इसके लिए एक रिपोर्ट भी तैयार की गई है, जिसे फाइनेंस मिनिस्ट्री को भेज दिया गया है. ये बैंकिंग सिस्टम ब्याज-मुक्त बैंकिंग का एक रूप है. क्या है इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम? इस्लामिक बैंकिंग शरिया के नियमों से चलती है. शरिया के मुताबिक इस्लाम में ब्याज हराम है. इस समय ऐसी व्यवस्था को शरिया कम्प्लायेंट फाइनेंस (Shariya Compliant Finance) कहा जाता है. इस्लाम में ये माना जाता है कि ब्याज लेने के चलते बहुत सारे लोगों के पैसे कुछ लोगों के हाथ में आ जाते हैं. कुरआन में ब्याज की जगह ज़कात की व्यवस्था है. इसमें कुछ लोगों का पैसा बहुत सारे लोगों के पास आ जाता है. कई मुस्लिम देशों में ये व्यवस्था लागू है. 20वीं सदी में इसके लिए अलग से इस्लामिक बैंक बनाए गए थे.
2014 तक इस तरह के बैंकों का शेयर वर्ल्ड इकॉनमी में एक प्रतिशत है. 2009 तक पूरे वर्ल्ड में इस्लामिक नियमों से चलने वाले 300 बैंक थे. इकॉनोमिक फर्म 'एर्न्स्ट एंड यंग' के अनुसार, इस्लामिक बैंक ज्यादातर मुस्लिम लोगों के ही कामकाज देखते हैं और ये बैंकिंग सिस्टम 2009 और 2013 के बीच 17.6 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ा. और ऐसा माना जाता है कि 2018 तक 19.7 प्रतिशत की दर से इस सिस्टम में बढ़ोत्तरी हो सकती है. इस सिस्टम को लेकर जानकारों के बीच मतभेद हैं.

- मलेशिया में एक इस्लामिक बैंक
किसी को अगर बैंक से पैसे लेकर कुछ सामान खरीदना हो तो बैंक खुद उस सामान को खरीद लेती है फिर उसे दूसरे खरीदार को लाभ के साथ बेच देती है. खरीददार बैंक को किश्तों में पेमेंट कर सकता है.
इसमें इंश्योरेंस किसी एक को न देकर कई लोगों को मिलाकर दिया जाता है.
सऊदी अरब, मलेशिया, बहरीन, कुवैत समेत तमाम इस्लामिक देशों में ये व्यवस्था लागू है. इस्लाम में ब्याज या सूदखोरी इसे रिबा कहा जाता है. इस्लामिक इकॉनोमिस्ट चौधरी और मलिक के हिसाब से खलीफा उमर के समय में ये व्यवस्था लागू थी. लेकिन सूदखोरी के बारे में इस्लामिक दुनिया में सारे लोग एक जैसा नहीं सोचते. 19वीं शताब्दी में सर सैयद अहमद खान के थॉट स्कूल का मानना है कि अवैध सूदखोरी और वैध सूदखोरी में अंतर है. अवैध सूदखोरी वो है जिसमें खुद के फायदे के लिए की जाए जबकि वैध सूदखोरी वो है जब बिजनेस या किसी इन्वेस्टमेंट के लिए ऐसा किया जाए.
20वीं सदी में ब्याज-मुक्त बैंकों में बढ़त आई. इस्लामिक स्कॉलर नईम सिद्दीकी, मौलाना मौदूदी, मुहम्मद हमीदुल्लाह ने इन्वेस्टमेंट और प्रॉफिट के लिए मुदारिब और रब उल माल की व्यवस्था के बारे में बताया. इसमें एक पार्टी इन्वेस्टमेंट करेगी और दूसरी पार्टी मुनाफा कमाएगी जिसे दोनों पार्टियों के बीच बांट दिया जाएगा. इन्वेस्ट करने वाले को रब उल माल कहा जता है और दूसरी पार्टी मुदारिब कहलाती है. इसमें ब्याज की कोई जगह नहीं होती.
इस्लामिक बैंक खोलने की शुरुआत 1950 में पाकिस्तान से हुई. 1963 में इजिप्ट के इकॉनोमिस्ट अहमद एल्नैगर ने इसे इजिप्ट में शुरू किया. इसे 1968 में सरकार ने बंद कर दिया. 1972 में फिर से शुरू हुआ और अब तक चल रहा है.इस्लामिक बैंकिंग पर केरल हाई कोर्ट 2011 में सुब्रमण्यम स्वामी ने केरल सरकार के एक फैसले को चैलेंज किया. सरकार ने इसे प्रमोट करने को कहा था. कोर्ट ने कहा था इससे देश के सेक्युलर फैब्रिक को कोई नुकसान नहीं होगा. इससे सभी लोगों का फायदा होगा न कि किसी एक धर्म के लोगों का.
इस्लामिक बैंकिंग सिस्टम का विरोध भी हो रहा है. कहा जा रहा है कि एक सेक्युलर देश में धर्म से चलने वाली व्यवस्था संविधान के हिसाब से ठीक नहीं है. बहुत से हिन्दू संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. लेकिन कुछ लोग ब्याज-मुक्त बैंकिंग का सपोर्ट भी करते हैं. 2008 के अंत में रघुराम राजन की अगुआई में बनी फाइनेंसियल रिफॉर्म्स की एक कमेटी ने कहा था कि देश में ब्याज-मुक्त बैंकिंग के मुद्दे पर गंभीरता से विचार की जरूरत है.
ये स्टोरी निशान्त ने की है.













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