भारत की राजधानी नई दिल्ली से तकरीबन दो हज़ार किलोमीटर दूर बसा समरकंद शहर इतिहास की कई दिलचस्प घटनाओं का गवाह रहा है. चौथी शताब्दी ईसापूर्व में इस शहर पर सिकंदर ने क़ब्ज़ा किया था. फिर 1365 ईसवी में समरकंद तैमूर वंश की राजधानी बना. समरकंद अतीत में व्यापार के लिए बने सिल्क रूट का अहम हिस्सा भी था. फिलहाल, समरकंद मध्य एशिया के देश उज़्बेकिस्तान के सबसे अहम शहरों में से एक है.
पीएम मोदी, जिनपिंग,शहबाज़ एक मंच पर क्या करने वाले हैं?
शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (SCO) की पूरी कहानी क्या है?


दरअसल, इस शहर में एक ऐतिहासिक सम्मेलन का आयोजन होने वाला है. 15 और 16 सितंबर को. इसका नाम है, शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (SCO) समिट. इस साल का SCO समिट कई मायनों में दिलचस्प है. साथ में विडंबनाओं से भी भरा हुआ है. इस समिट में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़, चीन के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी समेत कई बड़े नेता हिस्सा ले रहे हैं.
ये दिलचस्प और विडंबनाओं से भरा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच सीधे कूटनीतिक रिश्ते नहीं हैं. भारत और चीन के बीच सीमायी विवाद चल रहा है. रूस और ईरान पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंध का सामना कर रहे हैं. भारत पश्चिमी देशों से संतुलन बनाकर चलने की कोशिश कर रहा है.
इन सबके बीच इन देशों के शीर्ष नेता आपस में मंच साझा कर रहे हैं. इस नाते SCO समिट की अहमियत काफ़ी बढ़ जाती है.
तो, आज हम जानेंगे,
शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (SCO) की पूरी कहानी क्या है?
इस साल के SCO समिट पर पूरी दुनिया की नज़र क्यों है?
और, भारत को इस समिट से क्या उम्मीदें हैं?
1990 का दशक था. सोवियत संघ का विघटन हो चुका था. इस विघटन से मध्य-एशिया में कई नए देश अस्तित्व में आए. मसलन, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान और कज़ाक़स्तान. ये देश दो बड़ी शक्तियों से घिरे हुए थे. रूस और चीन. इन सबके बीच सीमाओं को लेकर विवाद चल रहा था. बॉर्डर पर भारी संख्या में आर्मी तैनात थी. 1990 के दशक में नए बने देशों की चिंताएं अलग थीं. उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना था. अर्थव्यवस्था मज़बूत करनी थी. दुनिया में अपनी राजनैतिक पहचान कायम करनी थी. इन सबकी बजाय वे आपसी तकरार में व्यस्त थे. हर समय झगड़े की चिंता बनी रहती थी.
इसी दौर में पांच देशों ने एक बड़ी पहल की. 1996 में चीन, रूस, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और कज़ाकस्तान के नेता शंघाई में जमा हुए. उनके बीच तीन मुख्य बिंदुओं पर सहमति बनी.
पहला बिंदु, सदस्य देश एक-दूसरे पर भरोसा करेंगे.
दूसरा, सदस्य देश सीमा पर तनाव को कम करेंगे.
और तीसरा, सदस्य देश आपस में सहयोग बढ़ाएंगे.
चूंकि ये बैठक चीन के शंघाई में हुई थी और इसमें पांच देशों ने हिस्सा लिया था. इसलिए, इसको शंघाई फ़ाइव के नाम से जाना गया. शंघाई फ़ाइव में शामिल देश हर साल मिलने लगे. इसका उन्हें फायदा भी मिला. उनके बॉर्डर्स पर चल रहा तनाव समय के साथ कम होता गया.
इसके बरक्स बाहर की दुनिया इतनी शांत नहीं रही थी. जैसे-जैसे 90 का दशक बीत रहा था, पूरी दुनिया में आतंकवाद की समस्या फैल रही थी. एशिया में इसका बड़ा केंद्र अफ़ग़ानिस्तान था. अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सरकार थी. तालिबान ने अपने राज में अलक़ायदा से लेकर चेचेन विद्रोहियों तक को शरण दी हुई थी. अफ़ग़ानिस्तान सेंट्रल एशिया से जुड़ा हुआ है. इसलिए, इसका ताप शंघाई फ़ाइव तक भी पहुंचा.
फिर आया साल 2001. जून महीने में शंघाई में सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों की बैठक हुई. इसमें तय हुआ कि संगठन का दायरा बढ़ाने की ज़रूरत आ चुकी है. तब शंघाई फ़ाइव में एक नए सदस्य की एंट्री हुई. ये था, उज़्बेकिस्तान. अब कुल सदस्य छह हो चुके थे. उसी मीटिंग में दो और बड़े बदलाव भी हुए.
पहला, सदस्य देशों ने मिलकर शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (SCO) की स्थापना के दस्तावेज पर दस्तखत किए. इस तरह शंघाई फ़ाइव का नाम बदलकर SCO हो गया.
दूसरी चीज़ ये हुई कि SCO का मकसद बदल दिया गया. शुरुआत में इसकी स्थापना आपस में चल रहे तनाव को कम करने के लिए की गई थी. 2001 में इसके मकसद में आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ को जोड़ दिया. तय हुआ कि SCO के सदस्य देश इन समस्याओं से लड़ने के लिए आपस में सहयोग करेंगे.
फिर सितंबर 2001 में सदस्य देशों के प्रधानमंत्रियों की बैठक हुई. इसमें आर्थिक और व्यापारिक सहयोग बढ़ाने पर रज़ामंदी बनी. तब से हर साल सदस्य देशों के हेड ऑफ़ द स्टेट, हेड ऑफ़ द गवर्नमेंट और फ़ॉरेन मिनिस्टर्स की अलग-अलग बैठक आयोजित होती रही है.
SCO के इतिहास में दो साल बेहद अहम माने जाते हैं.2002 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुई बैठक में SCO के लक्ष्य, सिद्धांत, संरचना, गतिविधि, सहयोग-क्षेत्र और आपसी संबंध की सीमा तय की गई.
जबकि 2017 में कज़ाक़स्तान के अस्टाना में हुई बैठक में संगठन-विस्तार पर सहमति बनी. इसके बाद ही भारत और पाकिस्तान SCO के स्थायी सदस्य बनने में कामयाब हुए. उससे पहले उन्हें ऑब्जर्वर स्टेट्स का दर्ज़ा मिला हुआ था.
फिलहाल, इसमें कुल आठ स्थायी सदस्य हैं.
ताजिकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, कज़ाक़स्तान, रूस, चीन और भारत. ईरान 2023 में SCO का स्थायी सदस्य बन जाएगा.
अफ़ग़ानिस्तान, मंगोलिया और बेलारूस को ऑब्ज़र्वर स्टेट्स की केटेगरी में रखा गया है. यानी, ये देश भविष्य में SCO के परमानेंट मेंबर बन सकते हैं.
इन सबके अलावा, तुर्किये, श्रीलंका, कम्बोडिया, नेपा, अज़रबैजान, आर्मीनिया, सऊदी अरब, ईजिप्ट और क़तर SCO के डायलॉग पार्टनर हैं.
SCO का महत्व समझने के लिए कुछ आंकड़ों पर गौर कीजिए.
- दुनिया की 40 फीसदी से अधिक आबादी SCO के देशों में रहती है.
- इन देशों की कुल जीडीपी पूरी दुनिया की कुल जीडीपी का 30 प्रतिशत है.
- रूस और चीन यूनाइटेड नेशंस सिक्योरिटी काउंसिल के परमानेंट मेंबर्स हैं. जबकि भारत स्थायी सदस्यता के लिए संघर्ष कर रहा है.
- एक संस्था के तौर पर SCO को यूनाइटेड नेशंस में ऑब्जर्वर का दर्ज़ा मिला हुआ है.
- इन सबके अलावा, SCO के सदस्य देश आपस में मिलिटरी ड्रिल भी आयोजित करते रहते हैं.
ये तो हुआ आंकड़ा. अब सवाल ये उठता है कि SCO असल में कितना कारगर है?
जानकारों की मानें तो ये संगठन काग़ज़ पर भले ही ताक़तवर दिखे, लेकिन हक़ीक़त में ये गुट बहुत बंटा हुआ है. दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले दो देश भारत और चीन के बीच लंबे समय से सीमा पर विवाद चल रहा है. 2020 में गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद ये तनाव और बढ़ा है. उधर, 2014 के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक रिश्ते बंद पड़े हैं.
पिछले कुछ समय से रूस और चीन क़रीब तो आए हैं. लेकिन दोनों में से कोई अपने हितों को ताक पर नहीं रखेगा.
जब SCO की स्थापना हुई थी, तब अमेरिका काफ़ी नाराज़ हुआ था. उसका कहना था कि रूस और चीन मिलकर कोल्ड वॉर का नया दौर शुरू करना चाहते हैं. अमेरिका का ये दावा ग़लत साबित हुआ. कालांतर में SCO का फ़ोकस क्षेत्रीय एकता और आर्थिक सहयोग पर होता गया.
इस बार की SCO समिट ख़ास क्यों है?
सदस्य देशों के बीच भले ही कितना भी टकराव रहा हो, लेकिन SCO इस तनाव को कम करने में कारगर साबित हुआ है.
एक उदाहरण 26/11 के हमले का है.
नवंबर 2008 में मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था. इस हमले के तार पाकिस्तान से जुड़ रहे थे. इसको लेकर दोनों तरफ़ तनाव बढ़ गया था. फिर 2009 में SCO की बैठक के दौरान ही भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी की मुलाक़ात हुई थी. 26/11 हमले के बाद पहली बार दोनों देश एक साथ बातचीत की मेज़ पर बैठे थे.

2015 में भारत तत्कालीन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उफा में पाक पीएम नवाज़ शरीफ़ से मिले थे. तब दोनों देशों ने साझा बयान भी जारी किया था. लेकिन उसके बाद से दोनों देशों के बीच कोई द्विपक्षीय बातचीत नहीं हुई है.
इसी तरह सितंबर 2020 में रूस की पहल पर भारत और चीन के विदेशमंत्रियों की मीटिंग हुई थी. इसमें LAC पर बढ़े तनाव को कम करने की कोशिश की गई थी.
इस बार की समिट कई मायनों में खास है.
- इस बार का SCO समिट उज़्बेकिस्तान के समरकंद में आयोजित होगा. ये 15 को शुरू होकर 16 सितंबर तक चलेगा. ये SCO की 22वीं सालाना बैठक होगी.
- 2019 के बाद पहली बार SCO समिट आमने-सामने बैठकर हो रही है. इससे पहले कोरोना के कारण दो साल तक समिट वर्चुअली आयोजित हो रही थी.
- गलवान विवाद के बाद पहली बार भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने होंगे. अभी तक ये साफ़ नहीं हुआ है कि दोनों नेता अलग से मुलाक़ात करेंगे या नहीं. लेकिन इसकी पर्याप्त संभावना बन रही है.
- इसके अलावा, पीएम मोदी रूसी राष्ट्रपति पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से भी मिल सकते हैं. लेकिन इस बाबत अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी बाहर नहीं आई है.
- इस बार की समिट में रूस-यूक्रेन युद्ध का मसला छाया रहेगा. ईरान संगठन का सबसे नया-नवेला सदस्य बनने वाला है. रूस की तरह वो भी बेहिसाब आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. इस बैठक में इन प्रतिबंधों को लेकर भी चर्चा हो सकती है.SCO के बाकी सदस्य देशों ने पश्चिमी देशों को लगभग नज़रअंदाज किया है. उन्होंने दबाव के बावजूद रूस और ईरान के साथ रिश्ते कायम रखे हैं.
- तुर्किये नेटो का सदस्य देश है. वो SCO का डायलॉग पार्टनर है. तुर्किये ने पिछले कुछ समय में नेटो को किनारा कर अपनी शर्तों पर काम करने की कोशिश की है.
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