लेकिन कोई भी ऐसा संस्थान शुरू करने, या उसके लिए माइनॉरिटी स्टेटस मांगने से पहले दो शर्तें है जो पूरी करनी ज़रूरी होती हैं.
# जो भी अल्पसंख्यक समुदाय कॉलेज/यूनिवर्सिटी शुरू करना चाहता है, उसे ये साबित करना होगा कि वो धर्म या भाषा के आधार पर एक अल्पसंख्यक समुदाय है.
# जिसके लिए माइनॉरिटी स्टेटस मांगा जा रहा है, वो संस्थान उसी अल्पसंख्यक समुदाय के द्वारा शुरू किया गया है.
माइनॉरिटी संस्थानों के क्या अधिकार होते हैं ?
# ऐसे कॉलेज या यूनिवर्सिटी जो अल्पसंख्यकों के लिए बनाए गए हैं, उनको छूट होती है कि अपनी शर्तों के मुताबिक़ स्टूडेंट्स को एडमिशन दे सकें. लेकिन इसमें एक तय संख्या में नॉन-माइनॉरिटी यानी बहुसंख्यक समुदाय के स्टूडेंट्स का होना भी ज़रूरी है. कोई भी माइनॉरिटी संस्थान पूरी तरह से अल्पसंख्यकों के लिए रिजर्व नहीं किया जा सकता. अधिकतम 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित रखी जा सकती हैं.
# अगर राज्य इनकी प्रॉपर्टी लेता है, तो उन्हें कहीं और बराबर प्रॉपर्टी देनी होगी ताकि वहां संस्थान बनाया जा सके.
# संविधान के अनुच्छेद 15, जिसमें आरक्षण की बात कही गई है, के अनुसार इन संस्थानों पर जाति-आधारित आरक्षण लागू करने की कोई बाध्यता नहीं है.
# राईट टू एजुकेशन एक्ट में आर्थिक रूप से पिछड़े 6 से 14 साल के बच्चों को 25 फीसद आरक्षण मिलता है स्कूलों में. लेकिन माइनॉरिटी स्टेटस वाले स्कूलों के ऊपर ये बाध्यता नहीं होती.
# ये अपना अलग एडमिशन प्रोसेस रख सकते हैं, जो पारदर्शी और न्यायपूर्ण होना चाहिए. वो अपना अलग फीस स्ट्रक्चर भी रख सकते हैं.
कितने माइनॉरिटी संस्थान हैं देश में?अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने जुलाई, 2019 में लोकसभा में उठे एक सवाल के जवाब में बताया था कि अभी तक तकरीबन 13,555 शिक्षण संस्थान ऐसे हैं जिनको माइनॉरिटी स्टेटस दिया गया है. इनमें तकरीबन 26.45 लाख स्टूडेंट्स पढ़ रहे हैं. 2011 में माइनॉरिटी स्टेटस मिलने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने भी 50 फीसद सीटें मुस्लिम कैंडिडेट्स के लिए आरक्षित कर दी हैं.
माइनॉरिटी स्टेटस को लेकर बड़ी बहसमाइनॉरिटी स्टेटस को लेकर बड़ी बहस AMU में हुई थी. जब ये दावा किया गया था कि AMU एक माइनॉरिटी संस्थान नहीं है. 1875 में मदरसातुल उलूम के नाम से शुरू हुआ संस्थान बाद में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज के नाम से जाना गया. और 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना.
अज़ीज़ बाशा वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया केस (1968) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि AMU को ब्रिटिश संसद ने स्थापित करवाया था. मुस्लिमों ने नहीं. इसलिए उसे माइनॉरिटी स्टेटस नहीं मिलना चाहिए. 1981 में भारत की संसद ने AMU अमेंडमेंट एक्ट पास किया, जिसमें ये स्वीकार किया गया कि AMU मुस्लिमों ने ही स्थापित किया था. फिर 2005 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि AMU माइनॉरिटी संस्थान नहीं है. क्योंकि जो अमेंडमेंट लाया गया था, वो संवैधानिक नहीं था. सरकार थी कांग्रेस की लीडरशिप वाले UPA की. सरकार ने अपील डाली, इसे चैलेन्ज करते हुए. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद कोर्ट के निर्णय पर स्टे लगा दिया. इसके बाद 2016 में दोबारा बवाल मचा जब बीजेपी सरकार ने ये अपील वापस ले ली. AMU के नाम में मुस्लिम ज़रूर है, लेकिन यहां मुस्लिमों के लिए कोई रिजर्वेशन नहीं है. यहां सिर्फ प्रेफरेंस दी जाती है, लोकल कैंडिडेट्स को.
इस मामले पर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने केस की सुनवाई सात जजों की बेंच को रेफर कर दी है. उस पर अभी कोई निर्णय नहीं आया है.
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