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एनकाउंटर को रिपोर्ट करने में मीडिया ने एक बड़ी चूक कर दी

बहुत बार जो होता है, वो दिखता नहीं. किसी को 'आतंकवादी' कहने से पहले ये पढ़ लो!

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फोटो - thelallantop
भोपाल में जेल से कैदी भागे. दस घंटों के अंदर मारे गए. इसको मीडिया ने अलग-अलग तरीके से रिपोर्ट किया: rishabh NDTV ने इनको कैदी लिखा. वहीं न्यूज एजेंसी ANI ने उनको सिमी आतंकवादी बता दिया. पर दोनों बातों में बड़ा फर्क है. इतना कि ये फर्क देश की जनता को किसी का दुश्मन बना सकता है. लोग तो मीडिया की तरह काम करते नहीं. उन्हें एक शब्द दिखेगा आतंकवादी. बात वहीं रुक जाएगी.

पर जब मामला किसी की जान और देश के जुडिशियल सिस्टम से जुड़ा हो तो बात करनी पड़ती है. आइए देखते हैं, क्या-क्या मामला होता है बातों के बदलने से:

  जेल से भागे आतंकवादी. जेल से भागे कथित आतंकवादी. जेल से भागे अंडरट्रायल कैदी. इन तीनों वाक्यों में बड़ा फर्क है. ये तीनों वाक्य अलग-अलग पूरी व्यवस्था को खोल के दिखाते हैं. - पहले वाक्य से पता चलता है कि इन लोगों को कोर्ट में आतंक का अपराधी साबित किया जा चुका था. सारे सबूत इनके खिलाफ थे. ये लोग अपने पक्ष में कुछ नहीं दिखा पाए थे. और अब आतंक के जुर्म में ये लोग सजा काट रहे थे. - दूसरे वाक्य से पता चलता है कि ये अभी तक तय नहीं था कि ये अपराधी आतंकवाद फैलाने के दोषी थे या नहीं. ये भी हो सकता है कि ये रेप, मर्डर या चोरी के अपराधी हों. - तीसरे वाक्य से पता चलता है कि इनका अपराध अभी कोर्ट में सिद्ध नहीं हुआ था. केस चल रहा है. ये लोग ज्युडिशियल कस्टडी में हैं. तारीख पड़ने पर कोर्ट में जाएंगे. हो सकता है कि छूट भी जाएं. क्योंकि पुलिस ने शक के आधार पर गिरफ्तार कर लिया है. हो सकता है कि अपराध साबित हो जाए. पर नुक्कड़ पर चाय पी रही जनता को इनका फर्क नहीं समझ आता. इनके लिए ये सारे लोग एक झटके में आतंकवादी हो जाते हैं. जिनको मार देने में कोई बुराई नहीं है. कोर्ट में ट्रायल की जरूरत नहीं है. सजा की जरूरत नहीं है. कोई बात मत करो. सीधा गोली दाग दो. ऐसा लगता है कि देश के सारे लोगों की दमित हिंसा एक साथ सामने आ जाती है. आतंक के माहौल में ये स्वाभाविक भी है. सही-गलत का विवेक लोग नहीं कर पाते. जब किसी अपराध के संदेह में पुलिस किसी को गिरफ्तार करती है तो 24 घंटे के अंदर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना पड़ता है. फिर मजिस्ट्रेट की अनुमति से इसे बढ़ाया जा सकता है. क्योंकि पूछ-ताछ करनी होती है. अधिकतम ये 14 दिन तक किया जा सकता है. फिर 90 दिन के अंदर चार्जशीट दाखिल करनी होती है. अगर ऐसा नहीं हुआ तो अपने आप बेल मिल जाएगी. अगर दाखिल हो गई तो मजिस्ट्रेट अपना फैसला देगा कि क्या करना है. फिर केस चलेगा. सुनवाई होगी. इस दौरान केस के मुताबिक या तो बेल मिल जाएगी या फिर गंभीर मामलों में जुडिशियल कस्टडी में रखा जाएगा. इसे ही जेल में रहना कहते हैं. पुलिस के पास रहना लॉक-अप वाली बात होती है. कितनी ही फिल्मों में दिखाया गया है कि लॉक-अप में पीट-पीटकर पुलिस मार देती है. तो इसी से बचाने के लिए मजिस्ट्रेट के पास भेजना जरूरी होता है. क्योंकि पुलिस का काम है पकड़ना. पूछ-ताछ करना. सजा देने जज का काम है. अगर पुलिस सजा देने लगी तो ये जनता के लिए बड़ा ही भयावह हो जाएगा. हिटलर का राज हो जाएगा.
तो जो लोग जेल में रहते हैं और उन पर केस चलता है, उनको अंडरट्रायल कहते हैं. बहुत बार ऐसा होता है कि पुलिस किसी को पकड़ नहीं पाती किसी अपराध के मामले में. प्रेशर बहुत रहता है. ऐसी स्थिति में किसी को भी पकड़ लिया जाता है. केस चलता है. वक्त लगता है. पर तात्कालिक काम हो जाता है पुलिस का. लोग बाद में छूट भी जाते हैं. पर कोई हरजाना नहीं मिलता. बिना बात जेल में रहने का. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक बहुत सारे कैदी बिना किसी अपराध के 5 साल, 7 साल, 10 साल तक जेल में रह जाते हैं. क्योंकि उनकी सुनवाई का नंबर ही नहीं आता. कोर्ट में इतनी भीड़ है कि कोई देखता ही नहीं. इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे होते हैं जिनके अपने बेहद लाचार होते हैं. वकील नहीं कर पाते. कोई भी डांट के भगा देता है. किसी से अपनी बात नहीं कह पाते. आप आधा घंटा बात करें तो भी वो कुछ नहीं कह पाते. उनके पास शब्द ही नहीं होते हैं. उनकी जिंदगी बस खाना जुटाने में गुजरी है. लोगों की मार से खुद को बचाने में. वो बस यही कह पाते हैं कि मेरे बेटे को बचा लो. हमारा कोई नहीं है.
पर जब एक बार आतंकवाद का नाम जुड़ जाता है तो कोई सुनवाई नहीं होती. समाज ऐसे ही नफरत करने लगता है. कोई इंतजार नहीं करता कि अपराध सिद्ध हुआ है कि नहीं. सब जल्दी में रहते हैं. सब जज बन जाते हैं. फैसला दे देते हैं. खुद के पकड़े जाने का डर होता है, नहीं तो बहुत तो सजा भी दे देते. अपनी जिंदगी में इतनी फ्रस्ट्रेशन है कि दूसरों की जिंदगी से खेलना सुकून देता है. किसी को आतंकवादी बताकर अपने दिल की सारी घृणा उड़ेल देने थोड़ी शांति देता है.
1993 में तिहाड़ जेल में 7200 कैदी थे. जिसमें से मात्र 900 पर अपराध सिद्ध हुए थे. 280 महिला कैदियों में से मात्र 20 पर अपराध सिद्ध हुए थे. बाकी कैदियों का कोई माई-बाप नहीं था. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक 2014 में देश की 1387 जेलों में कैद लोगों में से 68% अंडरट्रायल ही थे. लगभग चार लाख बीस हजार कैदी थे. दो लाख अस्सी हजार इंतजार कर रहे थे केस की सुनवाई का. देश की आबादी का 14% हैं मुस्लिम, पर 21% अंडरट्रायल हैं.
तो अंडरट्रायल होना अपराध सिद्ध नहीं करता है. ज्यादातर अंडरट्रायल छूट जाते हैं. क्योंकि कोई अपराध सिद्ध नहीं हो पाता. पर छूटते हैं बहुत बाद में. तब तक वो अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा जेल में गुजार चुके होते हैं. पुलिस प्रताड़ना में. गंभीर अपराधियों के साथ. सेक्सुअल अपराध होने की आशंका में चौबीसों घंटे घिरे. किरण बेदी ने ही तिहाड़ जेल में रेप की घटनाओं के बारे में बोला था. गाहे-बगाहे ऐसी खबर आ जाती है कि सालों से अंडरट्रायल पड़ा हुआ था कैद में क्योंकि फाइन नहीं दे पाया था. सुनवाई नहीं हो रही थी. पर बहुत सारे ऐसे हैं जिनका कोई ठिकाना नहीं कि कब तक रहना है जेल में. तो किसी को आतंकवादी कहने से पहले सोच लेना जरूरी है. क्योंकि वो इंसान निर्दोष भी हो सकता है. जैसा कि बहुत सारे कथित आतंकवादी हुए हैं.

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