इंडिया में कई ऐसे शहर हैं, जहां मेट्रो चलती है. दिल्ली, कोलकाता, बेंगलुरु, मुंबई, जयपुर, कोच्चि और चेन्नई में मेट्रो ऑपरेट हो रही है. लखनऊ मेट्रो का ट्रायल हो चुका है और ऑपरेशन भी जल्दी शुरू हो जाएगा. कानपुर और बनारस जैसे शहर कतार में हैं. मेट्रो में सफर करने वाले लगभग हर ट्रैवेलर ने नोटिस किया होगा कि कुछ स्टेशनों के बीच में मेट्रो ट्रेन में लाइट चली जाती है. दिल्ली मेट्रो की बात करें, तो यहां येलो लाइन पर बने सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और उद्योग भवन मेट्रो स्टेशन के बीच ऐसा हर बार होता है. दूसरी लाइन के स्टेशनों पर भी ऐसा होता है.
ये मेट्रो ट्रेन के स्टेशनों के बीच बार-बार लाइट क्यों चली जाती है
सेंट्रल सेक्रेटेरिएट से उद्योग भवन वाली मेट्रो के बीच में ये खूब होता है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है? आइए बताते हैं.
मेट्रो बिजली से चलती है. इसके लिए इलेक्ट्रिकल ग्रिड से बिजली सप्लाई की जाती है. इलेक्ट्रिकल ग्रिड एक इंटर-कनेक्टेड नेटवर्क होता है, जिसका काम ही बिजली की सप्लाई करना होता है. तो मेट्रो के नेटवर्क को इलेक्ट्रिकल ग्रिड के जरिए आमतौर पर तीन फेज में बिजली सप्लाई की जाती है. कोई भी मेट्रो लाइन हो, उसमें एक निश्चित दूरी तय करके उसका फेज तय कर दिया जाता है. उतनी दूरी बीतने के बाद जब मेट्रो आगे बढ़ती है, तो उसे दूसरे फेज से बिजली सप्लाई की जाती है.

राजीव चौक मेट्रो स्टेशन
मेट्रो की दूरी को बांटकर अलग-अलग फेज से बिजली सप्लाई करने का मकसद ये होता है कि हर फेज पर बराबर जोर पड़े. किसी पर कम या ज्यादा नहीं. जैसे मान लीजिए कि दिल्ली मेट्रो की ब्लू लाइन नोएडा सिटी सेंटर से द्वारका तक जाती है. तो इस पूरे रूट को तीन हिस्सों में बांट दिया जाएगा. पहले हिस्से को पहले फेज से बिजली सप्लाई की जाएगी, दूसरे हिस्से को दूसरे फेज से और तीसरे हिस्से को तीसरे फेज से बिजली सप्लाई की जाएगी.
कोरा पर ये एक्सप्लेन करते हुए एल्सटॉम ट्रांसपोर्ट के लिए काम करने वाले नवीन एक डाइग्राम दिखाते हैं:-

तो इसकी वजह से मेट्रो में लाइट कैसे चली जाती है
इस डाइग्राम में आपको जो FP और TSS लिखा दिख रहा है, ये फीडिंग पॉइंट हैं. यानी वो जगह (सब-स्टेशन), जहां से मेट्रो नेटवर्क को बिजली सप्लाई की जाती है. दो अलग-अलग फेज से बिजली की सप्लाई को अलग करने और ये पक्का करने के लिए कि बिजली एक ही फेज से आ रही है, इसके लिए फेज अलग कर दिए जाते हैं. इसी वजह से लाइट चली जाती है. इसके लिए फेज-ब्रेक इक्विपमेंट इस्तेमाल किए जाते हैं.
इस पूरे प्रॉसेस में ट्रेन में क्या होता है
मेट्रो ट्रेन में ट्रैकसाइड इक्विपमेंट लगे होते हैं. इनकी वजह से जब ट्रेन फेज-ब्रेक इक्विपमेंट के नजदीक आ रही होती है, तो ट्रेन के अंदर लगे स्विच अपने आप बंद हो जाते हैं. इतनी दूरी तक ट्रेन में बिजली सप्लाई नहीं होती है और वो पिछले मोमेंटम की वजह से आगे बढ़ती है. फेज-ब्रेक इक्विपमेंट पार हो जाने के बाद ट्रेन के अंदर लगे स्विच अपने आप ऑन हो जाते हैं और ट्रेन को फीड नेटवर्क से बिजली मिलने लगती है, लेकिन नए फेज से.

जिस समय ट्रेन में बिजली सप्लाई नहीं हो रही होती है, तब तक उसमें सिर्फ इमर्जेंसी फीचर्स काम कर रहे होते हैं, जिनके लिए स्टैंडबाई बैट्री इस्तेमाल की जाती हैं. यही वो समय होता है, जब ट्रेन में सिर्फ इमर्जेंसी लाइट जल रही होती हैं.
मेट्रो ट्रेनों से जुड़े दूसरे आर्टिकल्स:
मेट्रो के हर लेडीज कोच में मिलेंगी ये 11 लड़कियां
दिल्ली मेट्रो में रोज दिखते हैं ये अजीब मर्द
इस प्यार भरे वीडियो को लोगों ने 'दिल्ली मेट्रो का सेक्स स्कैंडल' बना दिया
दिल्ली मेट्रो को किसी ने इन निगाहों से नहीं देखा होगा











