ये सावन की शिवरात्रि का दिन है और दी लल्लनटॉप हरिद्वार में है. यहां हर की पौड़ी से एक-डेढ़ किलोमीटर दूर टीन की चादरों से एक लंबी बैरीकेडिंग बनाई गई है. ये इंतजाम कांवड़ियों के लिए है. सावन में अपने प्रिय भोलेनाथ का अभिषेक करने के लिए कांवड़िए गंगाजल लेने हरिद्वार आते हैं. उत्तर प्रदेश से, दिल्ली से, हरियाणा से, राजस्थान से. लाखों की तादाद में. आज भी यहां लाखों कांवड़िए दौड़ते-भागते दिख रहे हैं.
कांवड़ के भोले की कहानी तो हर कोई बताता है, मिलिए भोली से
दी लल्लनटॉप की कांवड़ यात्रा में जल लेने आईं महिलाओं से बातचीत का हासिल.


मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने से बहुत पुण्य मिलता है. जो कांवड़िए इसी प्रयोजन से आए हैं, वो जल्दी में दिख रहे हैं. उन्हें आज ही गंगाजल लेकर अपने ठीहे पर पहुंचना है. बिना रुके. पर जो ऐसी किसी समय-सीमा से बंधे नहीं हैं, उन्हें देखना सुखद है. बाजार ने खुशियों की जो परिभाषा तय की है, ये उससे कोसों दूर हैं. घूमने पर पैसे खर्च करना या छुट्टी मनाना इनके लिए शौकीनी है. अपने खांचों में इन्हें खुश देखना आपको भी खुश करता है.
पर इन सुस्ताते 'भोलों' के साथ कुछ महिलाएं भी हैं. हां, कांवड़ पर जाने वाले सभी शिव-भक्त एक-दूसरे को इसी नाम से बुलाते हैं. भोले... अधिकतर समूहों में सिर्फ 'भोले' ही होते हैं. कांवड़ यात्रा में हमें इक्का-दुक्का महिलाएं ही दिखीं. इनमें भी अधिकतर के साथ सिर्फ उनके पति और बच्चे होते हैं. पर यहां हमारे ठीक सामने महिलाओं का एक बड़ा समूह बैठा है, जिसमें दादी से लेकर अबोध बच्ची तक... हर उम्र की 'भोलियां' हैं.

हां, ये नाम हमें पहले से नहीं पता था. उन्होंने ही बताया. बड़े उत्साह से. बोलीं, 'हां-हां, क्यों नहीं... हमारे भी नाम होते हैं. जैसे लड़कों को भोले कहते हैं, वैसे हम लोग एक-दूसरे को भोली बुलाते हैं.'
ये देश की वो औरतें हैं, जिनके शरीर पर हड्डियां छिपाने भर का ही मांस होता है. इनके दांतों पर पीले रंग की मोटी परत चढ़ चुकी होती है, पर जब ये हंसती हैं, तो खुलकर हंसती हैं. पर सामर्थ्य होते हुए भी इनकी रीढ़ में पुरुषों पर आश्रित होने का जो जीन फिट हो चुका है, पता नहीं इनका ईश्वर उसे कैसे देखता होगा.
हमने इन भोलियों से बात की, पर उसके पहले हमें इनके साथ मौजूद मर्दों की इजाज़त लेनी पड़ी. ये समूह कांवड़ियों के परंपरागत तरीके से सजाए गए एक ट्रक से हरिद्वार पहुंचा था. ट्रक पर पुरुष कम और महिलाएं ज्यादा थीं. पर हमें एक के बाद एक तीन पुरुषों को समझाना पड़ा कि हम उनके साथ आई महिलाओं के साथ क्यों और क्या बात करना चाहते हैं. वो राजी हो गए, पर ये भी मान बैठे कि महिलाओं से किए गए सवालों के जवाब देने की जिम्मेदारी उन्हीं की है. हमें टोकना पड़ा. फिर वो समझ गए.
हमसे बात करने से पहले वो दूर-दूर बैठी थीं. अलग-अलग. कुछ अपने-अपने कामों में लगी हुई थीं. पर बात करने के लिए वो सब इकट्ठा होकर बैठ गईं. सिर पर पल्लू रखकर. ढेर सारी महिलाओं को इस तरह साथ बैठे मैंने आखिरी बार अपने भाई की शादी के 'बुलावे' में देखा था. बात ठिकाने से शुरू हुई. वो सब मेरठ से आई थीं. इससे पहले भी आ चुकी थीं. कई सालों से आ रही थीं.

'कांवड़ में महिलाएं कम आती हैं. आप लोगों के साथ ऐसा नहीं लग रहा!' इसके जवाब में वो कहती हैं कि सबकी अपनी-अपनी भक्ति है. उनमें पीछे बैठीं 42-43 साल की एक महिला खुश होकर बताती हैं, 'हम तो कल शाम को ही जुड़े थे. पहले हम घर पर ही रुकने वाले थे. आज हम यहां बैठे हैं.' उनकी बात में 'चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है' वाली टोन है. उन्होंने बताया कि सामने जो ट्रक खड़ा है, उसमें 70 से ज्यादा लोग एक साथ आए हैं और उनके कुछ साथी दूसरी गाड़ियों से आ रहे हैं.
जब हमने पूछा कि क्या सारे लोग चले आए हैं, तो उनमें से एक बुजुर्ग बोलीं, 'नहीं-नहीं... ऐसे कैसे! घर में जरूर रुकता है कोई न कोई.' उनके कहे में शिकायत का भाव था कि तुम ये सोचने जितना बेवकूफ कैसे हो सकते हो कि हम घर पर ताला लगाकर चले आएंगे. उनकी इस बात से मुझे दिल्ली-NCR याद आ गया. यहां लोग आराम से घरों में ताला लगाकर चले जाते हैं. झुग्गियों से बड़ी-बड़ी इमारतों तक, सबका यही हाल है.
इसी समूह के कुछ पुरुष खाना खा रहे थे, जो उन्हीं महिलाओं ने तैयार किया था. हमने पूछा, 'यहां भी खाना आपको ही बनाना पड़ता है, मर्द कोई दिलचस्पी नहीं लेते?', तो वो सभी मुस्कुरा उठीं. ऐसा पहली बार हुआ था, जब महिलाओं से कोई सवाल किया गया था और पुरुष कुथ नहीं बोले. महिलाएं थोड़ा सकुचाते हुए बोलीं कि ये तो उनका काम है. वो करती हैं. घर पर भी करती हैं और यहां भी कर रही हैं. हरिद्वार आना शायद उनके लिए किसी इनाम जैसा था, जिसकी वजह से उन्हें ये रोजाना के काम काम नहीं लगते.

वहां कुछ महिलाओं ने सिर पर पल्लू डाला था और कुछ घूंघट में थीं. हमने पूछा कि क्या घर में पर्दा करना पड़ता है. वो बोलीं, 'हां'. फिर पूछा कि यहां इसकी क्या जरूरत है, तो सभी एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराने लगीं. पर्दे के सवाल पर किसी महिला ने कोई जवाब नहीं दिया, पर उनके चेहरे पर जो भाव आए थे, मुझे उम्मीद है कि मेरे पीछे बैठे मर्दों ने वो भाव देखे होंगे.

हरिद्वार में कांवड़ यात्रा पर आया एक परिवार
मध्य और निम्न मध्य वर्ग के परिवारों में कांवड़ यात्रा पिकनिक जैसी होती है. पर जो महिलाएं मेरे सामने बैठी थीं, उन्हें नहीं पता कि महीनों तक शरीर का भूसा करने के बाद चार दिन सुस्ताना कैसा होता है. उनकी डिक्शनरी में सुस्ताना नहीं होता. अखबार पढ़ने के सवाल पर सब जोर से 'हां' कहती हैं, पर दुनियादारी के सवालों पर सिर्फ मुस्कुराती हैं, जवाब नहीं देतीं. पता नहीं ये महिलाएं अपनी डिक्शनरी में 'बोलना' कब जोड़ेंगी.
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कांवड़ के भोले की कहानी तो हर कोई बताता है, मिलिए भोली से





















