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रामपुर के नवाबों का 300 साल पुराना खजाना कहां गायब हुआ?

सात दरवाज़ों के पीछे छिपा रामपुर के नवाब का खजाना, जिसकी कीमत करोड़ों आंकी गई थी, चोरी हो गया. कहां गया वो तख़्त जिसमें बैठकर नवाब भरे दरबार में फारिग होते थे?

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रामपुर के नवाबों के करोड़ों के ख़ज़ाने का बंटवारा करने के लिए साल (सांकेतिक तस्वीर: Pexels)

ये किस्सा है साल 1980 का. सितम्बर का महीना था. उत्तरप्रदेश के रामपुर में कोठी ख़ास बाग़ के आसपास कुछ बच्चे खेल रहे थे. इस दौरान एक बच्ची को जमीन पर चमचमाती हुई प्लेट दिखाई पड़ी. सोने की बनी हुई. बच्ची उसे अपने मां-बाप के पास ले गई. मां-बाप पुलिस के पास पहुंचे. और वहां से होते हुए सोने की प्लेट रामपुर के नवाब के पास ले जाई गई. नवाब ने जैसे ही उसे देखा, उनका चेहरा पीला पड़ गया.

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प्लेट के यूं मिलने का मतलब था, ख़ज़ाने की चोरी. वो खज़ाना, जिसकी कीमत आंकने के लिए आंकड़े कम पड़ जाते थे. जिसकी रक्षा के लिए गोरखाओं को लगाया जाता था. और जिस तक पहुंचने के लिए छह टन भारी, आठ फुट लम्बे लोहे के दरवाज़े को पार करना होता था. क्या थी रामपुर रियासत के ख़ज़ाने की कहानी? चलिए जानते हैं. 

रामपुर के नवाब 

ख़ज़ाने की ये कहानी शुरू होती है रामपुर रियासत के गठन से. साल 1774 में. पहले नवाब थे, फैजउल्लाह खान. उनसे पहले रोहिलखंड का इलाका, जिसमें रामपुर भी आता है, पूरा रोहिल्ला सरदारों के अधीन था. बल्कि रोहिल्ला सरदार नजीब खान ही वो शख्स था जिसने अहमद शाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण का न्योता दिया था. अब्दाली की जीत से रोहिल्ले काफी ताकतवर हो गए थे. और दिल्ली सल्तनत पर उनका सीधा दखल था. लेकिन 1773 में अवध के नवाब ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ मिलकर  रोहिलखंड पर हमला किया. और उनके इलाके पर कब्ज़ा कर लिया. 

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नवाब फैज़ुल्लाह खान और नजीब खान (तस्वीर: Wikimedia Commons)

इस मारकाट में सिर्फ एक रोहिल्ला सरदार बचा. फैजुल्लाह खान. फैज़ुल्लाह ने चार गांव बराबर जमीन लेकर एक नई रियासत बनाई. नाम दिया रामपुर. फैजुल्लाह ने 20 साल रामपुर पर राज किया. पर ये रियासत 1947 यानी देश की आज़ादी तक कायम रही. रामपुर के सेकेण्ड लास्ट नवाब का नाम था नवाब हामिद अली खान. उनके दौर में रामपुर उत्तर भारत का कल्चरल हब बना. उन्होंने संगीत के रामपुर घराने, कत्थक जैसी विधाओं को अपने दरबार में जगह दी. बेगम अख्तर जैसी हस्ती उनके दरबार में गाया करती थीं.

कोठी खास बाग 

हामिद अली के दौर में रामपुर भारत की सबसे अमीर रियासतों में से एक थी. इसका एक कारण रियासत चलाने वाले की सूझबूझ थी. और दूसरा, दिल्ली सल्तनत और बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी से उनकी नजदीकियां. इस वजह से उन्हें मुगलों के हीरे, मोती, अशर्फियां और जायदाद हासिल हुई. और इस तरह तैयार हुआ एक बेशकीमती खज़ाना. हामिद अली के बाद रज़ा अली खान रामपुर के नवाब बने. साल 1930 में. रज़ा अली खान के दौर में रामपुर में औद्योगीकरण की शुरुआत हुई. जिससे उनकी सालाना आमदनी एक करोड़ रुपए से ऊपर पहुंच गई.  नवाब रज़ा अली ख़ान के दौर में एशिया की पहली पूरी तरह एयर कंडीशन इमारत का निर्माण हुआ. इसे कहा गया कोठी खास बाग़. इसमें गर्म पानी के स्विमिंग पूल और मूवी थिएटर भी बनाए गए थे. लेकिन जो चीज इस इमारत को सबसे खास बनाती थी, वो थी, इसमें मौजूद एक तहखाना. जिसमें बेशक़ीमती  खज़ाना भरा हुआ था.

इसी ख़ज़ाने के चक्कर में आगे बहुत हंगामा हुआ. नवाब के बाद उनके बेटों में खटपट हुई. मामला अदालत पहुंचा. यहां तक कि कई बार ख़ज़ाने की चोरी की ख़बरें भी आई. ये भी कहा गया कि कोहिनूर के आकार के बराबर हीरे चोरी कर लिए गए. 

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खजाने में था क्या? 

इस सवाल का जवाब शायद कभी नहीं मिल पाता.  लेकिन 1980 में जब एक चोरी की तहकीकात के चक्कर में इसकी लिस्ट निकालने की कोशिश की गई, तो पता चला सरकारी ऑफिस से लिस्ट रातों रात गायब कर दी गई है. लाइव हिस्ट्री इंडिया नाम की एक वेबसाइट में अक्षय चवान ने इस खज़ाने के बारे में एक लेख लिखा है जिसमें कई दिलचस्प जानकारियां हैं. अक्षय ने भारत के आख़िरी वाइसरॉय लार्ड माउंटबेटन की डायरी से ख़ज़ाने का ब्यौरा हासिल किया है.

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खास बाग़ (तस्वीर: द ब्रिटिश लाइब्रेरी)

माउंटबेटन की डायरी के अनुसार ख़ज़ाने तक पहुंचने के लिए छह दरवाज़ों से होकर जाना पड़ता था. जिनकी सुरक्षा गोरखा पहरेदार करते थे. हर दरवाज़े की चाभी एक ख़ुफ़िया बक्से में रहती थी. और इन बक्सों की चाभी भी अलग-अलग आदमियों के पास रहती थी. चाबियों के अलावा तिजोरियों में दोहरे कॉम्बिनेशन वाले ताले लगे हुए थे. जिनका कोड सिर्फ़ नवाब और उनके एक खासमखास को ही पता था.

माउंटबेटन लिखते हैं, 

‘जवाहरात का बक्सा मेरे सामने खोला गया. इतने सारे जवाहरात देखकर मुझे लगा मानों मेरे सामने अरेबियन नाइट्स की कोई कहानी जिन्दा हो गई हो.’ 

इन जवाहरातों में दुनिया के सबसे मूल्यवान हीरों में से एक, एम्प्रेस ऑफ़ इंडिया शामिल था. इसके अलावा ख़ज़ाने में तीन हार थे. जिनमें अंगूठे के नाखून के बराबर मोती लगे हुए थे. खुले मोतियों की संख्या दस हजार थी. इसके अलावा पन्ना, रूबी, सोने के बने अमूल्य जवाहरात भी इस ख़ज़ाने का हिस्सा थे. 

भारत की सबसे बड़ी चोरी  

साल 1947 में आजादी के बाद इस ख़ज़ाने का मूल्यांकन किया गया. तब इसकी कुल कीमत साढ़े तीन करोड़ के आसपास लगाई गई थी. आजादी के वक्त रामपुर रियासत काफी महत्त्व रखती थी. इसलिए मुस्लिम लीग ने इसे पाकिस्तान में विलय कराने का दवाब डाला. हालांकि नवाब रज़ा अली ख़ान ने तुरंत रामपुर का भारत में विलय करा दिया. आगे चलकर ये उत्तरप्रदेश राज्य का हिस्सा बना. रामपुर रियासत की कहानी तो यहीं ख़त्म हो गई लेकिन ख़ज़ाने का खेल अभी बाकी था.

साल 1966 में आख़िरी नवाब रज़ा अली खान की मौत हुई. और उनके वारिसों में उनकी संपत्ति को लेकर विवाद शुरू हो गया. ये विवाद कोर्ट में ही था कि 1980 में ये खज़ाना एक और बार ख़बरों में आया. हेडलाइंस बनी, “भारत की सबसे बड़ी चोरी रामपुर में.”

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खास बाग़ में मौजूद स्ट्रांग रूम का दरवाज़ा (तस्वीर: India Today)

जैसा कि शुरुआत में आपको बताया, एक दिन किसी बच्चे को खासबाग महल के बाहर सोने की एक प्लेट मिली. नवाब रज़ा अली ख़ान के बेटे मुर्तज़ा अली खान कोठी की देखरेख किया करते थे. उन्होंने तुरंत तहखाना खुलवाया. CBI, CID सब पहुंचे. तहखाने का दरवाज़ा सही सलामत था. तीन फ़ीट मोटी दीवारें भी ज्यों की त्यों थीं. हां, तहखाने की छत में हुए छेद से रस्सियां लटकी हुई थीं. पता चलता था कि इसी छेद के जरिए ख़ज़ाने पर हाथ साफ़ किया गया. कमरे से खुदाई के उपकरण मिले. सिगरेट के ठूठों और पानी के भरे बर्तनों से पता लगता था, काम में कई दिन लगाए गए हैं. पुलिस ने चोरों की तलाश शुरू की. लेकिन चोर मिलना तो दूर, एक नई ही कहानी सामने आ गई. फॉरेंसिक टीम ने जांच में पाया कि छत पर बने छेद से कोई वयस्क तो क्या बच्चा भी अंदर नहीं आ सकता था. दूसरी दिलचस्प चीज ये थी कि छत से लटकी रस्सियों पर उतरने चढ़ने का कोई निशान नहीं मिला था.

मामला तब और उलझा जब चोरी के सामान का मिलान करने के लिए सरकारी दफ्तर से लिस्ट मंगाई गई. सालों पहले तैयार हुई ये लिस्ट भी गायब थी. मुर्तज़ा के भाई ज़ुल्फ़िकार ने इल्जाम लगाया कि ये काम किसी अंदर वाले का है. ज़ुल्फ़िकार ने ये भी दावा किया कि चोरी का खज़ाना बॉर्डर पार कर गया है. ये चोरी किसने की थी, और चोरी का सामान कहां गया. ये कभी पता नहीं चल पाया.

खुले दरबार में फारिग होते थे नवाब  

ख़ज़ाने में बची बाकी चीजों और नवाब की संपत्ति का मामला कोर्ट में चलता रहा. 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि शरीयत के हिसाब से नवाब की सम्पति का बंटवारा होगा. पुलिस की मौजूदगी में ख़ज़ाने का दरवाज़ा तोड़ा गया. कयास लगाए जा रहे थे कि अंदर से करोड़ों का खज़ाना निकलेगा. लेकिन जब दरवाज़ा खुला तो वहां एक चवन्नी भी नहीं मिली.

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हामिद अली खान और रजा अली  खान (तस्वीर: Wikimedia Commons)

ख़ज़ाने के अलावा रामपुर के नवाब का मशहूर सिहांसन भी गायब हो गया था. इस सिंहासन की कहानी भी अपने आप में काफी दिलचस्प है. इतिहासकार डोमीनिक लैपिये और लैरी कॉलिन्स ने अपनी किताब फ्रिडम एट मिडनाइट में इस सिहांसन का ब्योरा दर्ज किया है. जिसके अनुसार इस सिंहासन के बीचों-बीच एक छेद बनाया गया था. ऐसा नवाब की खास दरख्वास्त पर किया गया था. नवाब सिंहासन पर बैठे-बैठे बीच दरबार में निवृत होते थे. पूरी शाही गर्जना के साथ. उनका मानना था कि किसी भी हालत में बीच दरबार से उठकर नहीं जाना चाहिए. इसी कारण ये व्यवस्था की गई थी.

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