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वीरप्पन के ख़ात्मे में 007 का क्या रोल था?

20 मिनट में ख़त्म हुआ 20 साल का आतंक.

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1962 में 10 की उम्र में वीरप्पन ने पहला अपराध किया था. एक तस्कर का कत्ल किया था. उसी वक्त फॉरेस्ट विभाग के तीन अफसरों को भी मारा था (तस्वीर: AFP)
एक अच्छी कहानी कैसे लिखें?
इस सवाल पर थ्रिलर फ़िक्शन के माहिर लेखक स्टीवन जेम्स कहते हैं.
"सोचो कि एक कैटरपिलर ककून में प्रवेश करता है. जब वो ऐसा कर लेता है तो दो चीजें हो सकती हैं. या तो वो तितली बन जाएगा या मर जाएगा. लेकिन एक चीज़ कभी नहीं हो सकती. वो ये कि वो कैटरपिलर के रूप में ही ककून से बाहर निकल आए. ऐसा ही कहानी के मुख्य किरदार के साथ भी होता है.”
तारीख़ में हम फ़िक्शन की नहीं, रियलिटी की बात करते हैं. और चचा मार्क ट्वेन कह गए हैं, रियलिटी इस स्ट्रेंजर देन फ़िक्शन. यानी असलियत कल्पना से भी अद्भुत होती है. लेकिन हमने कहा, ऐसे तो मानेंगे नहीं. कुछ सबूत दो तो बात बने.
शायद ये बात चचा मार्क की आत्मा कहीं बैठी सुन रही थी. क्योंकि सबूत हमें मिला आज के किस्से में. जहां कैटरपिलर ककून में घुसा और दोनों चीजें हुईं. वो मर तो गया लेकिन कुछ और ही होकर बाहर भी निकला. कौन था ये कैटरपिलर, और हम किस ककून की बात कर रहे हैं. चलिए जानते हैं. चाय की टपरी 16 अक्टूबर का दिन. साल 2004. चाय की टपरी पर एक आदमी अकेला बैठा हुआ है. हाथ में चाय का ग्लास है. टेबल पर रखे झूठे ग्लासों से पता चलता है कि चाय इंतज़ारी में पी जा रही है. तभी एक दूसरा आदमी टेबल के दूसरी ओर आकर खड़ा हो जाता है. क्या ये वही है जिसका इंतज़ार हो रहा था? दूसरे आदमी की बातों से ऐसा लगता तो नहीं. दूसरा आदमी कहता है, भाई साहब आपको दिक़्क़त नहीं तो यहां बैठ जाऊं?
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1987 में वीरप्पन ने चिदंबरम नाम के एक फॉरेस्ट अफसर को किडनैप किया और 22 पुलिस वालों की हत्या कर दी (तस्वीर: Getty)

हां, हां क्यों नहीं, दूसरी तरफ़ से जवाब आता है. दूसरा आदमी बैठ जाता है और जैसे आमतौर पर दो अनजान लोग पेश आते हैं, दोनों अख़बार की हेडलाइन और राजनीति बतियाने लगते हैं. तभी दूसरा आदमी अपनी जेब से एक लॉटरी का टिकट निकालता है. टिकट के दो टुकड़े किए जाते हैं. और एक-एक टुकड़ा दोनों आदमी रख लेते हैं. ये हरकत इशारा है कि दोनों एक दूसरे को पहले से पहचानते हैं. फिर ये सब नाटक क्यों.
कुछ देर में दूसरा आदमी अपनी कुर्सी से उठता है. और अपनी वैन में बैठकर उसे सीधी रोड पर दौड़ा देता है. वैन अकेली नहीं है. उसका पीछा किया जा रहा है. कुछ किलोमीटर बाद वैन रुकती है. पीछा करने वाली गाड़ी भी रुकती है. वैन में से आदमी उतरता है और पीछा करने वाली गाड़ी के सामने जाकर खड़ा हो जाता है. दूसरी गाड़ी में से भी कुछ लोग उतरते हैं और उसे पास एक पेड़ के नीचे ले जाते हैं.
चाय की टपरी पर लॉटरी का एक टुकड़ा यहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है. उस पर लिखा है 007. जेम्स बॉन्ड का नम्बर. इत्तेफ़ाक समझिए या जो समझिए. ख़ैर आदमी और उन लोगों में आपस में कुछ बात होती है. और सब अपने अपने रास्ते निकल जाते हैं. इसके दो दिन बाद 18 तारीख़ को लॉटरी का टुकड़ा अपने बाकी बचे हिस्से से मिलता है. कहां?
तमिलनाडु और कर्नाटक के बॉर्डर पर मौजूद के एक जंगल के ठीक बाहर. दोनों टुकड़े आपस में मिलाए जाते हैं. किनारे फ़िट बैठते हैं और इशारों-इशारों में डील हो जाती है. दरअसल लॉटरी का टुकड़ा सिर्फ़ टुकड़ा नहीं है. बल्कि ऐसी चाभी है जिससे जुर्म का एक बहुत बड़ा ताला खुलने वाला है. और इस ताले के पीछे से एंट्री होती है एक ऐसे आदमी की जिसने 2 दशक तक तीन राज्यों की सरकारों की नाक में दम किया हुआ था. कूसई मुनिस्वामी वीरप्पन गाउंडर इस आदमी के ऊपर 184 लोगों की हत्या का दोष था, जिनमें आधे पुलिस वाले और फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर थे. इन हत्याओं के पीछे था करोड़ों रुपए के हाथी दांत और चंदन की लकड़ी की तस्करी का अवैध कारोबार.
ये आदमी था हैंडल बार मूंछों वाला खूंख़ार चंदन तस्कर, कूसई मुनिस्वामी वीरप्पन गाउंडर.
सरकार के लिए वीरप्पन कितना बड़ा सरदर्द था, इस बात से समझिए कि अपने गिरोह में अगर कभी उसने पूछा होता कि ‘कितना इनाम रखी है सरकार हम पर', तो कोई साम्भा जवाब दे रहा होता, ’52 करोड़ सरकार’. तुलना के लिए बता दें कि इससे बड़ा इनाम सिर्फ़ मुंबई अंडरवर्ल्ड सरग़ना दाऊद इब्राहिम के सिर पर है.
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साल 2000 में वीरप्पन ने दक्षिण फ़िल्मों के सुपरस्टार राजकुमार का अपहरण कर लिया था (फ़ाइल फोटो)

बहरहाल वापस 18 तारीख़ पर लौटते हैं. लॉटरी का आपस में मिलना इसलिए ज़रूरी था कि वीरप्पन के प्लान में कहीं पुलिस ने घुसपैठ ना कर ली हो. लेकिन घुसपैठ हो चुकी थी. 007 का टिकट दिखाने वाला स्पेशल टास्क फ़ोर्स (STF) का एक मुखबिर था. 11 महीने से पुलिस जिस ऑपरेशन की तैयारी कर रही थी, आज उसी का फ़ाइनल दिन था.
लॉटरी का टिकट मिलने के बाद वीरप्पन एक एंबुलेंस में बैठता है. कहां जा रहा था वीरप्पन-आरकोट. क्यों- ताकि अपनी आंख का इलाज करा सके. जिन मूंछों को ताव देकर उसके अपना हव्वा खड़ा किया हुआ था. उन्हीं मूंछों में एक दिन खिजाब लगाने के चक्कर में आंख में डाई की कुछ बूंदें गिर गई थीं. आंख की रोशनी कम होने लगी थी. इलाज कराना ज़रूरी था. इसी कारण उसे जंगल से बाहर निकलना पड़ा. ऑपरेशन ककून STF इसी दिन का इंतज़ार कर रही थी. जिस एंबुलेंस में वीरप्पन सवार था, वो भी STF की प्लांट की हुई थी. जिसका कोड नेम था ककून. एक ऐसा ककून जिसमें घुसने के बाद वीरप्पन दुबारा न उड़ पाए. जैसे ही एंबुलेंस रवाना होती है, वहां से कई कोस दूर STF ऑपरेशन की फ़ाइनल तैयारी में लग जाती है.
रात के 9.30 बजे का वक्त. पूर्णिमा को चार दिन गुजर चुके हैं लेकिन अपनी चौथी कला में चांद बादलों के पीछे जा छुपा है. चार इमली के पेड़ों के पीछे STF की टीम पोजिशन लेकर खड़ी हुई है. ऑपरेशन को लीड कर रहे हैं चेन्नई के पूर्व पुलिस कमिश्नर के. विजय कुमार.
STF की पोजिशन से ठीक 200 मीटर पहले एंबुलेंस से एक हाथ निकलता है, और 'थम्ब अप' का इशारा करता है. एंबुलेंस के पीले फ़ॉग लैम्प से 200 मीटर की दूरी से ही ऑफ़िसर कुमार को एक ज़रूरी सिग्नल मिल जाता है. पीली फ़ॉग लाइट के जले होने का मतलब है कि अंदर चार लोग हैं, जिनमें से एक वीरप्पन भी है. एंबुलेंस के ऊपर लगी नीली बत्ती भी जल रही है. इसका मतलब है चारों लोगों के पास हथियार भी हैं.
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वीरप्पन को मारने के लिये जो टास्क फोर्स बनाई गई थी, उस पर 100 करोड़ रुपये खर्च हुए थे (फ़ाइल फोटो)

एंबुलेंस को रोकने के लिए टीम ने रोड पर नारंगी टोपीनुमा बैरिकेडिंग लगा रखी है. तय वक्त पर एंबुलेंस आकर इमली के पेड़ों के आगे रुकती है. STF का एक मेम्बर कन्फ़र्म करता है कि अंदर वीरप्पन मौजूद है. पहली चेतावनी दी जाती है. वही पुलिसिया अन्दाज़ में, खुद को पुलिस के हवाले कर दो, एट्सेटरा एट्सेटरा.
जवाब में एंबुलेंस के अंदर से धड़ाधड़ गोलियां चलने लगती हैं. कुमार उस दिन अपने किसी टीम मेम्बर की जान जोखिम में डालने के मूड में नहीं थे. वो फ़ायरिंग का आदेश देते हैं और एंबुलेंस पर एक के बाद एक लगभग 100 राउंड फ़ायर किए जाते हैं.
कुमार अपनी टीम को रोक लेते हैं. एंबुलेंस के अंदर से बंदूक़ रीलोड करने की आवाज़ आती है. कुमार दुबारा फ़ायरिंग करने को बोलते हैं. इस बार 200 राउंड गोलियां दागी जाती हैं. फिर सब कुछ शांत हो जाता है. ये वो वीरप्पन नहीं कुमार और उनकी टीम एम्बुलेंस का मुआयना करते हैं. अंदर वो वीरप्पन नहीं, जिसकी ताव खाई मूंछें और उचकी हुई भौहें कभी अखबारों के फ़्रंट पेज पर हुआ करती थीं. नहीं, ककून से बाहर निकला वीरप्पन कुछ और ही हो चुका है. उसकी सिग्नेचर ग्रीन यूनिफ़ॉर्म और कमर की बेल्ट ग़ायब है. उसने सफ़ेद कपड़े पहने हुए हैं. ज़ाहिर है कि पुलिस से बचने के लिए ये सब किया गया है.
हैरत इस बात की है कि उसने अपनी मूंछें भी कतर डाली हैं. ख़ैर, जंगल में आवाज़ ना गूंजे, इस डर से कभी अपनी खुद की बच्ची का गला दबा डालने वाला वीरप्पन, जान बचाने के लिए मूंछों का बलिदान तो दे ही सकता था.
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ऑफ़िसर के विजय कुमार (तस्वीर: भारत सरकार)

100 करोड़ रुपए और 10 साल की कोशिश के बाद आज ही दिन यानी 18 अक्टूबर 2004 को वीरप्पन की कहानी ख़त्म हो गई. इसके बाद ऑफ़िसर कुमार तुरंत CM निवास फ़ोन लगाते हैं. एक साल पहले ही मुख्यमंत्री बनी जयललिता उस समय सो रही थीं. उनकी सेक्रेटरी जवाब देती है कि मैडम सोने जा चुकी हैं. कुमार उनसे कहते हैं,
‘मुझे लगता है, मैं जो खबर उन्हें सुनाने वाला हूं, उसे सुनकर वो बहुत खुश होंगी.’
कुछ देर में जयललिता फ़ोन पर आती हैं,
'मैम वी गॉट हिम.'
जयललिता नहीं पूछतीं, ‘गॉट हूम'
क्योंकि दो तरह के लोगों के लिए नाम नहीं पूछे जाते. एक वो जो अच्छे काम कर विख्यात हो जाएं और दूसरे वो जो कुख्यात हो जाएं. वीरप्पन किस श्रेणी में आता था. ये बतलाने की ज़रूरत नहीं.
ये आर्टिकल के लिए के. विजय कुमार की किताब 'वीरप्पन: चेसिंग द ब्रिगैंड' से मदद ली गई है.

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