मैंने जिस वक़्त उन्हें कॉल किया वो खेत में थे. उस खेत में जहां मूली लगी है, उनका खाना आजकल वही मूली, रोटी और नमक है. मैंने उनसे बात की तो वो कराह रहे थे, इस पूरी बातचीत के दौरान उनकी आवाज़ से उनका दर्द पता चल रहा था. मेरा फोन जाने के कुछ ही देर पहले उनके गांव के सरहंग उनको फिर पीट गए थे. ये कोई पहली बार नहीं है, इस साल में तीसरी बार है. वो लोग श्रीनिवास को जहां पाते हैं, दौड़ाकर पीट देते हैं.श्रीनिवास ने बताया वो गांव के बड़े लोग हैं, जेपी जायसवाल और उनके भतीजे, और एक नाम बताया गांव के केमला सिंह का बेटा जितेंद्र बहादुर सिंह उर्फ मिट्ठू. वही लोग उन्हें मारते और परेशान करते हैं. 10 साल से ज्यादा हुए, श्रीनिवास और उनके पिता राधेश्याम पासवान, कुछ डिसमिल जमीन के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काट रहे हैं, जो उन्हें 'आबादी' में मिली थी. ये खाली जमीन थी, जहां सरकार ने उनके बाबा और पिता को घर बनाने का पट्टा दिया था. लेकिन उस जमीन पर वो कभी रहने नहीं पाए. क्योंकि गांव के इन्हीं दबंगों ने वहां कब्जा कर रखा है. मामला सालों से कोर्ट में है. श्रीनिवास बताते हैं कि कोर्ट में अटकने की वजह भी है. दूसरी तरफ से पैसे का जोर जो ज्यादा है.
एक साल से ऊपर हुए, श्रीनिवास ने उनसे कुछ पैसे उधार लिए. लगभग 15,670 रुपये थे, 42 दिन में पैसे लौटा भी दिए. लेकिन उन लोगों ने तकाजा किया. कहा तुम पर 1570 रुपये और बाकी हैं. ये भी धौंस दी गई कि बदले में हमारे घर पर बेगारी करो, यही बात श्रीनिवास के लिए सबसे घातक साबित हुई. श्रीनिवास ने अपना हिसाब दिखाया. सिर्फ 650 रुपये बाकी थे, उस रोज़ श्रीनिवास कह गए कि तुम लोग क्यों एक का दो करके बताते हो. खून-पसीना चूसते हो. हमारे घर पर भी काम हो रहा है. हम काम कर देंगे लेकिन बीच में मत बुलाना. ये बात बड़े लोगों को बहुत खटकी.रेलवे का तार कटकर गिरा था, चोरी हो गया. श्रीनिवास बताते हैं, मिट्ठू बाबू की कृपा से उसमें आरोपी वो बने. दो-दो धाराएं लगीं. वो उस रोज़ कहीं न्यौते में गए थे. पुलिस ने बुलाया तो वो साथ चले गए. श्रीनिवास कहते हैं कि चोर होता तो डर लगता मैंने कुछ किया नहीं था. साथ चला गया. पुलिस से कैसा डर. लेकिन उन्हीं पुलिस वालों ने ले-जाकर गिराकर उन्हें पीटा. बंद कर दिया. दसियों दिन श्रीनिवास अंदर ही रहे. पिताने जिस वकील की मदद ली वो भी फर्जी निकला. जहां छह हजार लगने थे, 24 हजार में उन्हें छुड़वाया. बाकी के 24 हजार पुलिस की मार के निशान, दर्द और चोटों के इलाज में फुंक गए. अभी हाल ये है कि एक मुकदमा वो खुद का लड़ रहे हैं, दो उनके पिताजी की तरफ से लड़ रहे हैं, एक और मुकदमा था, जिससे हार कर हाथ ही खींच लिए. घर पर एक भैंस है, सुबह चार लीटर और शाम चार लीटर दूध देती है. हाथ में पैसे नहीं हैं, बिलकुल नहीं हैं. मूली बेचकर गुजारा कर रहे हैं. उसी से नमक-रोटी चल रही है. भैंस बेचना चाहते हैं, लेकिन बिक नहीं रही है. मोदी जी की दया से बदले में लोग पुराने नोट देना चाहते हैं जो कि चलते नहीं हैं. श्रीनिवास की कहानी इतनी ही है. इससे वो बाहर कैसे आएंगे ये उन्हें खुद समझ नहीं आता. लोग उनसे खार खाए हैं, उन्हें मारते हैं, उन्हें बेटियां पालनी हैं, पढ़ानी हैं,
श्रीनिवास का पिटना आम हो गया है. उनको अपनी मुसीबतों का कोई हल नहीं दिखता हेडलाइन में दलित देखकर भले लोग खिसिया जाते हैं. तर्क देते हैं हर चीज को क्यों दलित से जोड़ा जाता है. दलित के नाम पर चलाया जाता है. वो लोग तब कहीं नहीं दिखते जब श्रीनिवास जैसे लोग दौड़ाकर पीटे जाते हैं. उनसे बेगारी कराने का दुस्साहस किया जाता है. दुःख ये भी कि दलितों के अगुआ भी तब कहीं नज़र आते. या श्रीनिवास जैसे लोग उनकी नज़र में नहीं आते. दरअसल ये हमारे अंदर बस गया है. हम इसके आदी हो गए हैं. इसमें नया क्या है, ये तो होता रहता है कहना हमने अपना स्वभाव बना लिया है. संवेदनाएं चुकी हुई हैं हीं, ये तब और मर रहती हैं जब ऐसा कुछ दलित के साथ होता है. हमने इसे उनकी नियति मान लिया है.किसी मिठ्ठू सिंह की हिम्मत है क्या कि वो किसी ऊंची जाति वाले को यूं ही दौड़ाकर पीट जाए. गांवों में ये और होता है, शहरों में हम इस मुगालते में हैं कि पुलिस और क़ानून का कुछ भय है, गांवों तक जाते-जाते ये चुक ही जाता है. वहां जाति कि जड़ें बहुत गहरी हैं, वैसा ही वर्गभेद भी है. ये सब मिलकर किसी कमजोर की ज़िंदगी पर भारी पड़ जाते हैं. ये भी कम लगे तो जाते-जाते ये वीडियो देखते जाइएगा. https://www.youtube.com/watch?v=VYEk-36zzAI


















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