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राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट से राहत, क्या 2024 में BJP का 'गेम' बिगड़ जाएगा?

2019 में राहुल ने कर्नाटक में नीरव मोदी का नाम लेते हुए कहा था, 'सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों है?'

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राहुल गांधी को राहत मिलने के बाद कांग्रेस में खुशी की

“..इन सभी चोरों के नाम मोदी-मोदी-मोदी कैसे हैं?”, इस बयान के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मानहानि की सज़ा हुई थी. ट्रायल कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक अपील की गई. हर जगह से एक ही जवाब मिला- ख़ारिज. चार महीने बाद 4 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इसी आपराधिक मानहानि मामले में राहुल गांधी की सज़ा पर रोक लगा दी. अब दोषसिद्धि पर रोक लगी तो राहुल की सांसदी के रास्ते भी खुल गए हैं.

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भारत की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या, वेरायटी और पेंडेंसी देखेंगे तो आपको ये भ्रम हो सकता है मानहानि का मुक़दमा गंभीर नहीं होता. लेकिन राहुल गांधी से पूछिए, जिन्हें न सिर्फ़ दो साल की सज़ा सुनाई गई, बल्कि उनकी सांसदी भी चली गई. ऐसे में ये जानना बेहद जरूरी है कि…
- दोषसिद्धी पर रोक लग गई, तो अब राहुल करेंगे क्या?
- सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के फ़ैसलों पर क्या टिप्पणी की?
- राहुल को क्या हिदायत दी?
- और बार-बार जिस Maximum punishment का ज़िक्र आया, उसे लेकर कोर्ट ने क्या कहा?

सबसे पहले आज कोर्ट में क्या हुआ, वहां से शुरू करते हैं. गुजरात हाई कोर्ट से राहत न मिलने के बाद राहुल सुप्रीम कोर्ट आए थे. बेंच थी: जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस संजय कुमार की. लाइव लॉ की कवरेज के मुताबिक़, 12 बजे के क़रीब सुनवाई शुरू हुई. राहुल की तरफ़ से जिरह कर रहे थे अभिषेक मनु सिंघवी. उन्होंने पहला तर्क तो यही दिया कि कोई एकरूपता, पहचान या रेखा नहीं है जो विशेष रूप से मोदी समुदाय को परिभाषित करती हो. दूसरा तर्क: कि पूर्णेश मोदी ने ख़ुद स्वीकारा है कि मूलतः उनका उपनाम मोदी नहीं है. वो मोध वणिक समाज से हैं. जिसमें कई जातियों और उपनाम के लोग आते हैं.

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इसके बाद सिंघवी ने एक दिलचस्प दलील दी, कि राहुल ने अपने भाषण में जिन लोगों का नाम लिया था, उनमें से एक ने भी मुक़दमा नहीं किया. केवल एक भाजपा के पदाधिकारी को समस्या हुई. अब तक तो दर्शक जान ही गए हैं, कि राहुल गांधी के भाषण से जिसको ठेस पहुंची थी और जिसने मुक़दमा करवाया, वो बीजेपी विधायक और पूर्व मंत्री हैं - पूर्णेश मोदी.

दूसरी तरफ़ के वकील थे, महेश जेठमलानी. उन्होंने पॉइंट-आउट किया कि राहुल का इरादा मोदी सरनेम वाले हर व्यक्ति को बदनाम करना था. सिर्फ़ इसलिए कि ये प्रधानमंत्री के उपनाम से मेल खाता है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस गंवई ने पूछा कि जिस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व राहुल कर रहे थे, उसका क्या? क्या वो एक प्रासंगिक कारक नहीं है? उन्होंने कहा, "सिर्फ़ एक व्यक्ति का अधिकार प्रभावित नहीं हो रहा है. बल्कि एक मतदाता का अधिकार प्रभावित हो रहा है. ट्रायल जज ने अधिकतम सज़ा दी है. उन्हें इसका कारण बताना होगा."
जेठमलानी ने ये कहते हुए टोका कि सांसदों का स्तर ऊंचा होना चाहिए. और, साथ में ये भी कहा कि राहुल गांधी ने अपने बयान के लिए माफ़ी नहीं मांगी.

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दोनों तरफ़ की दलीलें सुनने के बाद बेंच ने फ़ैसला सुनाया -

"ट्रायल जज ने अपने आदेश में अधिकतम सज़ा सुनाई है. एक अवमानना कार्यवाही में ही सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें चेताया है, सिवाय इस बात के ट्रायल जज ने कोई और कारण नहीं बताया है. और, ये केवल दो साल की अधिकतम सज़ा की वजह से ही जनप्रतिनिधि क़ानून की धारा 8 (3) के प्रावधान लगाए गए हैं. ख़ासतौर पर जब अपराध गैर-संज्ञेय, ज़मानती और समझौते के योग्य था, तो ट्रायल जज से कम से कम ये उम्मीद की जाती थी कि वो अधिकतम सजा देने के लिए कारण बताएं."

बेंच ने अपनी टिप्पणी में राहुल को क्लीन-चिट नहीं देते हुए कहा कि सार्वजनिक जीवन में एक व्यक्ति को भाषण देते समय ज़्यादा सावधान रहना चाहिए.

आर्ग्यूमेंट ऑफ़ द डे की तरफ़ चला जाए, इससे पहले हम इस मामले की टाइमलाइन का री-कैप करवा देते हैं. साल था 2019, महीना अप्रैल. राजनीतिक पार्टियां लोकसभा चुनाव के लिए माहौल सेट करने में जुटी थीं. रैलियों, सभाओं का दौर चल रहा था. ऐसे में 13 अप्रैल के रोज़ कर्नाटक के कोलार में राहुल गांधी की एक जनसभा होनी तय थी. हुई भी. तब राहुल अपनी जनसभाओं में 'चौकीदार चोर है' के नारे लगाते और लगवाते थे. उसी लहजे में यहां भी भाषण दिया. और नीरव मोदी आदि का नाम लेते हुए कह दिया, 

'सभी चोरों का सरनेम मोदी क्यों है?'

राहुल की इस टिप्पणी के खिलाफ गुजरात के सूरत में आपराधिक मानहानि का मामला दर्ज कराया गया. इस मामले को कोर्ट तक ले जाने वाले थे शिकायतकर्ता थे- सूरत पश्चिम सीट से भाजपा विधायक पूर्णेश मोदी. इन्होंने आरोप लगाए कि राहुल ने अपने बयान से पूरे मोदी समाज का अपमान किया है. इस मसले को लेकर राहुल पर दो धाराएं लगाई गईं - इंडियन पीनल कोड (IPC) की धारा 499 और 500.

सुनवाईयां होती रहीं और मामला बड़ी ख़बरों की चकाचौंध से ओझल होने लगा. फिर आया साल 2022. मार्च के महीने में अजीब वाक्या हुआ. राहुल के खिलाफ चल रहे मामले पर खुद पूर्णेश मोदी गुजरात हाईकोर्ट से स्टे ले आए. टाइम्स ऑफ इंडिया के सईद खान की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्णेश चाहते थे कि राहुल की मौजूदगी में उन तीन CD को प्ले किया जाए, जो अदालत के समक्ष रखी गई थीं. और राहुल से सीडी में मौजूद सामग्री को लेकर आपराधिक दंड संहिता CrPC की धारा 313 के तहत सवाल जवाब हो.  धारा 313 के तहत ट्रायल कोर्ट को ये अधिकार होता है कि वो आरोपी से उसके खिलाफ पेश सबूतों को लेकर स्पष्टीकरण मांगे.  लेकिन ट्रायल कोर्ट ने पूर्णेश की इस मांग को खारिज कर दिया. तो पूर्णेश के वकीलों ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका लगाकर कह दिया कि सबूतों का अभाव है. इसीलिए राहुल को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का आदेश दिया जाए. तब तक सुनवाई पर रोक लगा दी जाए. और पूर्णेश को हाईकोर्ट से स्टे मिल भी गया.

एक साल बाद पूर्णेश फिर हाईकोर्ट आए. और इस बार उन्होंने अदालत को बताया कि ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड पर पर्याप्त सबूत हैं. लेकिन स्टे के चलते मामला लंबित पड़ा हुआ है. पूर्णेश के वकील हर्षित तोलिया ने अदालत से दरख्वास्त की, कि उन्हें अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दी जाए. जस्टिस विपुल पंचोली की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पूर्णेश की मांग मान ली और इसी के साथ 16 फरवरी 2023 को सूरत की ट्रायल कोर्ट में सुनवाई पर लगा स्टे हट गया. और मानहानि का मुकदमा एक बार फिर आगे बढ़ा.

मार्च 2023 के दूसरे हफ्ते में दोनों पक्षों की दलीलें पूरी हो गईं. और फिर 23 मार्च को इस केस पर फैसला आया. जिसमें राहुल गांधी को 2 साल की सजा मिली. हालांकि कोर्ट ने राहुल को करीब एक महीना यानी 30 दिनों के अंदर अपील दायर करने का समय दिया. राहुल को सज़ा के साथ साथ महीने भर की बेल भी मिल गई थी. लेकिन सजा सुनाए जाने के अगले दिन यानी 24 मार्च को केरल की वायनाड सीट से सांसद राहुल गांधी सांसदी रद्द कर दी गई. क्योंकि जन प्रतिनिधित्व कानून में प्रावधान है कि अगर किसी सांसद या विधायक को किसी मामले में 2 साल या उससे ज़्यादा की सज़ा होती है, तो उसकी सदस्या खत्म हो जाएगी. इतना ही नहीं सजा की अवधि पूरी करने के बाद अगले 6 साल तक दोषी व्यक्ति चुनाव भी नहीं लड़ सकता.

इस फ़ैसले के बाद 3 अप्रैल को राहुल ने सूरत की सेशंस कोर्ट में दो अर्जियां दी. पहली दो साल की सजा के ख़िलाफ़ और दूसरी, अपने दोषी ठहराए जाने के ख़िलाफ़. राहुल ने कोर्ट में कहा कि ऐसा लगता है कि उन्हें इस मामले में अधिकतम सजा दी गई. ताकि उनकी लोकसभा सदस्यता ख़त्म की जा सके. लेकिन 20 अप्रैल को सेशन कोर्ट ने ये कहते हुए राहुल की दोनों अर्जियां खारिज कर दीं कि 'देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष और सांसद होने के नाते राहुल को और सावधान रहना चाहिए था.'

सेशन कोर्ट से खाली हाथ लौटने के बाद राहुल ने राहुल ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील की. 7 जुलाई को हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि- 'राहुल गांधी बिल्कुल अस्तित्वहीन आधार पर राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं. सेशन कोर्ट का फैसला न्यायसंगत और क़ानूनी था. अगर राहुल के कन्विक्शन पर रोक नहीं लगाया जाता है, तो यह राहुल के साथ कोई अन्याय नहीं होगा'

आज कोर्ट से राहत मिलने के बाद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. कहा,

'कर्तव्य वही है. सवाल पूछते रहेंगे.'

जब भी ये ख़बर आपने सुनी होगी, कि राहुल को राहत मिल गई, तो पहला सवाल आपके ज़ेहन में यही आया होगा कि अब कांग्रेस का कोर्स ऑफ एक्शन क्या होगा? अगला सवाल: राहुल गांधी को सज़ा, फिर सांसदी हाथ से चले जाना और अब सुप्रीम कोर्ट से राहत. इस पूरे सिलसिले में एक राजनीतिक तबका राहुल गांधी की इमेज एक फाइटर के तौर पर पेश कर रहा है. लेकिन कांग्रेस ने इस मानहानि के मसले को कैसे डील किया. जानने-समझने वाले तो यही बता रहे हैं कि कांग्रेस ने इस "क्राइसिस" को बहुत तरीक़े से डील किया. राहुल पर मानहानि का मुक़दमा लगा, लेकिन उनका मान कुछ मायनों में बढ़ ही गया.

मानहानि के नियम का इतिहास क्या है?

मानहानि पर नियम रोमन्स ने बनाया, कि कोई जन एक-दूसरे पर सबूत के बिना अनर्गल आरोप नहीं लगाएगा. बिना सबूत के बेइज़्ज़ती करने वाली बातें नहीं करेगा. वरना सज़ा  मिलेगी. रोमन साम्राज्य के बाद कई और साम्राज्य आए. अंग्रेज़ी शासन आने तक कई पुराने नियम-क़ायदे बदले, लेकिन ये वाला क़ानून अंग्रेज़ों को भी जमा. और जब भारत अंग्रेज़ों से आज़ाद हुआ, अपना संविधान बनाया, तब भी ये नियम क़ायम रहा. नियम ने क़ानून की शक्ल ले ली. जिसे हम मानहानि के क़ानून या defamation के नाम से जानते हैं. इस क़ायदे के पीछे जो रोमन्स ने सोचा, वही अंग्रेज़ों ने आगे बढ़ाया. वही हमने अपनाया. ताकि लोग सिर्फ़ बोलने के लिए न बोल दें. जब भी किसी के बारे में बोलें तो जांच-परख के बोलें. कोई ऐसा बयान, कोई ऐसा डॉक्यूमेंट, कोई ऐसा पब्लिश्ड मटीरियल, जिससे किसी व्यक्ति या किसी संस्था की छवि ख़राब होती है, ग़लत जानकारी प्रसारित होती है.. तो मानहानि के तहत केस दर्ज हो सकता है. न्यायालय और संविधान, दोनों ही इंसान या संस्था की प्रतिष्ठा को भी उनकी संपत्ति के तौर पर मानते हैं. इसलिए प्रतिष्ठा की हानि को संपत्ति की हानि माना जाता है. व्यक्ति और संस्था को यह अधिकार मिलता है कि वह अदालत जा सके. हां, उन्हें ये बात न्यायालय के सामने साबित करनी होगी कि उनकी मानहानि हुई है.

इस केस में अदालत ने पाया कि राहुल गांधी की टिप्पणी पूरे मोदी समाज को अपमानित करती है. उसके लिए उन्हें सज़ा मिली. लेकिन कांग्रेस ने पहले दिन से कहा है कि अधिकतम सजा का क्या तुक है? आज सुप्रीम कोर्ट ने भी यही पूछा. दोषी ठहराए जाने के अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट के वकील शादान फरासत ने भी द क्विंट को बताया था कि राहुल गांधी पहली बार अपराधी हैं, और उन पर पहले कोई दोषसिद्धि नहीं हुई है. probation act and rules के अनुसार, आप पहली बार अपराधी को अधिकतम सजा नहीं दे सकते. फिर राहुल को अधिकतम सज़ा कैसे?

राहुल लोकसभा में प्रतिवेदन देंगे, वायनाड के लोगों का प्रतिनिधित्व करेंगे, लोकसभा की बहसों में दिखने लगेंगे, मगर ये सवाल रह ही जाएगा कि अधिकतम सज़ा कैसे? अधिकतम सज़ा क्यों?

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