
पीयूष पांडे टीवी पत्रकार और व्यंग्यकार हैं. उनकी एक किताब वाली है 'धंधे मातरम्'. इसे उन्होंने हमारे और आपकी खातिर लिखा है. इस बार वो हमारे लिए लाए हैं एक व्यंग्य कि आखिर नेताओं पर फेंका जाने वाला जूता उन्हें लगता क्यों नहीं है.
ये जूता कभी लक्ष्य को भेद क्यों नहीं पाता जी?
साल के पहले दिन जूता फेंकने की घटना हुई है. पुरातन भारतीय मान्यता के मुताबिक ऐसा सालभर होता रहेगा.

लीजिए. फिर वही ख़बर आई है. नए साल के पहले ही दिन किसी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री आदरणीय, श्रीमान, श्रीश्री, महोदय अरविंद केजरीवाल पर जूता चला दिया. इसी दिन झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास पर भी किसी ने जूते से निशाना साधा. चूंकि घटना साल के पहले दिन हुई है, तो पुरातन भारतीय मान्यता के मुताबिक जूता-कांड अब सालभर कहीं न कहीं दिखाई देता रहेगा.
जूता चलाना दिलेरी का काम है. दिल, जिगर, गुर्दा चाहिए और शरीर के हर उस अंग में अच्छा-खासा मांस चाहिए, जहां पकड़े जाने के बाद संबंधित नेता के ठलुए चेले और पुलिस के डंडे रुई उधेड़ने का अभ्यास करते हैं. राजनेताओं के चेलों के लिए जूता-चालक को ठोंकना वो पुण्य होता है, जिसका क्रेडिट वो हर उस मौके पर ले सकते हैं, जहां नेताजी के जूता कांड का व्याख्यान हो.
वैसे जूता खाना बहुत आसान है. इसमें आपको कुछ नहीं करना पड़ता. चार-छह जूते पड़ने के दौरान मैया-मैया या अल्लाह-अल्लाह कहना है बस. इसके बाद आपकी आंखें स्वत: बंद हो जाती हैं और शरीर में एक रहस्यमय किस्म की सुस्ती पसर जाती है. ठोंकने वाला ठोंकता रहता है और आप पैरों को पेट की तरफ मोड़कर इस तरह गुड़ीमुड़ी हो जाते हैं, मानो आपके सोने की यही सबसे प्रिय अवस्था है.

जब चिदंबरम पर जूता फेंका गया
लेकिन, जूता चलाना एक कला है. बंदे को निष्णात होना चाहिए. आपने कभी सोचा है कि बीते कई साल से जूता चलाने के कई वाकये हुए, लेकिन एक बार भी जूता कायदे से लक्ष्य को नहीं भेद सका. इराक में बुश पर जूता चला. लंदन में मुशर्ऱफ पर और तुर्की में IMF प्रमुख पर जूता चलाया गया. इसी तरह पाकिस्तानी जम्हूरियत के मदारी जरदारी पर भी जूता चलाया गया था. भारत में भी हुर्रियत नेता गिलानी पर जूता चला, उमर अब्दुल्ला पर निशाना साधा गया, भूपेन्दर हुड्डा को भी टारगेट बनाया गया, यासिन मलिक पर जूता फेंका गया, लेकिन कायदे से नहीं लगा. चिदंबरम साहब पर तो उन्हीं जरनैल भइया ने जूता चलाया था, जो अब केजरीवाल की पार्टी में हैं. जरनैल भी लक्ष्य से चूक गए थे.
जूता-चालक इतनी हिम्मत से जूता चलाता है, लेकिन टारगेट का सिर कभी नहीं फोड़ पाता, तो एक सवाल मन में उठता ही है कि ऐसा क्यों है? फिर इस महंगाई के जमाने में जूता-चालक बिना इसकी चिंता किए कि वो कौन सी कंपनी का जूता पहने है, झटके में जूता चला देता है. तो उसकी निष्ठा का सम्मान होना ही चाहिए. आजकल चिरकुट से चिरकुट कंपनी का जूता दो-तीन हजार से कम का नहीं आता. जूता-चालक ब्रांड वगैरह के लिए थोड़ा कॉन्शियस हो, तो जूते की कीमत 8-10 हजार से कम नहीं हो सकती. नववर्ष पर केजरीवाल पर जूता चलाने वाले का तो सिर्फ इस बात के लिए सम्मान हो सकता है कि उसने नोटबंदी के दौर में ऐसी हिम्मत दिखाई.

मुशर्रफ भी उड़ता हुआ जूता देख चुके हैं
ख़ैर, मुद्दा जूता चलाना नहीं, जूता-चालक का लक्ष्य से चूकना है. तो जनाब बात ऐसी है कि प्रॉपर ट्रेनिंग का अभाव रहा. जूता किस एंगल, किस रफ्तार और किस कंपनी का चलाया जाए कि सीधे लक्ष्य से धड़ाम से जा टकराए, ये जूता-चालक नहीं जानते थे. दरअसल, इस फील्ड में बाकायदा कोर्स की दरकार है. जूता चलाने के बाद बंदे को किस अवस्था का वरण करना है, ये भी कोर्स सिखाएं. यकीं जानिए रीबॉक, बाटा, एक्शन और नाइकी जैसी कंपनियां फौरन इस कोर्स को स्पॉन्सर कर सकती हैं. कोर्स करने के बाद रोजगार की अपार संभावनाएं हैं.
पार्टी मुख्यालयों में इस कोर्स को कर चुके बंदे इसलिए हायर किए जा सकते हैं कि वो सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस में खड़े होकर संभावित जूता-चालकों पर नज़र रखें. कुछ पार्टियां बेहतरीन जूता-चालक हायर कर सकती हैं ताकि वो विरोधी पार्टियों की रैली में अफरा-तफरी मचवा सके. पब्लिसिटी के लिए मोहताज राजनेता खुद पर भी जूता चलवाकर पब्लिसिटी झटक सकते हैं.
जूता-चालन से मिली पब्लिसिटी की वजह से ही जूता-चालक भूतकाल में विधायक तक बने हैं. लिहाजा जूता-चालन में लोकप्रियता की गुंजाइश है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता.
कहने का आशय ये कि अब इस रोजगारपरक संभावनाओं वाले क्षेत्र में कोर्स होना चाहिए. इस कोर्स का सिलेबस तैयार करने के लिए जूता-चालकों से सुझाव मांगे जा सकते हैं. पांच राज्यों में जल्द चुनाव हैं, तो इस कोर्स को जल्द से जल्द शुरू किया जाना चाहिए. चूंकि इतना बेहतरीन आइडिया इस खाकसार के दिमाग की उपज है, लिहाजा कोर्स कोई भी चलाए, रॉयल्टी में सीलबंद जूते मुझे भिजवाता रहे.











