
दो टोंटी हाथ में लेकर प्रेस से बात करते अखिलेश.
आखिर सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश आया कैसे, जिसने यूपी के छह पूर्व मुख्यमंत्रियों को अपने सरकारी बंगले खाली करने पर मजबूर कर दिया? इसके पीछे थे 75 साल के सत्यनारायण शुक्ल और उनकी टीम लोक प्रहरी. यह लोक प्रहरी टीम के 14 साल के संघर्ष का नतीजा था जिसने एनडी तिवारी, कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, मुलायम सिंह यादव, मायावती और अखिलेश यादव को सरकारी बंगले से बाहर कर दिया.
कौन हैं सत्यनारायण शुक्ल?

रिटायर्ड आईएएस एस एन शुक्ल जो अब वकील हैं. (फोटो- नेशनल हेराल्ड)
सत्यनारायण शुक्ल उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के जालौन जिले के रहने वाले हैं. 1943 में जन्मे सत्यनारायण पढ़ाई में तेज थे. उन्होंने हाइस्कूल की परीक्षा में जिलास्तर पर टॉप किया. फिर 1964 में आगरा यूनिवर्सिटी से बीए, एमए एलएलबी की परीक्षाओं में भी टॉप किया. 1966 में सिविल सर्विस का पेपर पहले ही अटेंप्ट में क्लीयर कर लिया. नंबर थोड़े कम थे तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट मिला. लेकिन उन्होंने अगले साल फिर से परीक्षा दी तो आईएएस बन गए. गुजरात कैडर में पोस्टिंग मिली. 10 साल बाद 1977 में यूपी कैडर में ट्रांसफर हो गया. यहां पर भी बड़े पदों पर रहे. 2003 में रिटायर हो गए. लोक प्रहरी नाम से एक एनजीओ बनाया और सालों पहले की अपनी वकालत की पढ़ाई को काम में लेने के लिए हाईकोर्ट में वकालत का रजिस्ट्रेशन करवा लिया. तब से अब तक बहुत सारे बड़े फैसले इनकी याचिकाओं पर आ चुके हैं.
बंगलों पर नेताओं से पुरानी रार
1985 में शुक्ल यूपी सरकार में पीडब्लूडी और राज्य संपत्ति विभाग के सचिव थे. तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने आदेश दिया कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री वीपी सिंह को मॉल एवेन्यु रोड पर एक बंगला दे दिया जाए. लेकिन विभाग के सचिव सत्यनारायण शुक्ल ने ऐसा करने में असमर्थता जताई. क्योंकि यह टाइप छह का बंगला था जो केवल मौजूदा मंत्रियों को ही दिया जा सकता था. पर एनडी तिवारी ने वीपी सिंह को टाइप पांच का बंगला आवंटित कर दिया. अलग-अलग टाइप के बंगलों में साइज का अंतर होता है.

एनडी तिवारी का बंगला जो अब खाली करना पड़ा.
1989 में एनडी तिवारी को पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में टाइप छह का बंगला आवंटित हुआ और यहीं से यह परंपरा शुरू हुई. इसके खिलाफ 1996 में विधानसभा के रिटायर्ड सचिव देवकीनंदन मित्तल ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. याचिका में कहा गया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला देने का कोई नियम नहीं है. ऐसे में यह आवंटन रद्द किया जाए. लेकिन तत्कालीन सरकार की कैबिनेट ने एक आदेश जारी किया जिसका नाम था भूतपूर्व मुख्यमंत्री आवास आवंटन नियमावली 1997. इस नियमावली में पूर्व सीएम को बंगला आंवटित करना वैध कर दिया गया. इस नियमावली को कोर्ट में पेश किया जिसके बाद मित्तल की याचिका को हाईकोर्ट ने 2001 में खारिज कर दिया.
2003 से शुरू हुआ लोक प्रहरी का संघर्ष
2003 में शुक्ल राज्य सतर्कता आयोग के अध्यक्ष के पद से रिटायर हो गए. एक लोक प्रहरी नाम की संस्था बनाई जिसमें उनके दूसरे रिटायर्ड साथी भी थे. खुद मुफ्त में हाईकोर्ट में वकालात करने लगे. लोक प्रहरी के एक सदस्य और पुलिस के डीजी रहे आई सी द्विवेदी ने पूर्व मुख्यमंत्रियों और कुछ ट्रस्ट के नाम पर आवंटित बंगलों के खिलाफ याचिका का प्रस्ताव दिया. इस पर लोक प्रहरी ने 2004 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. दस साल बाद 2014 में सुनवाई शुरू हुई.

सुप्रीम कोर्ट ने लोक प्रहरी की याचिका पर फैसला दिया.
2016 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि यूपी के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को दो महीने के भीतर बंगले खाली करने होंगे. लेकिन तत्कालीन अखिलेश सरकार ने उत्तर प्रदेश मंत्री (वेतन, भत्ता और प्रकीर्ण उपबंध) संशोधन अधिनियम-2016 आदेश जारी किया. जिससे पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन बंगला मिलने को कानूनी वैधता मिल जाए. लोक प्रहरी की टीम ने नियमावली के इस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जिस पर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए नियमावली के संशोधन को अवैध घोषित कर दिया. और पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला खाली करने के आदेश दिए. साथ ही बंगला खाली न करने तक मार्केट रेट के हिसाब से किराया देने का भी आदेश दिया. इस आदेश के बाद सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों ने बंगले खाली कर दिए.
जया बच्चन को भी हटवाया था
2006 में जया बच्चन यूपी से राज्यसभा सदस्य चुनी गईं. उस समय वो यूपी फिल्म विकास परिषद की अध्यक्ष भी थीं. यह एक लाभ का पद था. जिससे उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया. सत्यनारायण शुक्ल ने चुनाव आयोग में इसकी शिकायत और पैरवी की. नतीजतन जया बच्चन की सदस्यता रद्द हो गई. जया के इस्तीफे के बाद लाभ के पद के मामले में यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी को भी 2006 में लोकसभा से इस्तीफा देना पड़ा था. उस समय वो सांसद और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की चेयरमैन थीं.

एस एन शुक्ल ने अब न्यायिक सुधार के लिए याचिका डाली है.(फोटो-जागरण)
लोक प्रहरी की एक और याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि दो साल और उससे अधिक की सजा पाए सांसद या विधायकों की सदस्यता तुरंत रद्द हो जाएगी और वह सजा पूरी होने के छह साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे. इस आदेश के खिलाफ केंद्र सरकार अध्यादेश लेकर आई जिसे राहुल गांधी ने फाड़कर फेंकने की बात कही थी. बाद में सरकार ने यह अध्यादेश वापस ले लिया था. इस कारण ही कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य राशिद मसूद, लोकसभा सांसद लालू यादव की सदस्यता रद्द हो गई.
लोक प्रहरी की एक और याचिका पर फैसला देते हुए उच्चतम न्यायलय ने फैसला सुनाया कि चुनाव लड़ने वाले हर व्यक्ति को अपनी और परिवारजनों की आय के स्त्रोत का शपथ पत्र देना होगा. साथ ही यह भी बताना होगा कि उस पर चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने वाली धाराओं में तो कोई केस नहीं चल रहा. साथ ही सरकार को कोर्ट ने एक व्यवस्था बनाने का आदेश दिया जो जांच कर सके कि थोड़े समय में जनप्रतिनिधि और उनके परिजनों की संपत्ति अचानक कैसे बढ़ जाती है.
अकेले लोक प्रहरी नहीं हैं शुक्ल
लोक प्रहरी संस्था में सत्यनारायण शुक्ल अकेले नहीं हैं. यह 20 लोगों की एक टीम है. 10 लोगों ने 2003 में इसकी शुरुआत की थी. बाकि लोग बाद में जुड़े. ये सभी लोग रिटायर्ड नौकरशाह, पुलिस अधिकारी, प्रोफेसर और जज हैं. भूतपूर्व चुनाव आयुक्त और गुजरात के गवर्नर रहे आरके त्रिवेदी इस संस्था के मुख्य संरक्षक हैं.

चुनाव सुधार पर एक गोष्ठी में बोलते एस एन शुक्ल.
संस्था के और लोगों में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एसएन सहाय, यूपी राजस्व बोर्ड के पूर्व सदस्य एनएम मजूमदार, राज्यसभा के पूर्व सेक्रेटरी जनरल आरसी त्रिपाठी, यूपी के पूर्व डीजीपी आईसी द्विवेदी, पूर्व जिला जज यूपीएस कुशवाहा, लखनऊ यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर हरिंदर पेंटल, पूर्व इंजिनियर आरपी सिंह, पत्रकार वीबी मिश्रा, रिटायर्ड आईएएस पीसी शर्मा और पीडी चतुर्वेदी,जीडी महरोत्रा, एसके अग्निहोत्री, एस रिजवी, एके दास और एम सुब्रमण्यम हैं. इसी साल तीन सदस्यों यूपीएससी के पूर्व चेयरमैन जेएन चतुर्वेदी, रेवन्यू बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष एस वेंकटरामानी, रेलवे के पूर्व जीएम अनिरुद्ध मित्तल का निधन हो गया.
यह टीम भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ रही है. यह मुफ्त कानूनी सहायता भी देती है. अब लोक प्रहरी ने न्यायिक सुधार के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. इसमें अन्य सेवाओं की तरह भारतीय न्यायिक सेवा बनाने की मांग की है. जिस पर अभी फैसला आना बाकी है.
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