लेबनान मिडिल ईस्ट का सबसे छोटा देश. पहले विश्व युद्ध के बाद ओटोमन साम्राज्य ख़त्म हो गया. इसके बाद लीग ऑफ़ नेशंस ने इस साम्राज्य के हिस्सों को ब्रिटेन और फ्रांस में बांट दिया. इस मैनडेट सिस्टम में ब्रिटेन ने फिलिस्तीन और इराक का हिस्सा ले लिया. फ्रांस ने सीरिया और लेबनान वाला. फ्रांस ने यहां पर फ्रेंच कल्चर बढ़ाने के लिए सीरिया से लगे इलाके को ग्रेटर लेबनान घोषित कर दिया. इसको बाक़ी इलाकों से अलग ही रखा गया.
आबादी: 43 लाख भाषा: अरबी धर्म: इस्लाम, ईसाई

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फ्रांस से स्वतंत्र हुआ, पर शिया-सुन्नी, ईसाई सबमें फंस गया
1943 में लेबनान स्वतंत्र हो गया. एक नेशनल पैक्ट साइन किया गया जिससे वहां रहने वाले मेरोनाइट, ग्रीक क्रिश्चियन, द्रुज़े, सुन्नी और शिया सारे साथ रह सकें. पर इसके साथ ही सबकी राजनीति भी शुरू हो गई. धीरे-धीरे कुछ ऐसा सीन बना कि यहां क्रिश्चियन आबादी कम होने लगी और मुस्लिम आबादी बढ़ने लगी. और डेमोग्राफी बदलने वाली ये चीज बाद में झंझट की वजह बन गयी.1948 में इजराइल देश बनाया गया. जो कि लेबनान के साउथ बॉर्डर पर आता है. ये देश इस इलाके के सारे मुस्लिम देशों के लिए धतूरा बन गया. वहीं यहूदियों के हिटलर के हाथों बर्बादी होने के बाद अमेरिका इजराइल को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था. इजराइल बनने के साथ एक इलाके को लेकर अरब देशों से इनकी मार हो गई. उस इलाके में अरब रहते थे. और वो इजराइल के अन्दर आता था. इसको अरब देशों ने फिलिस्तीन कहा. तो उस वक़्त लगभग एक लाख अरब रिफ्यूजी फिलिस्तीन से भागकर लेबनान आ गए. बाद में 1967 में अरब-इजराइल वॉर में फिर हजारों रिफ्यूजी लेबनान आये.

1969 में फिलिस्तीन लिबरेशन आर्गेनाइजेशन और लेबनान मिलिट्री के बीच पैक्ट हुआ कि दोनों एक-दूसरे की बाउंड्री को मानेंगे. रिफ्यूजियों की समस्या भी मिल-बांटकर सुलझा ली जाएगी. पर इस बात से मेरोनाइट कम्युनिटी नाराज हो गई कि फिलिस्तीनियों को कुछ ज्यादा ही छूट दी जा रही है.
1970 में फिलिस्तीन मूवमेंट के लोगों ने साउथ लेबनान से ही इजराइल पर हमला करना शुरू कर दिया. इनको लेबनान के लेफ्ट-विंग के लोगों का साथ मिला. इसके साथ ही देश में आपसी तना-तनी भी बढ़ती गई. 1975 में गुस्से का ये गुब्बारा फूट गया. एक अटैक हुआ था, जिसमें फिलिस्तीन के 27 लोग मारे गए. इसके बाद लेबनान में सेक्युलर लेफ्ट, राइट विंग, क्रिश्चियन, फिलिस्तीन आर्गेनाइजेशन, सीरिया और इजराइल के समर्थक सब आपस में भिड़ गए.
सीरिया और फिर इजराइल ने कब्ज़ा कर लिया इस छोटे से देश पर
1976 में सीरिया की फ़ौज लेबनान में घुस गयी. शांति बनाने के नाम पर. वहीं 1978-82 के बीच कई बार हमला कर इजराइल ने साउथ लेबनान पर कब्ज़ा कर लिया, जिसे उसने 2000 में छोड़ा. 1978 के बाद यूएन की सेना भी वहां आ गई शांति बनाने.1990 तक लेबनान में सिविल वॉर चलता रहा. दो लाख लोग मरे. लाखों देश छोड़कर भाग गए. सारे ग्रुपों में आपसी मेल-जोल बदलता रहा. कभी कोई किसी के साथ लड़ने लगता, कभी किसी के साथ. 1989 में एक शांति समझौता हुआ जिसके अंतर्गत सारे ग्रुप ने हथियार छोड़ दिए. बस शिया ग्रुप हिजबुल्ला ने नहीं छोड़ा. उसको इजराइल के खिलाफ लड़ना था. इस ग्रुप को कोई आतंकवादी संगठन मानता है, कोई लिबरेशन फाइटर.

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पर देश में झंझट ख़त्म नहीं हुआ. चलता रहा. इतना कि 2005 में लेबनान के पूर्व प्रधानमन्त्री रफीक अल हरीरी का क़त्ल कर दिया गया. लेबनान की तत्कालीन सरकार ने इसका आरोप सीरिया पर मढ़ा. इसके बाद सीरिया के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन शुरू हो गए देश में. तब जाकर सीरिया के प्रेसिडेंट बशर अल असद ने लेबनान से अपनी सेना हटाने का निर्णय लिया. 29 साल बाद विदेशी सेना लेबनान से बाहर निकली.
हरीरी केस ले डूबा लेबनान को
हरीरी केस ख़त्म नहीं हुआ. इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल ने सीरिया को इसका जिम्मेदार ठहराया. पर साथ ही हिजबुल्ला ग्रुप के लोगों को भी गिरफ्तार करने का ऑर्डर निकाला. दोनों ने नहीं माना कि वो इस हत्या में शामिल थे. फिर हरीरी का बेटा साद हरीरी प्रधानमंत्री बना. हिजबुल्ला ग्रुप के लोग भी इसके मंत्री बने. पर 2011 में साद पर आरोप लगा कि वो इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल की ही बात को बढ़ावा दे रहा है. इस बात पर हिजबुल्ला के नेताओं ने इस्तीफ़ा दे दिया.
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2011 में ही सीरिया में सिविल वॉर शुरू हो गया. अब शिया ग्रुप हिजबुल्ला ने सीरिया के शिया प्रेसिडेंट बशर अल असद के समर्थन में लड़ना शुरू कर दिया. उसके बाद लेबनान में भी बम गिरने शुरू हो गए. 2013 में सीरिया की फ़ौज ने रॉकेट दागना भी शुरू कर दिया. सिविल वॉर के बाद की सबसे भयानक घटनाएं थीं ये. इस चक्कर में प्रधानमंत्री ने इस्तीफ़ा दे दिया. चुनाव टल गए. राजनीति गड़बड़ हो गयी. सीरिया की ही तरह यहां भी शिया-सुन्नी हिंसा होने लगी. वहीं सीरिया से भाग-भाग कर लोग यहां आने लगे. मिडिल ईस्ट का सबसे छोटा देश है लेबनान. अब यहां पर एक-चौथाई आबादी सीरिया के लोगों की है.
क्या है हिजबुल्ला और क्या है इसकी पॉलिटिक्स?
इसका मतलब होता है अल्लाह की पार्टी. ये शिया समुदाय की राजनीतिक, मिलिट्री और सोशल आर्गेनाइजेशन है. लेबनान में इसकी बहुत पहुंच है. जब अस्सी के दशक में इजराइल ने लेबनान पर हमला किया था, तब शिया देश ईरान की मदद से हिजबुल्ला बनाया गया. लड़ने के लिए. मोटा-मोटी 1982 में ये ग्रुप बना. इजराइल मिलिट्री पर हमला करना शुरू किया. फिर 1983 में अमेरिकी दूतावास और मरीन बैरक पर बम गिराए. जिसमें तीन सौ लोग मरे.
अमेरिकी दूतावास पर हमले के बाद
1985 में हिजबुल्ला ने एक ओपन लेटर लिखा दुनिया को, जिसमें अमेरिका और रूस को इस्लाम का दुश्मन बताया गया. साथ ही प्रतिज्ञा ली गयी कि इजराइल को मिटा देना है.
2000 में इजराइल ने लेबनान छोड़ दिया. सारे ग्रुप्स ने हथियार डाल दिए, पर हिजबुल्ला ने हथियार नहीं छोड़े. इसका मिलिट्री विंग इस्लामिक रेजिस्टेंस अपनी ताकत बढ़ाता रहा. इतना बढ़ा लिया कि 2006 में इसकी ताकत लेबनान की फ़ौज से भी ज्यादा हो गई. फिर इसी हिसाब से इसकी राजनीतिक ताकत भी बढ़ी. ये लोग मंत्री-वंत्री डिसाइड करने अलगे. वीटो का पावर भी आ गया इनके पास.
2008 में लेबनान की सरकार को वेस्ट का समर्थन था. उनके कहने पर इन लोगों ने हिजबुल्ला के नेटवर्क को उड़ाना शुरू कर दिया. पर हिजबुल्ला ने करारा जवाब दिया. इसके बाद अब फिर सिविल वॉर की स्थिति पैदा हो गयी. इससे घबराकर लेबनान सरकार ने हिजबुल्ला से पावर शेयर कर ली. 2009 चुनाव में हिजबुल्ला ने पार्लियामेंट में दस सीटें जीतीं. और सरकार में आ गए.हिजबुल्ला पर यहूदियों के ठिकानों पर बमबारी करने का आरोप लगता रहा है. वेस्ट इसको आतंकवादी संगठन मानता है. इजराइल से इसकी लड़ाई चलती रहती है. हमेशा कोई ना कोई मरता रहता है.
2011 में शिया ग्रुप हिजबुल्ला ने सऊदी अरब के सपोर्ट से बनी सुन्नी साद हरीरी की सरकार को गिरा दिया. ये इसी बात पर हुआ था कि हिजबुल्ला पर हरीरी के बाप को मारने का इल्जाम था. और हिजबुल्ला इसे मानता नहीं था.
सीरिया में लड़ाई शुरू होने के बाद हिजबुल्ला के लोग भी शिया बशर अल असद की तरफ से लड़ने गए. पर इससे लेबनान में भी शिया-सुन्नी हिंसा भड़क गई. 2016 में सऊदी अरब ने खाड़ी देशों की मदद से इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया. पर अभी हाल में ही हिजबुल्ला के सेक्रेटरी जनरल हसन नसरल्ला ने कहा कि इस्लामिक स्टेट और उसके साथ के आतंकवादी संगठन इजराइल से भी गए-गुजरे हैं. ज्यादा खतरनाक हैं ये. इनकी ये लाइन इनकी पॉलिटिक्स के बारे में काफी कुछ बताती है.

हसन नसरल्ला
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