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देश के सभी सरकारी स्कूलों को ऐसी टीचर मिल जाए तो उनकी तस्वीर बदल जाएगी

हरियाणा के एक प्राइमरी स्कूल की टीचर रविंदर कौर बताती हैं कि वहां पढ़ाना कितना 'यूनीक चैलेंज' है.

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रविंदर और उनके स्कूल के बच्चे
मैं आज अपनी बेटी का रिपोर्ट कार्ड लेने उसके स्कूल गया. नोएडा के एक 'ठीक ठाक' फीस वाले स्कूल में वो पढ़ती है. मैंने वहां अर्चना(आयुषी की मम्मी, मेरी पत्नी) से कहा - यार गजब प्रोग्रेस हुई इसकी एक साल में. इसका वजन तीन किलो बढ़ गया है. अर्चना ने आंखें दिखाते हुए कहा- मार्कशीट में वजन देखने आए हो? फिर हम दोनों हंसते हुए उसका रिपोर्ट कार्ड देखने लगे. उसे देखते हुए मुझे मेरी एक दोस्त याद आई. हरियाणा के सिरसा में एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं. नाम है रविंदर कौर. वो अपने फेसबुक पर अपने स्कूल के बच्चों की एक्टिविटीज की तस्वीरें और वीडियोज शेयर करती थीं. मैंने कहा कि यार तुम्हारे स्कूल में अपनी बच्ची को भेज पाता तो वो कितनी बेहतर इंसान बन जाती. उनसे बहुत सारी बातों के बीच मैंने कहा  "किसी दिन कुछ और यूनीक करना या नए आइडिया पर काम करना तो बताना. मैं स्टोरी करूंगा तुम पर." इसके बाद जो रविंदर ने लिखकर मुझे भेजा वो इतना यूनीक है कि लल्लनटॉप के सभी साथियों से साझा करने से नहीं रोक पाया. आगे की कहानी, रविंदर की तरफ से:


 
क्या कोई टीचर कोई चमत्कार कर सकता है? मेरा मानना है नहीं. उसका काम तो पढ़ाना है. लेकिन उस काम के साथ इतनी अलिखित अपेक्षाएं जुड़ी रहती हैं. पढ़ाना तक सब कुछ सीमित नहीं है. एक टीचर बहुत कुछ हो सकता है. बच्चों को उनके स्तर से शुरू करके सिखाना. ठीक ठीक जान लेना की क्या चीज़ कैसे सिखाई जाए. और इसी के साथ अपनी कक्षा को कभी उबाऊ और नीरस न होने देना. पढ़ा और सिखा देना ही काफी नहीं होता. एक सरकारी विद्यालय में काम करते हुए आप जान पाते हैं सिखा और पढ़ा देना किसी चैलेंज से कम नहीं अगर आप सही अर्थों में उनको सिखाना चाहते हैं. बच्चों का मनोविज्ञान समझना भी ज़रूरी होता है. जो बाल मनोविज्ञान की किताबों में लिखे हुए कोट्स याद करने से नहीं समझा जा सकता.
क्लास में मस्ती विद पढ़ाई
क्लास में मस्ती विद पढ़ाई

एक सरकारी स्कूल में आने वाले बच्चों से जुड़ पाना, उनको रोज स्कूल ला पाना भी मुश्किल काम है. एक अभावग्रस्त तबके से आने वाले बच्चों के बीच संवेदशील व्यक्ति होकर रह पाना अपने आप में एक यूनीक काम है. एक ऐसा शिक्षा तंत्र जहां चीजें चाहकर भी नियमित हो नहीं पाती. मुझे नहीं लगता वहां रोचक तरीके से पढ़ा पाना कोई साधारण काम है. मैं उसे यूनीक ही मानूंगी. इससे अलग कुछ यूनीक करने के लिए बहुत बड़े पागलपन की ज़रुरत है.
पढ़ाई के ढेर सारे रंग
पढ़ाई के ढेर सारे रंग

एक ऐसा तंत्र जहां दसवीं कक्षा तक पहुंचकर भी बच्चा अपने शब्दों में कोई बात न लिख पाता है, न बोल पाता है. मंच पर आने के लिए ललक दिखाई नहीं देती. अपनी बात स्पष्ट शब्दों में कहने के लिए एक अच्छा शब्दकोष नहीं है उसके पास. उस जगह पर जहां लड़के की उम्मीद में लोग इस दौर में भी सात लड़कियां पैदा कर लेते हैं. उस जगह पर जहां लड़कियों को लेकर कोई खास जागरूकता दिखाई नहीं देती. सरकारी योजनाओं में अगर कहीं कोई प्राथमिकता दी भी जाती है तो वह सिर्फ सरकारी आदेश का पालन भर होता है.
जहां खाने भर की कमाई मुश्किल से हो रही हो वहां बाकी समस्याओं के लिए जागरूकता आ भी कैसे सकती है. रोटी के लिए जूझ रहा इंसान अपने बच्चे की अंकतालिका देखने आ भी कैसे सकता है. उसको सिर्फ इतना पता होता है आज स्कूल में कहीं दस्तख़त करने या अंगूठा लगाने के लिए बुलाया गया है. सीधे पूछता है- कहां साइन करूं? और मैं कहती हूं- देखिए आपके बच्चे के इस विषय में इतने अंक आए हैं. आपको आकर पहले पूछना चाहिए यह सब. अगर कुछ बताया भी जाता है तो बस आगे से यही उत्तर मिलता है कि आप लोगों पर ही है सब कुछ. हम तो अनपढ़ हैं. जो थोड़ा पढ़े लिखे हैं वे लोग भी लगभग यही जवाब देते हैं. कुछ मां-बाप ऐसे भी आते हैं जिन्हें यह भी पता नहीं रहता कि उनके बच्चे का स्कूल में क्या नाम है या वह कौन सी कक्षा में है.
फोटो खिंचाई
फोटो खिंचाई

मैं कुछ यूनीक नहीं कर सकती. मैं किसी नए आईडिया पर काम नहीं कर सकती. मैं कर सकती हूं तो सिर्फ इतना कि इनके अभिभावकों को किसी भी तरह मोटिवेट करूं जो मैं कर रही हूं. अभावग्रस्त घरों से आने वाले इन बच्चों का बचपन खुशनुमा बना दूं. सीखने की प्रक्रिया को सुंदर और रुचिकर कर दूं. बहुत सारे बच्चों के चेहरे पर उनके घर में होने वाली कलह साफ नज़र आती है. उनके स्कूल के कुछ घंटे अगर खुशनुमा हो सकते हैं तो मैं वह कर सकती हूं. स्कूल के सिलेबस से इतर कुछ कविताएं कुछ कहानियां सुनाती हूं. उनके साथ खेलती हूं. उनके साथ नाचती हूं.
मातृभाषा दिवस
मातृभाषा दिवस

मेरी कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा बड़ी आसानी से आकर मुझे अपने साथ खेलने के लिए कह सकता है. अपने घर से लाई कोई खाने की चीज़ हो या खेलने की चीज़, उसे मुझसे छिपाने की ज़रुरत नहीं होती. कोई भी नई चीज़ अगर हुई है तो बहुत एक्साइटेड होकर बड़ी सहजता से शेयर की जाती है. जैसे कि मैम मेरे घर में कल शादी है, मैम देखो मैं नए जूते लाई हूं, मैम मेरे पापा कल संतरे लाए थे. और भी न जाने क्या क्या शेयर होता है. अपनी लाई खाने की चीज़ में से बड़ी खुशी के साथ मुझे टॉफी पकड़ाई जाती है. उनको क्या अच्छा लगता है, वे लोग खुलकर कहते हैं. जिसे मैं सबसे अच्छी चीज़ मानती हूं जो मैंने उन्हें सिखाई.
प्रोजेक्टर से पढ़ाई
प्रोजेक्टर से पढ़ाई

नई नोटबुक के पहले पन्ने की सजावट का काम मुझ पर रहता है. तरह तरह के फूल पत्तियां और फिर उसमें बच्चों का रंग भरना. नया चार्ट बनाने का काम उनके सामने होता है और उसमें काम आने वाली चीज़ें ज़रूरत के अनुसार मुझे पकड़ाने में जो ख़ुशी उन्हें प्राप्त होती है, उसके क्या कहने. कोशिश करती हूं जो भी सिखाऊं पढ़ाऊं बेशक मासिक टेस्ट में लिखें या न लिखें, पर उसको समझ जाएं और अपने शब्दों में कह पाएं. क्योंकि परीक्षाओं का बोझ ढोना तो वे बड़ी कक्षाओं में जाकर सीख ही जाएंगे. अगर अपनी बात कहना और सवाल करना सीख गए तो अपनी पढ़ाई बेहतर ढंग से कर पाएंगे और एक प्राइमरी टीचर के रूप में की गई मेरी मेहनत सफल हो जाएगी.
बच्चों के साथ रविंदर
बच्चों के साथ रविंदर

उनके सोचने के स्तर को ऊंचा उठाना, उनको सपने देखना सिखा देना और उनके व्यक्तित्व में शुरू से रूढ़िवादी अवधारणाओं को पनपने से रोक देना बेहद ज़रूरी काम है मेरे लिए. कक्षा में ऐसे तबके के बच्चे भी हैं जिनमें 7-8 साल की बच्ची की शादी कर दी जाती है. उन बच्चों की आंखों में अगर मुझे देखकर टीचर बनने का सपना पैदा होता है मुझे नहीं लगता कि इससे नया कोई और आईडिया हो सकता है. हर सुबह कक्षा में जाने पर बच्चों की आंखों में जो उत्साह नज़र आता है, इससे बड़ा कोई अवॉर्ड मुझ जैसी इंसान के लिए तो और कोई हो नहीं सकता.
असली शिक्षा का सुख
असली शिक्षा का सुख

मुझे वे आंखें दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत आंखें लगती हैं जब हर दिन स्कूल कैंपस में कदम रखते ही कोई बच्चा भाग कर मेरी ओर आता है और बड़ी सहजता से मुझसे चिपट जाता है. जब परीक्षाएं समाप्त होने की ख़ुशी में कक्षा कक्ष में ही पार्टी रखकर ज्यॉमेट्री बॉक्स (स्मार्टफोन की तरह) लेकर डांस के वीडियो बनाए जाते हैं, और फोटो खींचे जाते हैं. उसी ज्यॉमेट्री बॉक्स में दो-तीन बटन दबाकर वे झूठ-मूठ के वीडियो मेरे फ़ोन में सेंड किये जाते हैं. जब होली की कविता पढ़ाने पर बच्चे चाक लेकर दीवारों पर पिचकारी और होली खेलते बच्चे बच्चियां उकेर देते हैं तो मुझे वो किसी बड़े इंटरनेशनल स्कूल में दिए गए किसी प्रोजेक्ट से भी ज़्यादा सुंदर नज़र आता है. जहां बच्चों की आंखों में टीचर के लिए डर नहीं प्रेम नज़र आए, तो मुझे मेरे पढ़ाने का आईडिया यूनीक ही लगता है.


 

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