मुलाकात का मिजाज इश्क से कुछ महरूम रहता है. नानावटी को अखरता है. सेल्विया को प्यार हो गया था, मगर किसी और से. बॉम्बे के अय्याश बिजनेसमैन प्रेम आहूजा से. खामोश आंखों से नानावटी अपने घर से निकल जाता है. साथ में सेल्विया और बच्चों को ले जाकर सिनेमा हॉल छोड़ देता है. कहता- तुम लोग फिल्म देखो. मैं आता हूं. नानावटी हॉल से सीधा जाता है नेवल हेडक्वार्टर. सर्विस रिवॉल्वर इश्यू करवाकर सीधा पहुंचता है बॉम्बे की मालाबार हिल्स के पास जीवन ज्योति बिल्डिंग. प्रेम आहूजा के अपार्टमेंट. नानावटी प्रेम आहूजा के बैडरूम में जाता है. कुछ देर बाद बाहर काम कर रहे नौकर कांच टूटने की आवाज के साथ तीन गोलियों की गूंज सुनकर अंदर दौड़ पड़ते हैं. टॉवल और खून से सना प्रेम आहूजा फर्श पर पड़ा हुआ था. प्रेम आहूजा की बहन मैमी नानावटी को चौंकी सवालिया आंखों से देखती है. नानावटी बिना जवाब दिए घर के सिक्योरिटी गार्ड से निकलते वक्त कहता, 'मैं सरेंडर करने पुलिस के पास जा रहा हूं.'लंबा कद. ठुसा हुआ कसीला बदन. सफेद रंग की ड्रेस पहनता और खामोश आंखें लिए निकलता, तो देखने वालों की जुबां बत्तीसी के अंदर पड़ी-पड़ी मुड़ने लगती. नेवी कमांडर कवस मानेकशॉ नानावटी. मुल्क की खातिर समंदर पर महीनों ड्यूटी पर तैनात रहता. वो साल 1959 था. कमांडर नानावटी बॉम्बे (मुंबई) में अपने घर लौटता है. तीन प्यारे बच्चों की खूबसूरत आंखों वाली मां और अपनी वाइफ सेल्विया से मिलता है.
किस्सा यहां से खत्म नहीं, शुरू होता है. इंडियन हिस्ट्री का सबसे यादगार दिलचस्प केस. कमांडर नानावटी केस, जिस में उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी दिलचस्पी रही. ये केस ज्यूरी ट्रायल, बॉम्बे सेशन कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ा गया. कोर्ट समेत सब ने माना कि नानावटी ने आहूजा को मारा. खुद नानावटी ने भी. लेकिन उतने ही लोगों ने कहा- वो दोषी नहीं है. लेकिन सबने चाहा कि उसे रिहा किया जाए. नेहरू की बहन और तत्कालीन बॉम्बे गर्वनर विजय लक्ष्मी पंडित से लेकर बाद में खुद प्रेम आहूजा की बहन तक. कोर्ट के बाहर खड़ी सैकड़ों की भीड़ मर्डर के दोषी नानावटी की रिहाई की दुआ करते. नानावटी उस वक्त का हीरो बन चुका था.
नानावटी केस इतना दिलचस्प रहा कि कई फिल्में बनीं. किताबें लिखी गईं. 1963 में आई 'ये रास्ते हैं प्यार के' और 'अचानक'. सलमान रूश्दी जैसे बड़े राइटर्स ने 'मिडनाइट्स चिल्ड्रन' में इस इंसीडेंट पर अपनी किताब में एक चैप्टर लिखा. अक्षय कुमार की फिल्म 'रुस्तम' भी पूरी तरह से नानावटी केस पर बेस्ड है. पर ये तो बात हुई नानावटी केस और उसके पब्लिक सपोर्ट की. हम आपको बताते हैं उस केस की पूरी डिटेल्स. क्यों और कैसे एक गुनहगार कमांडर के किए मर्डर को देशभक्ति से जोड़ा गया. और उसे बचाने के लिए ज्यादातर सब एक ही हमाम में नजर आए. तारीख: 27 अप्रैल 1959, पुलिस स्टेशन, बॉम्बे
कमांडर नानावटी: मैंने एक आदमी को गोली मारी.
इंस्पेक्टर लोबो: वो मर चुका है. मुझे अभी गामदेवी पुलिस स्टेशन से ये मैसेज मिला. कमांडर नानावटी, क्या आप चाय पिएंगे?
कमांडर नानावटी: बस एक ग्लास पानी.
केएम नानावटी इंडियन नेवी में लेफ्टिनेंट कमांडर था. पारसी कम्युनिटी से बिलॉन्ग करता था. सेल्विया इंग्लैंड में पली बढ़ी खूबसूरत औरत. नानावटी से साल 1949 में इग्लैंड में मुलाकात हुई. शादी हुई. दोनों के तीन बच्चे हुए. दो बेटे एक बिटिया.
कब शुरू हुआ ट्रायल?
23 सितंबर 1959. खचाखच भरे डिस्ट्रिक और सेशन कोर्ट में केस की सुनवाई शुरू हुई. जज थे आरबी मेहता. ये केस सबसे पहले ज्यूरी में चला. ज्यूरी में कुल 9 मेंबर थे. दो पारसी, एक एंग्लो इंडियन, एक क्रिश्चियन और पांच हिंदू. सरकार की तरफ से चीफ पब्लिक प्रोसिक्यूटर सी. एम त्रिवेदी ने नानावटी पर प्रेम आहूजा की इरादतन हत्या का चार्ज लगाया. डिफेंस की तरफ से फेमस क्रिमिनल लॉयर कार्ल जे खंडालावाला केस लड़ रहे थे. ये पूरा ट्रायल एक महीने चला. ज्यूरी मेंबर्स क्राइम सीन वाली जगह तक गए.
ज्यूरी यानी कोर्ट की ओर से किसी केस की सुनवाई के लिए चुने गए लोग. ये सोसाइटी के जानेमाने लोग होते थे, जिनके सामने किसी केस की सारी दलीलें रखी जाती. इसके बाद ज्यूरी उस केस का फैसला सुनाती. नानावटी केस के बाद किसी भी केस में ज्यूरी ने कभी कोई सुनवाई नहीं की.
आहूजा के वकीलों ने कहा, नानावटी ने प्लान कर मर्डर किया था. सबूत पेश किए गए. 24 गवाहों की गवाही हुई. जिन इंस्पेक्टर लोबो के सामने नानावटी ने सरेंडर किया था, उनकी गवाही भी हुई. लेकिन लोबो के सामने नानावटी के कबूलनामे को ज्यूरी के सामने इसलिए भी नहीं माना गया, क्योंकि गवाही मैजेस्ट्रियल सुपरविजन में नहीं हुई थी. लोबो ने कोर्ट में लिखकर कहा:
'नानावटी ने जब सरेंडर किया, तब उन्होंने अपनी ऑफिस ड्रेस पहने हुई थी. सफेद ड्रेस. इस ड्रेस में खून का एक भी धब्बा नहीं था.'
लोबो के इस बयान के बारे में आहूजा का केस लड़ रहे वकीलों ने कहा, 'ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि नानावटी ने आहूजा को जानबूझकर दूर से मारा, ताकि कोई सबूत न रह जाए.' डिफेंस के वकीलों ने कोर्ट में तमाम सबूत पेश किए, कि प्रेम आहूजा की मौत महज एक हादसा थी. नानावटी की तरफ से सेल्विया ने भी कोर्ट में गवाही दी. मंजर कोर्ट का कुछ यूं था कि दो दिन नानावटी विटनेस बॉक्स में खड़ा रहा.
सेल्विया और नानावटी ने कोर्ट में कहा:
ज्यूरी यानी कोर्ट की ओर से किसी केस की सुनवाई के लिए चुने गए लोग. ये सोसाइटी के जानेमाने लोग होते थे, जिनके सामने किसी केस की सारी दलीलें रखी जाती. इसके बाद ज्यूरी उस केस का फैसला सुनाती. नानावटी केस के बाद किसी भी केस में ज्यूरी ने कभी कोई सुनवाई नहीं की.
'नानावटी ने जब सरेंडर किया, तब उन्होंने अपनी ऑफिस ड्रेस पहने हुई थी. सफेद ड्रेस. इस ड्रेस में खून का एक भी धब्बा नहीं था.'
मर्डर का लव ट्रॉयंगल














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Blitz शुरू होने के कुछ वक्त बाद ही काफी फेमस हो गया था. Blitz वीकली पेपर था, इसके बावजूद नानावटी केस की जैसी कवरेज Blitz ने की, कोई दूजा अखबार नहीं कर पाया. करंजिया ने अखबार में चार-चार पन्ने नानावटी केस की कवरेज पर छापे. नानावटी के लिए करंजिया ने खुलकर स्टैंड लिया. बिना किसी परवाह के.
फोटो फीचर लगाने के साथ सेल्विया के प्रेम आहूजा और कमांडर नानावटी के लिए लोगों की दीवानगी को Blitz ने खूब परोसा. बताते हैं कि Blitz ने नानावटी केस की ऐसी कवरेज करी कि शनिवार को आने वाले इस अखबार को खरीदने के लिए लोग शुक्रवार को ही न्यूजपेपर स्टैंड पर जुट जाते थे. 25 पैसे का ये अखबार उस दौर में 2 रुपये तक बिका है.
तारीख 21 अक्टूबर 1959. जज ने ज्यूरी से फैसला सुनाने के लिए कहा. शाम के साढ़े चार बज रहे थे. ज्यूरी ने कुछ वक्त मांगा. घंटे बीते. लोगों की भीड़ बढ़ी. ज्यूरी शाम को साढ़े सात बजे लौटी और फैसला सुनाया:



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