नवंबर, 2012. दिल्ली घने कोहरे में घिरी हुई है. मुख्यमंत्री शीला दीक्षित से लोग पूछ रहे हैं कि सरकार क्या कर रही है. शीला कहती हैं कि ये सब हो रहा है पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों की वजह से. वो लोग अपने खेतों की खूंटियों को जला रहे हैं. वही धुआं दिल्ली पर छाया हुआ है.

नवंबर 2012
नवंबर, 2016. दिल्ली घने कोहरे में घिरी हुई है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लोग अभी पूछें, उससे पहले ही शीला वाला जवाब दुहरा दिया. डिट्टो. ये पॉलिटिक्स बदलने आए थे. काम करने का तरीका बदलने आए थे.

नवंबर 2016
पर क्या दोनों मुख्यमंत्रियों का किसानों पर आरोप लगाना सही है? क्या खेतों में जलने वाली खूंटियां (Stubble Burning) ही इसके लिए जिम्मेदार हैं?
न्यूयॉर्क टाइम्स ने रिपोर्ट किया है कि दिल्ली में कोहरे की 25 प्रतिशत वजह ये जलने वाली खूंटियां हैं. इसके लिए उन लोगों ने नासा से आई तस्वीरें दिखाई हैं. तो ये नहीं कह सकते कि सिर्फ किसान ही जिम्मेदार हैं कोहरे के लिए.

NY Times- NASA
पर किसान खूंटियां जलाते क्यों हैं?
खूंटियां जलाने का मौसम अप्रैल-मई और अक्टूबर-नवंबर का है. पहले हाथ से फसल काटी जाती थी. तो जड़ समेत निकाल ली जाती थी. अब मशीनों से कटाई होती है. मशीनें एक बराबर फसल काट देती हैं. नीचे की जड़ें खेत में ही छोड़ देती हैं. अब उनको निकालना आसान नहीं होता है. फिर पैसे खर्च करने पड़ेंगे ट्रैक्टर और हल के लिेए. फिर इसके बाद महीने भर खेत छोड़ना भी पड़ता है. पर एक साल में कई फसलें भी लगानी होती हैं. तो किसान आसान रास्ता अपनाते हैं. इनको जला देते हैं. यही धुआं आसमान में फैल जाता है. अक्टूबर-नवंबर का वक्त ऐसा होता है कि ये धुआं आसमान में ही रह जाता है. हवा उतनी तेज नहीं रहती कि बहा ले जाये.पर फसलों की ये खूंटियां बड़े काम की चीज होती हैं. गांवों में जब हाथ से कटाई होती थी तब ये चीजें भूसा बनाने के काम आती थीं. या फिर कार्डबोर्ड बनाने के काम में. पर अब सांस रोकने के काम में आती हैं. या फिर सारा ब्लेम लेने के काम में.

किसान कहते हैं कि अगर इसके पैसे मिलें तो हम नहीं जलायेंगे. क्योंकि अगर जलाने में भी 10 दिन लेट करते हैं तो फसल की पैदावार कम हो जाएगी. तो ये पूरी तरह से सरकार की जिम्मेदारी है. कि वो लोग कैसे इस चीज से निपटते हैं. कैसे पॉवर प्लांटों को समझाते हैं कि इस चीज का इस्तेमाल वो लोग कर सकते हैं. या फिर पेपर इंडस्ट्री को भी इसमें लगाया जा सकता है कि किसानों को कुछ पैसे देकर खरीद लें. इस व्यवस्था को कायम करने के लिए बड़ी इच्छाशक्ति चाहिए होगी. डिसीजन-मेकिंग और कर देने वाली बात. किसी भी कीमत पर. हर साल.
सरकार क्या कर रही है?
भटिंडा और बरनाला के 11 किसान खेत जलाने के जुर्म में बुक किये जा चुके हैं. हरियाणा में 1406 केस बने हैं. सेक्शन 188 यानी पब्लिक सर्वेंट के आदेश को ना मानने के जुर्म में. सरकार बात-बात पर प्रत्यंचा चढ़ा लेती है. उपाय नहीं बताती. अगर किसान ना जलायें तो क्या करें? इंतजार. फिर फसल नहीं होगी, लोग आत्महत्या करेंगे. इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेगा. कोई कायर बतायेगा, कोई कहेगा कि जिंदगी जीने के लिए है. लड़ने के लिए है.केंद्र और दिल्ली सरकारों को आईआईटी कानपुर ने एक साल पहले ही रिपोर्ट दे दी थी कि जितना प्रदूषण चल जाएगा, उसका पांच गुना गरमी में रहता है. और छह गुना जाड़े में. पर सरकारों को कोई मतलब नहीं. एक जगह चुनाव जीत गये, अब दूसरी जगह जीतेंगे. ये एक साल बर्बाद हो गया, क्योंकि उस रिपोर्ट में ये भी बताया गया था कि क्या करना है.

aqcin.org
दिल्ली में 50 प्रतिशत पॉल्यूशन कंस्ट्रक्शन की वजह से है. सबसे ज्यादा कंस्ट्रक्शन सरकार ही करवाती है. पर इसके लिए कोई गाइडलाइन नहीं है. लोग खुलेआम धूल बिखेरते हैं. ये नहीं कि शीट लगाकर उड़ने ना दें. इसको कोई नहीं रोकता है. फिर बाकी शहरों की तुलना में दिल्ली में गाड़ियां भी बहुत ज्यादा हैं. लगभग 70 लाख. हर दिन हजार नई गाड़ियां रोड पर आ जाती हैं. इस पर किसी का ध्यान नहीं है. दीवाली में पटाखे छूटते हैं. इतने कहीं नहीं छूटते. इसको नहीं रोका जाता है. धर्म से जुड़ा मान कोई कुछ नहीं बोलता. मतलब लोग मरें वो ठीक है. जवाब तो तैयार है कि किसान के चलते हो रहा है.
पर रोहतक और चंडीगढ़ में क्यों नहीं है उतना पॉल्यूशन? ये शहर तो पंजाब-हरियाणा के किसानों की जद में हैं. धुआं खाली दिल्ली देख के ही आता है क्या?
जो सीन अभी दिल्ली में है, वैसा ही दिसंबर 1952 में लंदन में हुआ था. पूरा शहर एक धुएं से घिर गया था. 5 दिसंबर से लेकर 9 दिसंबर तक रहा. 9 को 4000 लोग मर गये थे. कुल 12 हजार लोग मरे. इसके बाद लंदन ने कड़े कदम उठाये. नये-नये कानून बने. और इनको इंप्लीमेंट करने के लिए कड़ाई की गई. फैक्टरियों से निकलने वाले धुएं को रोक दिया गया. सबको समझाया गया. पर दिल्ली में तो दीवाली के एक सप्ताह बाद भी लोग पटाखे छोड़ रहे हैं. छठ के नाम पर. यमुना के जहरीले पानी में डुबकी लगा रहे हैं. और स्मॉग से कोई मतलब नहीं. 2013 में चीन के बीजिंग में भी ऐसा ही हुआ था. पर वहां कड़ाई की गई. पटाखे तो एकदम ही रोक दिये गये. ऑड-इवन लगाया गया.

ये कोई सामान्य बात नहीं है. मीटर जितना नापता है, उसका दुगुना पॉल्यूशन है दिल्ली में. और सरकार इसके लिेए कोई कदम नहीं उठा रही है. ये सबसे ज्यादा चिंताजनक है. पर आसान रास्ता जरूर खोज लिया है. किसानों को ब्लेम करने का. क्योंकि तब कहा जा सकता है कि वो तो दूसरों राज्यों के हैं जी, हम क्या कर सकते हैं.
























