The Lallantop

जनता से विदेश यात्रा टालने की अपील और खुद यूरोप दौरे पर पीएम मोदी! क्या है इसके पीछे का असली गेम प्लान?

पीएम नरेंद्र मोदी 15 मई से 5 देशों की यात्रा पर हैं. जबकि एक ही दिन पहले उन्होंने देशवासियों से विदेश यात्राओं में कमी लाने की अपील की थी. ऐसे में अब सोशल मीडिया से लेकर ड्राइंग रूम तक एक बहस छिड़ी है कि क्या प्रधानमंत्री की ये नसीहत सिर्फ जनता के लिए है?

Advertisement
post-main-image
इंडियावालों से विदेश यात्रा टालने की अपील कर खुद विदेश क्यों निकल रहे हैं प्रधानमंत्री? (फोटो- ANI)

दुनिया के नक्शे पर इस समय हलचल तेज है. एक तरफ मिडिल ईस्ट यानी पश्चिम एशिया में तनाव की चिंगारी सुलग रही है, जिससे तेल और गैस की सप्लाई चेन पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. दूसरी तरफ, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 15 मई से 20 मई 2026 तक एक महत्वपूर्ण विदेश यात्रा पर निकल रहे हैं. वो यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली जा रहे हैं.

Add Lallantop as a Trusted Sourcegoogle-icon
Advertisement

अब सोशल मीडिया से लेकर ड्राइंग रूम तक एक बहस छिड़ी है. 10 और 11 मई को पीएम ने भारतीयों से अपील की थी कि वे कम से कम एक साल तक गैर-जरूरी विदेश यात्राओं से बचें और देश के भीतर पर्यटन को बढ़ावा दें. तो फिर सवाल उठना लाजिमी है कि क्या प्रधानमंत्री की ये नसीहत सिर्फ जनता के लिए है? क्या उनकी अपनी यात्रा विदेशी मुद्रा के उस खर्च से ज्यादा जरूरी है, जिसे बचाने की बात वो खुद करते रहे हैं?

आज के इस मेगा एक्सप्लेनर में हम इसी गुत्थी को सुलझाएंगे. हम समझेंगे कि एक तरफ आम आदमी की छुट्टियां और दूसरी तरफ देश की सुरक्षा, तकनीक और भविष्य की जरूरतों के बीच का ये 'बड़ा खेल' क्या है. क्या पीएम मोदी का ये दौरा वाकई भारत को उस लीग में खड़ा कर देगा, जहां हम सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि दुनिया के 'टेक हब' होंगे.

Advertisement

प्रधानमंत्री की नसीहत बनाम सरकारी जरूरत: आखिर फर्क क्या है?

सबसे पहले उस विरोधाभास को समझते हैं जिसने इस चर्चा को जन्म दिया है. प्रधानमंत्री ने हाल ही में हैदराबाद में एक संबोधन के दौरान भारतीयों से 'कंट्री फर्स्ट' अप्रोच अपनाने को कहा था. उन्होंने सुझाव दिया था कि लोग कोविड काल की तरह वर्क फ्रॉम होम अपनाएं, ई-व्हीकल का इस्तेमाल करें और एक साल के लिए अपनी विदेशी यात्राओं और छुट्टियों को टाल दें. ‘द हिंदू’ के मुताबिक इसके पीछे ठोस वजह है. पश्चिम एशिया के संकट की वजह से कच्चे तेल की कीमतें बढ़ सकती हैं और भारत चाहता है कि उसका विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) फालतू चीजों में खर्च न हो.

लेकिन जब पीएम खुद नॉर्वे या इटली जाते हैं, तो वो 'खर्च' नहीं बल्कि 'निवेश' की श्रेणी में आता है. एक आम पर्यटक जब विदेश जाता है, तो वो डॉलर खर्च करके मनोरंजन खरीदता है. लेकिन जब देश का प्रधानमंत्री किसी दूसरे देश के साथ मेज पर बैठता है, तो वो अरबों डॉलर का निवेश, नई नौकरियां और ऐसी तकनीक लाने की कोशिश करता है जो आने वाले 50 सालों तक देश की किस्मत बदल सके.

अर्थशास्त्री और लेखक डॉ राजीव नयन सिंह का मानना है कि 

Advertisement

इस समय दुनिया जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां भारत को अपनी सप्लाई चेन सुरक्षित करनी होगी. अगर हम आज घर में बैठ गए, तो सेमीकंडक्टर से लेकर ग्रीन एनर्जी तक की रेस में हम दशकों पीछे छूट सकते हैं. इसलिए पीएम का ये दौरा किसी 'वेकेशन' का हिस्सा नहीं, बल्कि एक रणनीतिक मजबूरी है.

1. ऊर्जा सुरक्षा: जब खाड़ी देशों में आग लगी हो, तो नॉर्डिक देश क्यों जरूरी हैं?

भारत अपनी जरूरत का 85 परसेंट से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. फिलहाल ईरान और इजरायल के बीच जो चल रहा है, उससे हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के बंद होने का खतरा है. अगर वहां से सप्लाई रुकी, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी. ऐसे में नॉर्वे जैसे देशों की अहमियत बढ़ जाती है.

नॉर्वे सिर्फ तेल का धनी देश नहीं है, बल्कि वो क्लीन एनर्जी और समुद्री संसाधनों यानी 'ब्लू इकोनॉमी' का उस्ताद है. इस यात्रा के दौरान ओस्लो में होने वाले भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन में फोकस इसी बात पर है कि भारत कैसे ग्रीन हाइड्रोजन और विंड एनर्जी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके.

‘ग्लोबल ऑर्डर’ के मुताबिक अगर भारत नॉर्वे की तकनीक से समंदर के बीचों-बीच पवन चक्कियां लगाकर बिजली पैदा करने में कामयाब हो जाता है, तो हमारी अरब देशों पर निर्भरता कम होगी. यह मिडिल क्लास के लिए सीधा फायदा है क्योंकि भविष्य में बिजली और ईंधन के दाम स्थिर हो सकते हैं.

2. सेमीकंडक्टर और AI: क्या भारत बनेगा अगला ग्लोबल चिप मेकर?

आज के दौर में जिस देश के पास चिप यानी सेमीकंडक्टर की तकनीक है, वही दुनिया पर राज करेगा. आपके मोबाइल से लेकर कार और मिसाइल तक, सब कुछ इन छोटी सी चिप्स पर निर्भर है. भारत इस मामले में फिलहाल दूसरे देशों के भरोसे है.

नीदरलैंड और स्वीडन इस मामले में भारत के लिए सोने की खान साबित हो सकते हैं. नीदरलैंड की कंपनियां दुनिया की सबसे एडवांस चिप बनाने वाली मशीनें बनाती हैं. पीएम मोदी की इस यात्रा का एक बड़ा हिस्सा डच और स्वीडिश टेक दिग्गजों के साथ बातचीत पर केंद्रित है.

‘प्रेस इनफॉरमेशन ब्यूरो’ यानी पीआईबी के मुताबिक फरवरी 2026 में ही भारत और स्वीडन ने 'SITAC' (Sweden-India Technology and Artificial Intelligence Corridor) बनाने पर सहमति जताई है. इसका मतलब ये है कि स्वीडन की हाई-टेक कंपनियां भारत के स्टार्टअप्स और युवाओं के साथ मिलकर एआई और रोबोटिक्स पर काम करेंगी. जब ये तकनीक भारत आएगी, तो यहां बड़े पैमाने पर 'व्हाइट कॉलर' नौकरियां पैदा होंगी, जिनका फायदा सीधे तौर पर हमारे युवाओं को मिलेगा.

3. रक्षा और रणनीतिक मजबूती: इटली और स्वीडन के साथ नया 'दोस्ताना'

‘इकोनॉमिक टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत अपनी सेना को आधुनिक बनाने के लिए तेजी से कदम उठा रहा है. इस दौरे का आखिरी पड़ाव इटली है, जो रक्षा तकनीक के मामले में बहुत आगे है. भारत और इटली ने 2026-27 के लिए एक 'मिलिट्री कोऑपरेशन प्लान' तैयार किया है.

इसका मतलब ये है कि अब हम सिर्फ हथियार खरीदेंगे नहीं, बल्कि इटली की मदद से उन्हें भारत में बनाएंगे. स्वीडन की कंपनी 'साब' (Saab) पहले ही भारत में रॉकेट लॉन्चर बनाने की यूनिट लगा चुकी है. इस दौरे में चर्चा अगले स्तर की है, जैसे कि फाइटर जेट इंजन और एडवांस रडार सिस्टम.

सीनियर डिफेंस एक्सपर्ट डीके पांडे के मुताबिक, 

जब हम यूरोप के साथ ऐसे सौदे करते हैं, तो हम रूस या अमेरिका जैसे देशों पर अपनी एकतरफा निर्भरता को कम करते हैं. इससे भारत की मोलभाव करने की शक्ति बढ़ती है.

आम आदमी के लिए इसका मतलब है एक मजबूत सरहद और देश की सुरक्षा पर होने वाले खर्च का सही इस्तेमाल.

modi
पीएम मोदी की यात्रा से भारत को हासिल क्या होगा (फोटो- ANI)

4. भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन: ओस्लो में रचेगा नया इतिहास

करीब 43 साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री नॉर्वे जा रहा है. यह अपने आप में एक ऐतिहासिक पल है. ओस्लो में मोदी डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन के राष्ट्राध्यक्षों के साथ बैठेंगे. ये पांचों देश भले ही आबादी में छोटे हों, लेकिन पैसा और तकनीक के मामले में ये दुनिया के 'पॉवरहाउस' हैं.

‘द संडे गार्डियन’ के मुताबिक इस सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि हो सकती है 'TEPA' (Trade and Economic Partnership Agreement) को जमीन पर उतारना. इसके तहत इन देशों ने भारत में अगले 15 सालों में 100 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है. यह कोई छोटी रकम नहीं है. 100 अरब डॉलर का मतलब है लाखों नए ऑफिस, फैक्ट्रियां और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स.

यह निवेश सिर्फ दिल्ली या मुंबई तक सीमित नहीं रहेगा. इसमें टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए भी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट्स शामिल हैं. यानी इस यात्रा का असर सीधे आपकी जीवनशैली और आपके शहर की सुविधाओं पर पड़ेगा.

5. निवेश और रोजगार: मध्यम वर्ग के लिए इस यात्रा में क्या है?

अब बात करते हैं उस सवाल की जो हर भारतीय के मन में है- "मेरे लिए क्या है?" 

नॉर्वे का सरकारी पेंशन फंड (GPFG) दुनिया के सबसे बड़े वेल्थ फंड्स में से एक है. इसने पहले ही भारतीय शेयर बाजार में करीब 28 अरब डॉलर लगा रखे हैं. समाचार एजेंसी ANI के मुताबिक इस यात्रा के बाद उम्मीद है कि ये निवेश और बढ़ेगा.

जब विदेशी निवेश आता है, तो सेंसेक्स और निफ्टी में मजबूती आती है, जिसका सीधा फायदा उन करोड़ों भारतीयों को होता है जिन्होंने म्यूचुअल फंड या एसआईपी (SIP) में पैसा लगा रखा है. इसके अलावा, फिनलैंड और डेनमार्क जैसे देशों के साथ स्किल डेवलपमेंट पर होने वाले समझौते हमारे यहां के इंजीनियरों और पेशेवरों के लिए यूरोप के दरवाजे खोलेंगे.

सरकार का लक्ष्य है कि इन देशों की मदद से भारत में 'ग्रीन जॉब्स' पैदा की जाएं. यानी ऐसी नौकरियां जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना भविष्य की जरूरतों को पूरा करें. यह दूरगामी सोच ही भारत को 2047 तक 'विकसित भारत' बनाने का रास्ता साफ करेगी.

विपक्ष का तर्क और सरकार का बचाव: क्या है असली हकीकत?

राजनीति में हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. विपक्ष का कहना है कि जब देश महंगाई और बेरोजगारी से जूझ रहा है, तब प्रधानमंत्री का बार-बार विदेश जाना और जनता को घर बैठने की सलाह देना 'दोहरा मापदंड' है. उनके मुताबिक, जो समझौते हो रहे हैं, उनका असर दिखने में बरसों लग जाएंगे, जबकि जनता को तुरंत राहत चाहिए.

वहीं सरकार का तर्क बड़ा साफ है. विदेश नीति और घरेलू अपील दो अलग चीजें हैं. घरेलू अपील का मकसद 'फॉरेन एक्सचेंज' को ड्रेन होने से बचाना है, जबकि पीएम की यात्रा उसी फॉरेन एक्सचेंज भंडार को भरने (FDI के जरिए) और देश को सुरक्षित बनाने के लिए है.

अगर हम आज ग्लोबल टेक और डिफेंस चेन का हिस्सा नहीं बनते, तो भविष्य में हमें यही चीजें बहुत महंगी कीमतों पर खरीदनी पड़ेंगी. सरकार इसे 'शॉर्ट टर्म पेन, लॉन्ग टर्म गेन' की तरह देख रही है.

क्या बदल जाएगा इस यात्रा के बाद?

इस 5 देशों की यात्रा के बाद भारत की वैश्विक स्थिति में कुछ बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं. मिसाल के तौरपर,

सस्ती तकनीक: भारत में सेमीकंडक्टर और एआई आधारित उत्पादों की लागत कम हो सकती है.

ऊर्जा विकल्प: सोलर और विंड एनर्जी के क्षेत्र में नए स्टार्टअप्स की बाढ़ आ सकती है.

यूरोपीय बाजार तक पहुंच: भारत-ईयू फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) के बाद भारतीय सामानों पर ड्यूटी कम होगी, जिससे निर्यात बढ़ेगा.

डिजिटल पब्लिक गुड्स: भारत का 'यूपीआई' और 'ओएनडीसी' जैसा मॉडल अब इन नॉर्डिक देशों में भी अपनाया जा सकता है.

कुल मिलाकर, ये यात्रा सिर्फ हाथ मिलाने या फोटो खिंचवाने का मौका नहीं है. ये भारत की उस महत्वाकांक्षा की उड़ान है, जहां हम सिर्फ दुनिया के लिए एक 'मार्केट' नहीं रहना चाहते, बल्कि 'मैन्युफैक्चरर' और 'इन्नोवेटर' बनना चाहते हैं.

ये भी पढ़ें: गुजरात के नमक पर टिकी है ‘सेमी कंडक्टर’ और लैपटॉप की क्वालिटी

नसीहत भी सही और सफर भी जरूरी

तो क्या प्रधानमंत्री अपनी ही बात काट रहे हैं? जवाब है- नहीं. एक व्यक्ति के तौर पर विदेश में पैसे खर्च करना और एक राष्ट्र प्रमुख के तौर पर देश के लिए मौके तलाशना, दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है.

आम जनता के लिए पीएम का संदेश बचत और स्वदेशी को बढ़ावा देने का है, ताकि अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत रहे. वहीं उनका अपना दौरा उस नींव पर एक भव्य इमारत खड़ी करने की कोशिश है. आने वाले दिनों में होने वाले एमओयू (MoUs) और बिजनेस डील ये तय करेंगे कि भारत 2026 के इस वैश्विक संकट से विजेता बनकर निकलता है या नहीं.

अगर ये दौरे सफल रहते हैं, तो आने वाले समय में आपको अपने हाथ में जो फोन होगा या आप जिस गाड़ी में चलेंगे, उसमें 'मेड इन इंडिया' का गर्व और यूरोप की 'हाई-टेक' चमक दोनों होगी.

वीडियो: दी लल्लनटॉप शो: पीएम मोदी ने क्यों किया कोरोना, वर्क फ्रॉम होम का जिक्र? क्या संकट आने वाला है?

Advertisement