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प्रधानमंत्री मोदी के नाम खुला ख़त: "BHU की बेटियां क्या बेटियां नहीं हैं?"

'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' का नारा किस जगह की बेटियों के लिए था?

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घायल लड़कियों की ये तस्वीरें बहुत बुरा महसूस करवाती है.
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
जानता हूं ये खत आप तक नहीं पहुंचेगा. वैसे भी ऐसे खतों का मक़सद कभी भी ये नहीं होता कि वो मंज़िल तक पहुंच जाए. ये तो महज अपनी बात कहने का ज़रिया भर होता है.
बनारस यूनिवर्सिटी में बेटियां पिट रही हैं सर और वो भी जायज़ मांगों के लिए. छेड़खानी के विरोध में धरने पर बैठी लड़कियों पर लाठियां चल गई हैं. रोशन रास्ते, 24 घंटे गार्ड और भयमुक्त वातावरण, यही कुछ मांगा था उन्होंने. न तो कहीं से 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' की आवाज़ आई और न ही कोई ऐसी हरकत हुई जिससे संस्कृति को धक्का पहुंचता. फिर भी पिट गईं लड़कियां.
आप कल बनारस में थे सर. मैं आश्वस्त था कि ये मुद्दा खत्म हो जाएगा. आप किसी भी तरह हस्तक्षेप करेंगे और बेटियों को उनका हक़ मिल जाएगा. उनकी सुनी जाएगी. आप तो गए ही नहीं उधर सर. ये कल की सबसे ज़्यादा निराश करने वाली ख़बर थी. कई लोग आपके प्रोटोकॉल की बात करते हैं. कई सुरक्षा कारणों की दुहाई देते हैं लेकिन मेरी अकल कहती है कि आप इस वक़्त देश के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हैं. बादशाह हैं मुल्क के. आप चाहते तो सब हो जाता. प्रोटोकॉल, सिक्योरिटी सब अरेंज हो जाता. आप अतीत में ऐसा कर भी चुके हैं. इस बार तो ज़रूरत भी थी.
ये न समझिए कि मैं आपके सर कोई ठीकरा फोड़ना चाहता हूं या घुमा-फिरा कर आपको ज़िम्मेदार ठहराना चाहता हूं. ऐसा कतई नहीं है. बस BHU के हालात देखते हुए आप की कही कई बातें याद आती हैं. 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का नारा देने वाले पीएम के राज में बेटियों को पीटा जा रहा है. वो भी उसी के संसदीय क्षेत्र में. ये दुखी करने वाला नज़ारा है सर. काशी का बेटा काशी की बेटियों के लिए अजनबी है. हताशा ऐसे ही आती है.
ये पोस्टर अब MEME की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं लोग.
ये पोस्टर अब MEME की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं लोग.

लोग पूछते हैं कि क्यों जाना चाहिए था आपको वहां? मुल्क के, प्रदेश में सत्तारूढ़ पार्टी के मुखिया होने के नाते आपका दायित्व तो बनता ही है. लेकिन फिर भी दो प्रमुख वजहें ऐसी हैं इनकी वजह से आपका वहां होना बनता था.
1. आप बनारस से सांसद हैं. वो आपका संसदीय क्षेत्र है. वहां के लोगों की कोई भी गुहार सीधी आपके पास ही पहुंचेगी.
2. आप शहर में मौजूद थे. वहां से 10 मिनट की दूरी पर. ये ज़्यादा बड़ी बात है. आप वहां न होते तो शायद ये शिकायत नहीं होती.
अब इसे ऐसे देखिए.
# एक व्यक्ति देश का प्रधान है.
# प्रदेश में भी उसी की पार्टी की सत्ता है. 
# वो शहर उसका संसदीय क्षेत्र भी है.
# बेटियों को बचाने की, पढ़ाने की बात वो लगातार कहता आ रहा है.
# ये प्रोटेस्ट भी बेटियों का ही है. पढ़ने वाली बेटियां.
# वो उसी शहर में इत्तेफाक़न मौजूद भी है.
इसके बावजूद भी इतने बड़े मसले को नज़रअंदाज़ कर के गुज़र जाना, भयानक रूप से असंवेदनशील दिखता है सर. इसे आप ऐसे क्यों नहीं देख पाए?
इन बेसिक मांगों में नाजायज़ क्या है समझ नहीं आता.
इन बेसिक मांगों में नाजायज़ क्या है समझ नहीं आता.

उत्तर प्रदेश में जिस शख्स को आपने कमान सौंपी थी उन्होंने चार्ज संभालते ही सबसे पहले एक काम किया था. एंटी रोमियो स्क्वॉड का गठन. लाठी-डंडों से युक्त आर्मी. कहते हैं शोहदों से लड़कियों को बचाना इसका मकसद था. ऐसे ही कुछ शोहदों से परमानेंट मुक्ति की मांग कर रही लड़कियों पर लाठी पड़ गई है. ये विडंबना आपको विचलित नहीं करती?
जिस राज्य ने आपको गोद लिया था, वो आपसे उम्मीदें लगाए ये असंवैधानिक तो नहीं होगा न? मेरी शिकायतों को कुछ लोग अंधविरोध के संदूक में डालकर उसे गंगा में बहाना चाहते हैं. इस मुल्क में कुछ दिनों से नैरेटिव की दो ही किस्में सर्वमान्य हो गई हैं. जो कुछ भी कहा, बोला, लिखा जा रहा है, वो या तो आपके पक्ष में है, या विपक्ष में. किसी कॉमन ग्राउंड पर खड़े होने की किसी को इजाज़त ही नहीं मिलती.
कोई कितनी ही शिद्दत से आपकी कोई उपलब्धि गिनाए उसे तुरंत कुछ लोग अंधभक्त की कैटेगरी में डाल देते हैं. दूसरी तरफ कोई एस्टैब्लिशमेंट के खिलाफ जायज़ शिकायत भर कर दे, वो अंधविरोधी मार्क हो जाता है. ट्रोलिंग के लायक. हमें पता नहीं चल रहा, लेकिन धीरे-धीरे हम उस मुकाम की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां कोई संभावित दंगा किसी दो कौमों के बीच नहीं होगा. बल्कि आपके समर्थक और विरोधियों के बीच होगा. पता नहीं ये बात आपको चिंतित करती है या नहीं! मुझे तो करती है.
BHU की लड़कियां बहुत बेसिक चीजें मांग रही हैं. सुनिश्चित कीजिए कि उनका सम्मान बना रहे. वर्तमान सुनहरा होता है सर. वो सिर्फ चमकीली चीज़ें लिखता है. इतिहास क्रूर होता है. बाकी आप समझदार हैं.


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