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रेगिस्तान छोड़कर झूला आसमान पर जाता है, जब सावन आता है

तीज पर सब घरों में सातू नाम की मिठाई बनती है. घी और गेहूं, चने या चावल के आटे से बनती है.

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फोटो - thelallantop
रेत जैसे किसी ने सोने का बुरादा बिखेर दिया हो. पेड़-पौधे ऐसे दिखते, जैसे उन पर सोने का झोळ चढ़ा रखा हो. सूरज सिर पर आता तो पत्थर ऐसे चमकते जैसे सोना. आसमान ने ओढ़ रखी होती चांदी की चादर. आक के पीले पड़ चुके पत्ते. पानी की तलाश में भटकते ढोर. तालाबों में सूखकर चमकती पपड़ियां. रेगिस्तान सावन के महीने से कुछ दिन पहले ऐसा ही दिख रहा होता. लू के थपेड़ों से झुलसा हुआ. आषाढ़ का महीना निकलते-निकलते आसमान भरने लगता रुई के फाहों जैसे बादलों से. और फिर सावन आते-आते बादल काले होकर बरसने शुरू हो जाते. किस्सा सुना रहा हूं सावन-भादों का. जब रेगिस्तान हरियल हो जाता है. जब छूने लगती तालाब के पानी से घुली मधरी हवा. कानों में गूंज रही होती हैं मेढकों की टर्राहट. शामें मोरों के कलरव से गूंज उठतीं. आक, खींप, खेजड़ियां, जाळें और यहां कि सारी वनस्पतियां अपने रंग बदल रही होतीं. जैसे सारा रेगिस्तान महीनों से रूठी अपनी प्रेमिका बारिश को मनाकर नाच रहा हो. https://youtu.be/dScf_qKg17U?t=2m55s सबसे ज्यादा खुश इन महीनों में छोटे बच्चे और किशोरवय लड़कियां दिखतीं. बच्चों के लिए बारिश, पानी, मिट्टी, खेल, झूले मिल जाते. लड़कियों के लिए तीज और रक्षाबंधन. बच्चे स्कूल से निकलते ही सारा टाइम घर के आस-पास के पेड़ों पर रस्सियों के आड़े-तिरछे झूलों पर लटकते दिखते. रातों को घर के आगे बने ओटों (चबूतरों) पर गूंज रहे होते सावन के गीत. https://www.youtube.com/watch?v=nCbiX1BkX2E सावन तीज सबसे अच्छे त्योहारों में से एक है. क्योंकि बारिश हो रही होती है. सारी लड़कियां पूरे सावन अपने पीहर रहती है. तीज पर सब घरों में सातू नाम की मिठाई बनती है. घी और गेहूं, चने या चावल के आटे से बनती है. और स्टील के बड़े डिब्बे भरकर एक-दूसरे के यहां भेजे जाते हैं. ऊपर काजू, बादाम और रंग-बिरंगे चिन्नू-मिन्नू डालकर. इतना स्वाद होता है कि डिब्बा देखते लार टपक जाए. https://youtu.be/crLcd99c0Tc?t=11m30s सावन के महीने में लड़कियां व्रत रखती हैं. सावन के हर सोमवार को गांव के पास के पुराने शिवजी के मंदिर जातीं. हम भी साथ जाते थे. रास्ते भर वो गाते हुए जाती थीं और हम सब बच्चे खेलते हुए. उस मंदिर के पास नदी बहती है. पुराने मंदिर की दीवारों और धूल में सोंधी सी महक आती थी. बहुत अच्छी लगती. वहां जो भी प्रसाद चढ़ता, वो मिलता था. और फिर पहाड़ी पर चढ़कर देखते रहते नदी, जंगल और रेगिस्तान को. तीज के दिन शाम को गांव के पास के बड़े खेजड़ी के पेड़ पर हींड (झूला) बांधी जाती. गांव के कुछ मोटियार लड़के तैयार रहते हैं कि कब तीज आए और हींड बांधें. पूरे गांव की लड़कियां, जिन्हें तीजणियां कहते हैं. वहां हींडने (झूला झूलने) आती हैं. जब सारी तीजणियां हींडने के बाद लौट जाती हैं, तब बारी आती हैं लड़कों की. और लगती है शर्त सबसे ऊंची कौन ले जाएगा हींड. दो-दो लड़के एक साथ हींड मचाते हैं. पैरों के जोर से कुछ लड़के खेजड़ी की सबसे ऊंची डालों को छू आते. मुझे तो देखकर ही चक्कर आने लगता था. https://www.youtube.com/watch?v=HU0EyyoAsQs रक्षाबंधन वाले दिन सूरज चढ़ते-चढ़ते कलाई राखियों से भर जाती. दोपहरों को घर के पास छांव में बच्चे पत्थरों से नारियल तोड़ते मिलते. ये नारियल उन्हें सुबह बहन ने राखी बांधते वक्त तिलक लगाकर दिए थे. उन दिनों टीवी और सोशल मीडिया तो थे नहीं. वरना किसको वक्त होता राखी दिखाने और झूला झूलने का. दिन भर अपनी राखियां दिखाते फिरते थे घर-घर में. रक्षाबंधन में पास के गांव के माराज (ब्राह्मण) राखी बांधने आते हैं सबको. हमारे माराज घोड़ी लेकर आते थे. उनके पीछे भागते रहते. इन दो महीनों का इतना नॉस्टेल्जिया है कि गांव से दूर बड़ी मुश्किल होती है. जब वो सारा सीन आंखों के सामने घूमने लगता है. पेड़, पौधे, पानी, पंछी, गीत, लोग, हवा, आसमान सब कुछ इतने सुंदर दिखते थे कि समझ में ही नहीं आता था कि ये वही मई-जून वाला सूखा सा रेगिस्तान ही है.

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