इज़रायल में कोर्ट और सरकार आपस में गुत्थम-गुत्था हो गए हैं. 18 जनवरी 2022 को सप ने बेंजामिन नेतन्याहू के एक ख़ास दोस्त को कैबिनेट से दूर रखने का आदेश दिया है. उस दोस्त ने नेतन्याहू से मुलाक़ात के बाद कहा कि, मैं इस फ़ैसले को नहीं मानता.
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बेंजामिन नेतन्याहू ने हाल ही में इज़रायल की सत्ता में वापसी की है. उन्होंने कुछ कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियों के साथ गठबंधन करके सरकार बनाई है. ये सत्ताधारी गठबंधन न्यायपालिक की शक्तियां कम करने पर उतारू है. इसको लेकर इज़रायल के कई शहरों में प्रोटेस्ट भी हो रहे हैं. अब जबकि हाईकोर्ट ने सीधा नेतन्याहू के करीबी को निशाने पर लिया है, इसके कारण इज़रायल में बड़ा संकट खड़ा हो गया है. अगर नेतन्याहू कोर्ट की बात मान लेते हैं तो, उनकी सहयोगी पार्टियां उनसे नाराज़ हो जाएंगे. और, अगर बात नहीं मानते हैं तो ये न्यायपालिका को ठेंगा दिखाने जैसा होगा.
इज़रायल में पिछले चार सालों के अंदर पांच आम चुनाव हो चुके हैं. आम स्थिति में प्रधानमंत्री का कार्यकाल चार बरस का होता है. यानी, जितने समय में पांच चुनाव हुए, उतने में सिर्फ एक होना चाहिए था. इसकी वजह क्या रही? इज़रायल के इतिहास में कभी भी किसी पार्टी ने अकेले दम पर सरकार नहीं बनाई है. जब भी सरकार बनी, दो या दो से अधिक पार्टियों ने मिलकर बनाई. लेकिन पिछले कुछ चुनावों से बात बन नहीं रही थी. गठबंधन का संयोग नहीं बन रहा था. जैसे, जून 2021 में सत्ता में आई नफ़्ताली बेनेट की सरकार में सात पार्टियां शामिल हुईं थी. इस गठबंधन ने लगभग दस सालों से सरकार चला रहे बेंजामिन नेतन्याहू को कुर्सी से उतार दिया. हालांकि, बेनेट गठबंधन नहीं चला पाए. उनकी सरकार एक साल के अंदर गिर गई. जिसके बाद नवंबर 2022 में पांचवां चुनाव कराना पड़ा. इसमें बेंजामिन नेतन्याहू का रुतबा वापस लौटा. नेतन्याहू की लिकुद पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं. नियम के मुताबिक, राष्ट्रपति ने उन्हें सरकार बनाने का न्यौता दिया. 22 दिसंबर को डेडलाइन से ठीक पहले नेतन्याहू ने बहुमत जुटा लिया. इसके ठीक एक हफ़्ते बाद उन्होंने छठी बार इज़रायल के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ले ली.
नेतन्याहू की इस सरकार में इस्लाम-विरोधी और कट्टर दक्षिणपंथी पार्टियां शामिल हुईं थी. गठबंधन में शामिल कुछ नेता खुले तौर पर समलैंगिकों और महिलाओं के ख़िलाफ़ बयान देते रहते थे. एक बेन ग्विर नस्लभेदी गतिविधियों और एक आतंकी संगठन को सपोर्ट करने के लिए सज़ा काट चुके थे. इसी वजह से इस सरकार को लेकर काफ़ी आशंकाएं थीं. जब सवाल उठे, तब नेतन्याहू मीडिया के सामने आए. उन्होंने कहा कि उनके विरोधी ज़बरदस्ती डर का माहौल बना रहे हैं. जैसा चल रहा है, वैसा चलता रहेगा.
हालांकि, नेतन्याहू का दावा भ्रम साबित हुआ. नई सरकार ने कुर्सी पर बैठते ही अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया. सबसे पहली चोट न्यायपालिका पर की गई. 1990 के दशक में इज़रायल में न्यायपालिका की शक्तियां बढ़ाई गईं थी. नेतन्याहू सरकार का कहना है कि इससे शक्ति का असंतुलन हो रहा है. न्यायपालिका यानी कोर्ट, सरकार और संसद से ज़्यादा ताक़तवर बनती जा रही हैं. किसी भी सफल लोकतंत्र में शासन की तीनों इकाइयां यानी न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका स्वतंत्र होकर काम करती हैं. उनके बीच चेक एंड बैलेंस का सिस्टम रहता है. वे एक-दूसरे को निरंकुश होने से रोकती हैं. लेकिन नेतन्याहू गठबंधन के मुताबिक, इज़रायल में न्यायपालिका निरंकुश हो चुकी है. उसकी शक्तियों में कटौती की ज़रूरत है.

इज़रायल की न्यायपालिका में सुप्रीम कोर्ट सबसे बड़ी संस्था है. इसे कुछ मौकों पर हाईकोर्ट ऑफ़ जस्टिस भी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट में कुल 15 जज होते हैं. उन्हें इज़रायल के राष्ट्रपति के द्वारा नियुक्त किया जाता है. ज्युडिशियल सलेक्शन कमिटी की सिफ़ारिश पर. सुप्रीम कोर्ट के जजों की रिटायरमेंट की उम्र 70 साल है. पिछले कुछ सालों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद द्वारा पास किए गए कई विवादित और कट्टर बिलों को खारिज किया है. सुप्रीम कोर्ट के पास संवैधानिक आधार पर किसी बिल को अवैध ठहराने का अधिकार है.
इसी वजह से नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को निशाने पर लिया था. 04 जनवरी 2023 को इज़रायल के जस्टिस मिनिस्टर यारिव लेविन ने नया प्रस्ताव पेश किया. इसमें क्या-क्या दर्ज था? इसमें दर्ज था कि,
- अगर सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा पास किसी कानून को संवैधानिक आधार पर अवैध घोषित करती है, तब संसद साधारण बहुमत से सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला पलट सकती है.
इसमें एक अपवाद रहेगा. अगर सुप्रीम कोर्ट के सभी 15 जज एक साथ किसी कानून को अवैध करार दें, तब उस फ़ैसले को संसद नहीं पलट सकती.
- दूसरा प्रस्ताव ज्युडिशियल पैनल के सदस्यों की नियुक्ति से जुड़ा था. नए प्रस्ताव में पैनल के अधिकतर सदस्यों को चुनने की ज़िम्मेदारी सरकार के पास होगी. यानी, सरकार अपने लिए फायदेमंद जजों को सुप्रीम कोर्ट में बिठाने में कामयाब हो जाएगी.
सरकार ये प्रस्ताव उस समय लेकर आई, जब प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर भ्रष्टाचार के दो मामले चल रहे हैं. कहा गया कि अगर ये प्रस्ताव पास हुए तो नेतन्याहू इसका ग़लत फायदा उठा सकते हैं.
हालांकि, सरकार इससे इनकार करती है. इस बदलाव को लेकर जस्टिस मिनिस्टर लेविन ने अपना तर्क रखा. उनका कहना था कि,
‘हम चुनाव लड़ते हैं, वोट करते हैं, चुनते हैं, लेकिन हर बार ऐसे लोग हमारा भविष्य तय करते हैं, जिन्हें हमने नहीं चुना.’
इज़रायल में किसी बिल के कानून बनने में लंबा वक़्त लगता है. इसको लेकर संसद में लंबी बहस चलती है और फिर अलग-अलग कमिटियों में इसकी स्क्रूटनी भी होती है. लेकिन विपक्ष उसका इंतज़ार करने के लिए तैयार नहीं था. विपक्ष के नेता याया लापिड ने कहा कि अगर ये प्रस्ताव पास हुआ तो इज़रायल का लोकतंत्र ध्वस्त हो सकता है. पूर्व रक्षामंत्री बेनी गेंज़ ने आशंका जताई कि देश में सिविल वॉर शुरू हो सकता है. एक पूर्व आर्मी जनरल याया गोलान ने लोगों से इसका विरोध करने की अपील की. इस पर सत्ताधारी गठबंधन के एक सांसद बिदक गए. उन्होंने कहा कि तीनों लोग गद्दार हैं. उन्हें अरेस्ट कर लेना चाहिए. इस वाकये पर न्यू यॉर्क टाइम्स के लिए पैट्रिक किंग्सले ने लिखा, ‘इज़रायल में राजनैतिक बहसें आम तौर पर शांतिपूर्ण होती हैं. लेकिन इस हफ़्ते धुर-दक्षिणपंथी सरकार द्वारा पेश किए गए एजेंडे ने माहौल में तनाव पैदा कर दिया है. इस बदलाव की एक ही वजह है, सरकार की न्यायिक सुधार नीति.’
सरकार के प्रस्ताव पर सिर्फ विपक्ष में नाराज़गी नहीं थी. आम लोग भी इससे बहुत खुश नहीं थे. इसको लेकर कई शहरों में प्रोटेस्ट हुए. तेल अवीव और जेरूसलम में हज़ारों लोग सड़कों पर उतरे. उनका आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक संस्थाओं की हत्या कर रही है. इस बवाल के बीच 18 जनवरी को एक और बड़ा धमाका हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश सुनाया कि, नेतन्याहू कैबिनेट में हेल्थ और इंटीरियर मिनस्ट्री संभाल रहे आरया डेरी नाकाबिल हैं. उन्हें तुरंत पद से बर्खास्त किया जाना चाहिए. 11 जजों की बेंच में से 10 ने डेरी को पद से हटाने के फ़ैसले पर हामी भरी है. डेरी पर टैक्स फ़्रॉड का आरोप था. उन्हें उस मामले में सज़ा भी हुई थी. उस समय डेरी ने कहा था कि वो पब्लिक लाइफ़ से संन्यास ले लेंगे. हालांकि, जैसे ही उनकी पार्टी शेस पार्टी सत्ता में आई, उन्होंने दो-दो मंत्रालय की ज़िम्मेदारी संभाल ली. उनकी नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी. जिसके जवाब में कोर्ट ने उन्हें पद से हटाने के लिए कहा है.
अब आरया डेरी के बारे में जान लीजिए.डेरी का जन्म साल 17 फ़रवरी 1959 को मोरक्को में हुआ था. मोरक्को की हालत उन दिनों कुछ सही नहीं थी. लेकिन डेरी के मां-बाप पैसों से समृद्ध थे. उनका टेलरिंग का अच्छा खासा बिज़निस था. उनका परिवार पारंपरिक यहूदी था, लेकिन रूढ़िवादी नहीं था. पांच साल की उम्र में डेरी को ओज़र हतोराह के लिए चुन लिया गया. ओज़र हतोराह ऐसे स्कूल थे, जिन्हें यहूदी बच्चों के लिए डेवलप किया गया था. यहां रूढ़िवादी यहूदी परिवार के बच्चों को तरजीह दी जाती थी. फिर साल आया 1968 का. उन दिनों इज़रायल और अरब मुल्कों के बीच तनातनी चल रही थी. इसी तनाव के बीच डेरी का परिवार बेत याम में जाकर बस गया. उनकी आगे की पढ़ाई जेरूसलम में हुई. इसी दौरान उनका रुझान कट्टरपंथी राजनीति में होने लगा.

पढ़ाई खत्म होने के बाद वो सामाजिक कामों में जुट गए. इसी को देखते हुए उन्हें वेस्ट बैंक में बसाई गई एक यहूदी बस्ती का सेक्रेटरी बना दिया गया. फिर साल आया 1984 का. इस साल डेरी की राजनीति में एंट्री हुई. उन्होंने ‘शेस’ पार्टी में काम करना शुरू किया. इस पार्टी की शिनाख्त इज़रायल में एक कट्टर दक्षिणपंथी पार्टी की है. यहां डेरी खूब ऐक्टिव रहे.
इसी वजह से उन्हें उस समय के गृहमंत्री यित्हाक पेरेज़ का असिस्टेंट बना दिया गया. अब वो करीब से इज़रायल की राजनीति समझ रहे थे. धीरे-धीरे पार्टी में उनका कद बढ़ने लगा. इसी बीच उन्होंने अनिवार्य मिलिटरी सर्विस भी पूरी कर ली.
डेरी ने 27 साल की उम्र में अपना पहला चुनाव लड़ा. 1988 में उन्हें यित्हाक शमीर की सरकार में गृहमंत्री बनाया गया. उस वक्त उनकी उम्र मात्र 29 साल थी. इस कार्यकाल के दौरान उन्होंने थिएटरों में होने वाली सेंसरशिप को खत्म कर दिया था. लेकिन कुछ साल बाद उनपर घूसखोरी के आरोप लगे. अदालत में केस चला. कहा गया कि उन्होंने डेढ़ लाख डॉलर माने करीब 1 करोड़ 20 लाख की रिश्वत ली. डेरी पर आरोप सिद्ध हुए, उन्हें साल 2000 में 3 साल की जेल हुई. अच्छे व्यवहार के चलते उन्हें 22 महीनों में ही जेल से रिहा कर दिया गया. लेकिन जेल जाने की बदनामी ने डेरी को अंदर से तोड़ दिया था, उन्होंने अपने सामाजिक जीवन से सन्यास ले लिया.
साल 2011 में डेरी ने राजनीती में वापसी की. साल 2013 में वो एक बार फिर से संसद के लिए चुने गए. लेकिन रिश्वतखोरी के चलते पार्टी में उनका दखल कमज़ोर पड़ गया था. पार्टी के लोग उनपर तंज कसते थे. फिर भी उनका रुतबा कायम रहा. 2016 में वो फिर से इज़रायल के गृह मंत्री बने. 2018 में उन्होंने कुछ वक्त के लिए रिलीजियस सर्विस मिनिस्ट्री भी संभाली. 2018 में डेरी एक ऐसा बिल लेकर आए, जो फ़िलिस्तीनियों के लिए नासूर साबिक हुआ.ये बिल इज़रायल सरकार को जेरुस्सलम में बसे किसी भी फिलिस्तीनी परिवार की ज़मीन छीनने का अधिकार देता था. डेरी ने इस बिल को जस्टिफाई करते हुए कहा था कि, जो लोग इजरायली नागरिकों को निशाना बनाते हैं, ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ इस बिल का इस्तेमाल किया जाएगा और उनकी ज़मीनी छीन ली जाएगी.
लेकिन इस कानून का इस्तेमाल कई मासूमों की ज़मीन छीनने के लिए भी किया गया. इस मामले में कई स्वतंत्र रिपोर्ट मौजूद हैं. फिर जनवरी 2022 में एक बार फिर डेरी पर रिश्वत खोरी के आरोप लगे. उन्हें 1 साल के लिए संसद से निलंबित कर दिया गया. इसी मामले में कोर्ट ने जनवरी 2023 में उन्हें पद के अयोग्य ठहरा दिया है. जिसके चलते इज़रायल में बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है.
सबसे बड़ी चुनौती प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए खड़ी हुई है. कैसे?उन्हें ये फ़ैसला ना तो उगलते बन रहा है और ना ही निगलते. डेरी की पार्टी के पास क्नेसेट में 11 सीटें हैं. क्नेसेट, इज़रायल की संसद का नाम है. इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं. सरकार बनाने के लिए 61 सांसदों का साथ ज़रूरी है. नेतन्याहू गठबंधन के पास 64 सीटें हैं. अगर इसमें से डेरी की पार्टी की 11 सीटें हटा दी जाएं तो सरकार फौरन अल्पमत में आ जाएगी. यानी, उनका सरकार चलाना मुश्किल हो जाएगा. शेस पार्टी के कई नेताओं ने इसकी पुष्टि भी की है. उन्होंने कहा है कि अगर डेरी को हटाया गया तो उनकी पार्टी गठबंधन को टाटा कह देगी.
इसी वजह से कोर्ट का फ़ैसला आने के तुरंत बाद नेतन्याहू ने डेरी के साथ मीटिंग की. मीटिंग के बाद उन्होंने कहा, ‘मेरा भाई मुसीबत में है. मैं उससे मिलने आया हूं.’
यानी, इस बात की बहुत कम संभावना लग रही है कि नेतन्याहू, आरया डेरी को बर्खास्त करेंगे. अगर डेरी नहीं हटे तो ये अदालत की अवमानना होगी. इससे सरकार पर तानाशाही रवैया अपनाने का इल्ज़ाम लगेगा.
अब सवाल आता है कि, मौजूदा स्थिति में नेतन्याहू के सामने क्या रास्ते हैं?
तीन रास्ते बताए जा रहे हैं. एक-एक कर समझ लेते हैं.
- नंबर एक. नया कानून पास कर दे. सुप्रीम कोर्ट ने जिस नियम के तहत डेरी को अयोग्य ठहराया है, अगर संसद उस नियम को रद्द करा देती है तो डेरी बच जाएंगे.
- दूसरा रास्ता ये है कि, डेरी की जगह शेस पार्टी के ही किसी दूसरे मेंबर को सेम पोर्टफ़ोलियो दे दिया जाए. ये वाला ऑप्शन डेरी की इच्छा पर निर्भर करता है.
- तीसरा, सत्ताधारी गठबंधन स्पेशल विश्वास प्रस्ताव लाकर फिर से बहुमत साबित करे. और, नई सरकार में डेरी को अल्टरनेटिव प्रधानमंत्री बना दिया जाए. सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री या अल्टरनेट प्रधानमंत्री को अयोग्य नहीं ठहरा सकती है.
फिलहाल के लिए कुछ भी साफ नहीं है. नेतन्याहू के पोलिटिकल कैरियर का सबसे बड़ा संकट अब आया है. वो हर बार उससे निकलने में सफल रहे हैं. इस बार की चुनौती का सामना वो कैसे करते हैं, ये देखना दिलचस्प होगा.
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