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सर्जिकल स्ट्राइक होने से पीएम नवाज शरीफ अंदरखाने खुश हैं!

देशभक्ति का शिगुफा आपकी हर परेशानी को निगल जाता है. फिर सत्ता में खुल्ला मौज करो.

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फोटो - thelallantop

पड़ोसी. उस जीव का नाम है जिसे दूसरे के घर का सब पता होता है. मतलब क्या उसकी कमजोरी है और क्या अच्छाई. ये ही जीव उस घर की हर बात लीक करके सोसाइटी में लोगों का चहीता बन जाता है. बस पता नहीं होता तो ये कि उसके खुद के घर में क्या हो रहा है. अब लोगों को उस शख्स को नीचा दिखाना होता है तो वो भेदी पड़ोसी को तरजीह देते हैं.

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पाकिस्तान में ये पड़ोसी आर्मी चीफ है और जिसके घर की बातें वो जानता है वो वहां का प्रधानमंत्री है. और पता नही होता तो बस ये कि उसकी आर्मी आतंक को सपोर्ट कर रही है. पाकिस्तान में आर्मी चीफ ऐसी दखलअंदाजी करता है कि वहां का प्राइम मिनिस्टर ऐसे डरा सहमा रहता है कि जैसे लड़की के बाप आज के दौर में भी उसकी ससुराल वालों से सहमे रहते हैं कि कहीं बात न बिगड़ जाए. और इस चक्कर में वो नाजायज फायदे उठा ले जाते हैं. मतलब तख्तापलट हो जाता है.
इसी साल जुलाई में इस्लामाबाद, लाहौर, कराची और अन्य बड़े शहरों में आर्मी चीफ राहिल शरीफ के पोस्टर लगाए गए थे. उन पोस्टरों में शरीफ से रिटायर होने की जगह मार्शल लॉ लागू करने की अपील की गई थी. यानी तख्तापलट के अंदेशे जाहिर होने लगे. पनामा पेपर लीक्स में करप्शन के इल्जाम लगने के बाद मीडिया को भी लगना लगा था कि पाकिस्तान में तख्तापलट हो सकता है. पीएम नवाज शरीफ का इस पर यकीन करना कोई मुश्किल नहीं था, क्योंकि एक बार पहले ही वो साल 1999 में तख्तापलट के शिकार हो चुके हैं, जब परवेज मुशर्रफ को लगा कि नवाज शरीफ उन्हें आर्मी चीफ के पद से हटा सकते हैं तो उन्होंने तख्तापलट कर डाला था.
रावलपिंडी में बिजली के पोल पर लगाए गए बैनरों में 60 साल के राहिल शरीफ से 2018 का चुनाव लड़ने की अपील की गई. नौकरी से हटने के दो साल बाद तक सरकारी अफसर पॉलिटिक्स में एंट्री नहीं कर सकते हैं. राहिल शरीफ को छूट देने की बात कही गई. बैनरों के जरिए एक मैसेज देने की कोशिश की गई कि जनरल राहिल शरीफ सरकार और आर्मी के बीच तनाव खत्म कर देंगे. यानी आर्मी और सरकार अच्छे पड़ोसी बन जाएंगे.
इन ख़बरों से नवाज की धड़कनें तेज हो गईं. कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए. राहिल शरीफ को पाकिस्तान में हीरो बनाया जाने लगा. पाकिस्तानी मीडिया भी गुणगान करने लगा था.
शरीफ परिवार की कुल संपत्ति चार हजार करोड़ रुपये है. मीडिया में सुर्खियां रहीं कि नवाज ने गलत तरीके से ये रकम जुटाई थी. पाकिस्तान के कई बड़े शहरों में भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की अवैध प्रॉपर्टी हैं. पनामा पेपर्स लीक में भी नवाज शरीफ और उनकी फैमिली का नाम आया. बस फिर तो चारों तरफ से नवाज शरीफ को घेरा जाने लगा. पीटीआई के चीफ इमरान खान ने रैलियां करनी शुरू कर दीं. इस्तीफे की मांग होने लगी. इन सबसे बचने के लिए वो आर्मी राहिल शरीफ की शरण में आ गए. ताकि राष्ट्रभक्ति वाला कार्ड खेलकर खुद को बचा सकें. राहिल कुछ भी करते नवाज शरीफ उनकी हां में हां मिला देते. इस वजह से कहा जाने लगा कि नवाज पाक आर्मी चीफ राहिल शरीफ की कठपुतली बन गए हैं. इसके पीछे उनका मकसद खुद को राष्ट्रवाद के फेवर में खड़ा करना था.
पाकिस्तानी आर्मी चीफ राहिल शरीफ.
पाकिस्तानी आर्मी चीफ राहिल शरीफ.

राहिल शरीफ ने पाकिस्तानियों को खुश रखने वाले ऐसे काम किए कि लोगों के दिल में जगह बना बैठे. आतंक को पनाह देते रहे. उड़ी अटैक हुआ. और आतंकी पाकिस्तान में घुस गए. पाकिस्तान में कहीं आतंकी हमला हुआ तो राहिल खुद फ़ौरन उस जगह पहुंचे. लोगों को करप्शन से मुक्त होने के हवाब दिखाए. और फिर भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक कर दी. ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक हुई कि उसने राहिल शरीफ के गुब्बारे में छेद कर दिया. हवा निकली. और जो लोगों पर उनका खुमार चढ़ा था. वो एक ही झटके में ख़त्म हो गया. पब्लिक को लगा राहिल शरीफ एक्शन लेंगे. मगर उनकी लीपा पोती ने उनकी इमेज को और धुंधला कर दिया.
डॉन अख़बार के सायरिल अल्मिदा ने एक रिपोर्ट छापी कि इंटरनेशनल लेवल पर अलग थलग पड़ने पर पीएम नवाज शरीफ ने जनरल राहिल शरीफ को आतंक से निपटने की सख्त हिदायत की है. कहा है कि वो आतंकी गुटों से सख्ती से निपटे. आतंक को लेकर पाकिस्तान को बदनामी का सामना करना पड़ रहा है. इसके बाद तो राहिल शरीफ का किला ढह गया. क्योंकि ये रिपोर्ट ये इशारा करने के लिए काफी थी कि वो आतंकी कैंपों को पनाह दे रहे हैं. 
खबर लीक करने के इल्जाम में सरकार ने इनफार्मेशन मिनिस्टर परवेज राशिद को पद से हटा दिया. विपक्ष ने कहा ये कैसे हो सकता कि उसका मंत्री कोई अहम जानकारी पीएम की मर्जी के बिना मीडिया को बताए. ये नवाज शरीफ की साजिश है.
उर्दू मीडिया में ये बात चर्चा में रही कि ये खबर नवाज शरीफ ने खुद जान बूझकर लीक कराई थी ताकि वो अपने रस्ते से राहिल शरीफ को हटा सकें. और अपने ऊपर लगे करप्शन के इल्जाम से लोगों का ध्यान भटका सकें. हुआ भी ऐसा. उनपर सर्जिकल स्ट्राइक काम कर गई. जहां नवाज शरीफ के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे. वहां सारा मूड राष्ट्रभक्ति में बदल गया. लोग पनामा पेपर्स को भूल गए. और ये भी भूल गए कि उन्होंने करोड़ों की मालियत कैसे जमा की है. अब ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक से नवाज कैसे अंदरखाने खुश न हो जिसने कुर्सी को बचाने के लिए जड़ी बूटी का काम किया हो. ये दौर ऐसा चल रहा है जब कुछ काम न आए तो देशभक्ति का कार्ड काम आता है. इसी देश भक्ति के कार्ड से डोनल्ड ट्रंप अमेरिका की सत्ता पर काबिज हो गए. नवाज अपनी कुर्सी बचा ले गए. और बाकी देशों में भी ऐसा ही कुछ चल रहा है. मतलब देशभक्ति के शिगुफे के सामने सब भुला दी जाती हैं. या ये कहिये कि देशभक्ति का शिगुफा आपकी हर परेशानी को निगल जाता है और फिर सत्ता में रहते हुए खुल्ला मौज करो. कोई आह नहीं करेगा.
अब तक तो ये अंदेशे जताए जा रहे थे कि जनरल राहिल शरीफ का टाइम बढ़ाया जा सकता है. लेकिन नवाज शरीफ अपने पैर पर कुल्हाड़ी कैसे मार सकते हैं. वो भी तब जब एक बार तख्तापलट का जायका चख चुके हों. अब राहिल शरीफ की विदाई मुलाकातें शुरू हो गई हैं तो ये तय है कि वो 28 नवंबर को रिटायर हो जाएंगे. उनके इस तरह से जाने पर पाकिस्तानी मीडिया को हैरानी है. क्योंकि जिस तरह से सत्ता संभालने के लिए पोस्टर लगे थे, उससे उम्मीद ही कुछ और थी.

पढ़ लो पाकिस्तानी मीडिया क्या रिएक्शन दे रही है

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून : आर्मी चीफ राहिल की विदाई हैरान करती है
आईएसपीआर के एक ट्वीट से इस बहस पर विराम लग गया. सेना और सरकार में लगातार रस्साकशी की वजह से रिटायरमेंट की खबरें पाक राजनीति का अहम मुद्दा बन गया. ऐसे देश में जहां कई आर्मी चीफ या तो टेन्योर बढ़वाकर लंबे वक्त तक पद पर बने रहते हैं या फिर रातोंरात तख्तापलट कर देते हैं, वहां राहील शरीफ के रिटायरमेंट की बात हैरान करने वाली नहीं है?
द डॉन : दबाव के बावजूद अपना फैसला नहीं बदला
एक के बाद एक ऐसे मौके आए जब सरकार पर जनता ने दबाव बढ़ाया कि वह राहिल शरीफ से पद पर बने रहने का आग्रह करे. पर आखिर में सही चीज कायम रही और एक अच्छे अधिकारी को इस हफ्ते आधिकारिक विदाई दी जा सकेगी.
द नेशन : उनके पास पद पर बने रहने के मौके थे
ये लोगों को चौंका रहा है. उनके पास पद पर बने रहने के कई मौके थे. कई लोग ऐसा कह भी रहे थे. पनामा पेपर्स में नवाज का नाम आने और भारत से तनाव बढ़ने के बाद उनके पास मौका था.
नवाज शरीफ छठी बार तय करेंगे कि कौन आर्मी चीफ होगा. इससे पहले वो 1991 में जनरल असिफ जंजुआ, 1993 में जनरल वहीद काकर, 1998 में जरनल मुशर्रफ, 1999 में जियाउद्दीन बट और 2013 में जनरल राहिल को अप्वाइंट कर चुके हैं.


 

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