सचिन देव वर्मा. उरई के हैं. अरवाइन, कैलीफोर्निया में रहते हैं. जेएनयू से भौतिकी पढ़ गए हैं. और अभी पोस्टडॉक्टोरल स्कॉलर हैं यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया में. तो सचिन कैलीफोर्निया से हमारे लिए वहां के मजेदार किस्से, इतिहास, राजनैतिक हालात लिख भेजेंगे. साथ में हर वो चीज जो आप पढ़ना चाहें. ये उनकी तीसरी किस्त है, जिसमें वो अमेरिकन नेटिव्स का इतिहास बता रहे हैं. ट्रंप के जीतने के बाद तो ये जानना जरूरी भी है. बांचिए.
वो बाहर से आये थे, पानी के रास्ते. आकर बस गए. सिर्फ बसे ही नहीं, फलने फूलने, विकसित होने लगे. और मूल निवासियों का समूल विनाश करने की भरपूर कोशिश करने लगे. इंडियंस की बात कर रहे हैं. भारतीय नहीं, नेटिव अमेरिकन्स. जिनको अमेरिकन इंडियंस या सरल भाषा में इंडियंस भी कहते हैं. यही नाम रखा था परदेसियों ने मूल निवासियों का. सोना, मोती और धन दौलत की खोज में जा रहे थे एशिया के लिए, पहुंच गए बहामास और समझे कि इंडिया है. दुनिया भर में पढ़ाया जाता है कि अमेरिका की खोज कोलंबस ने की थी 1492 में.
य़ूरोपियन पहुंचे अमेरिका बीमारियां लेकर
तथ्यानुसार, जब यूरोपियंस 15वीं शताब्दी में अमेरिका पहुंचे थे तब 50 मिलियन से ज्यादा लोग पहले से ही अमेरिका (नार्थ और साउथ) में रह रहे थे. जो आज का यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका है, 10 मिलियन तो यहीं पर थे. 16वीं शताब्दी के मध्य तक, कैलिफ़ोर्निया क्षेत्र में लगभग 3 लाख लोग थे, किसी और जगह की तुलना में सबसे अधिक. काफी विविधता थी. 100 से ज्यादा भिन्न जनजातियां और 200 से ज्यादा बोलियां थीं. इतनी सारी जनजातियां होने के बावजूद उनका जीवन यापन काफी मिलता-जुलता था. ज्यादा खेतीबाड़ी नहीं करते थे, बल्कि पारिवारिक आधार पर छोटे-छोटे गांव बनाकर हंटर-गैदरर की भांति रहते थे. इसी समय के आस-पास, स्पेनिश खोजकर्ता कैलिफ़ोर्निया क्षेत्र में आये. और जबरन मजदूरी करवाने का, बीमारियां फैलाने का, और मूल निवासियों के समूल विनाश करने का एक बहुत क्रूर समय का प्रारम्भ हुआ.
यूरोपियंस इस महाद्वीप पर बूबोनिक प्लेग, चिकेन पॉक्स, न्यूमोनिक प्लेग, और स्माल पॉक्स इत्यादि-इत्यादि जानलेवा बीमारियां अपने साथ लाये थे. नेटिव अमेरिकन्स के पास इन बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी. और न ही उनकी इलाज करने की पद्धति इन बीमारियों में कारगर थी. कुल मिलाकर, लाखों नेटिव अमेरिकन्स इन बीमारियों के कारण मरे, सबसे ज्यादा मरे स्माल पॉक्स से. स्माल पॉक्स वायरस जब किसी नयी जनसंख्या के संपर्क में आता है तो शुरुआत में बहुत ज्यादा लोग मरते हैं, ख़ासतौर पर बूढ़े और जवान. नेटिव अमेरिकन्स के साथ भी यही हुआ. शुरुआत में बहुत ज्यादा तादाद में बूढ़े और जवान मरे, और उनके साथ मरे धर्मक्रिया करने के तौर तरीके भी.
नेटिव्स को हटाने के लिए कानून भी बनाये गये
1830 में 'इंडियन रिमूवल एक्ट' लागू हुआ. जिसके अन्तर्गत नेटिव अमेरिकन्स को जबरदस्ती स्थानांतरित किया गया. ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि अमेरिकन सेटलर्स, फेडरल सरकार के ऊपर दबाव डाल रहे थे कि नेटिव अमेरिकन्स को दक्षिण-पूर्व से हटाया जाये. कुछ सेटलर्स इंडियन जमीनों का अतिक्रमण कर रहे थे, और बाकी लोगों को गोरे सेटलर्स के लिए ज्यादा जमीन चाहिए थी. 1830 से 1850 के बीच, चिकासॉ, चोकटॉ, क्रीक, सेमीनोल, और चेरोकी के लोगों को दक्षिण-पूर्वी US में अपनी पुश्तैनी जमीन से निकालकर पश्चिम की ओर स्थानांतरित कर दिया गया था. बात ध्यान देने लायक ये है कि ये स्थानांतरण जबरन था और बन्दूक की नोक पे किया गया था. हालांकि, लोगों और मुखियाओं के बीच में मतभेद थे. कुछ लोग खुद जाना चाहते थे ये सोच कर कि कोई दूसरा रास्ता नहीं है क्योंकि वो सरकार से लड़ के जीत नहीं सकते. और कुछ ये सोचते थे कि उनको अपनी मातृभूमि की रक्षा करनी है इसलिए वो नहीं जा सकते. प्रतिरोध होता है तो लड़ाइयां होती ही हैं, काफी लड़ाईयां हुईं. 1837 तक कुल 46,000 इंडियंस को दक्षिण-पूर्वी राज्यों से निकाला गया और तकरीबन 25 मिलियन एकड़ जमीन गोरों के लिए हथियाई गईं. मिसीसिपी के पूर्व का अंतिम जबरन निष्कासन 1838 में हुआ. कुल 16,543 लोग निष्कासित किये गए थे जिनमें से 2,000-6,000 लोग रास्ते में मारे गए थे. ऐसा इसलिए हुआ था क्योंकि दहलोनेगा, जॉर्जिया के पास 1828 में सोना मिला था, और इसी का परिणाम था 'जॉर्जिया गोल्ड रश'. आप समझ ही सकते हैं कि इन सब जबरन निष्कासनों के असल कारण क्या रहे होंगे. इस जबरन निष्कासन के पूरे प्रकरण को 'ट्रेल ऑफ़ टीयर्स' के नाम से याद किया जाता है.
अब उनको रिजर्व जगहों में रहना पड़ता है
वर्तमान में, कुछ नेटिव अमेरिकन्स के वंशज, रेसेर्वेशन्स में रहते हैं. रेसेर्वेशन्स वो क्षेत्र है जिसको खासतौर पर नेटिव अमेरिकन्स के लिए नामित किया गया है. यहां पर वो अपनी विरासत और संस्कृति के अनुसार जीवन यापन करते हैं. हालांकि, कुल जनसंख्या का सिर्फ 30% हिस्सा रेसेर्वेशन्स में रहता है. बाकी के लोग रेसेर्वेशन्स के बाहर हमारे और आपकी तरह रहते हैं. शहरों में रहने वाले नेटिव अमेरिकन्स को बहुत डिस्क्रिमिनेशन्स का सामना करना पड़ता है. अगर आपने कभी डिस्क्रिमिनेशन का सीधा-सीधा अनुभव नहीं किया है तो आपके लिए ये समझना बहुत मुश्किल होगा. वैसे उसकी एक झलक आपको ब्रैड पिट की मूवी 'अ रिवर रन्स थ्रू इट' में दिखेगी. खैर, इंडियन रेसेर्वेशन्स में गैंबलिंग के लिए कैसिनोस और बिंगो हॉल्स काफी तादाद में होते हैं. चूंकि रेसेर्वेशन्स को 'ट्राइबल सोवरेनिटी' का दर्जा प्राप्त होता है इसलिए स्टेट्स गवर्नमेंट के पास 'इंडियन गैंबलिंग रेगुलेटरी एक्ट ऑफ़ 1988' के कारण गैंबलिंग रोकने के अधिकार सीमित हैं. 2011 के अनुसार, कुल 460 गैंबलिंग संचालन 240 जनजातियों द्वारा किये जाते थे और इनका कुल सालाना राजस्व $27 बिलियन था. डोनाल्ड ट्रम्प ने नब्बे के दशक में गुप्त रूप से तकरीबन $1 मिलियन खर्च किये थे ऐसे एड बनवाने के लिए जिनमें अपस्टेट न्यूयॉर्क की एक जनजाति को कोकीन तस्कर और अपराधी दिखाया गया. ऐसा इसलिए किया गया था क्योंकि ट्रम्प के गैंबलिंग साम्राज्य को नेटिव अमेरिकन कैसिनो इंडस्ट्री से खतरा महसूस होने लगा था. 1993 में ट्रम्प ने एक रेडियो इंटरव्यू में कहा था "मुझे लगता है कि मेरे अंदर ज्यादा इंडियन खून हो सकता है ऐसे बहुत से लोगो से ज्यादा जो खुद को तथाकथित इंडियन बोलकर रेसेर्वेशन्स खोलने की कोशिश कर रहे हैं...". ट्रम्प की इस बात का क्या मतलब था ये तो हमको समझ नहीं आया. ट्रम्प कब क्या बोल दें और उसका क्या मतलब हो, ये तो या ट्रम्प जाने या ट्रम्प के समर्थक जानें.