
दिव्य प्रकाश दुबे
संडे वाली चिट्ठी आ गई है. दिव्य प्रकाश दुबे ने लिखी है. अपने नाम और उन तमाम लोगों के नाम, जो अपने हैं. या अपने होने का दिखावा करते हैं. मरना हम सबको है. हमारे मरने के बाद रोने वाले भी तमाम लोग होंगे. क्या उन सब का रोना सही में रोना होगा. या महज एक दिखावा. नहीं मालूम. पर जीते जी कुछ सवाल हमारे भीतर जीते रहते हैं. दिव्य ने उन्हीं सवालों और ख्वाहिशों का गड्डमड्ड कर ये संडे वाली चिट्ठी लिखी है. पढ़िए.
दुनिया के नाम एक चिट्ठी,
जब ये चिट्ठी तुम्हें मिलेगी तब तक शायद मैं न रहूं. कम से कम मैं वैसा तो नहीं रहूंगा जैसा अभी इस वक़्त हूं.
बहुत दिनों से मैं कोई बड़ी उदास चिट्ठी लिखना चाहता था. ऐसी चिट्ठी जिसको लिखने के बाद मुझे सुसाइड नोट की खुशबू आए. ऐसी चिट्ठी जिसमें कोई उम्मीद न हो, कोई ऐसा भरोसा न हो कि कोई बात नहीं एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा. मुझे मालूम है एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन जिस दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा. उस दिन मैं नहीं रहूंगा. आदमी की ‘बिसात’ ही कुछ ऐसी है कि वो उम्मीद नहीं छोड़ता, उम्मीद न होती तो लोग सुसाइड लेटर लिखकर नहीं जाते, धीरे से चुपचाप मर जाते. गुमनाम मर जाना हमारे समय की सबसे बड़ी लग्जरी है.
मैं नहीं चाहता मरने के बाद ट्विटर पर ट्रेंड करना. मैं नहीं चाहता तुम्हारे दो कौड़ी के RIP वाले संदेश. जब तक मैं था तब तक तुम लोग केवल काम से तो मिले. कब तुमने मुझे फोन करके बोला कि नहीं बस ऐसे ही हाल चाल लेने के लिए फोन किया था. मालूम है हाल चाल लेने भर से हाल चाल बदल नहीं जाते लेकिन फ़िर भी.
प्लीज मेरे मरने के बाद ट्विटर या फेसबुक मत रोना यार! कसम से बड़ा चीप लगता है. अगर मरने के बाद कंधा देने आने से पहले सोचना पड़े तो मत आना. उससे ज्यादा आसान है मेरी तस्वीर लगाकर कोई किस्सा सुना देना.हम ‘दिखाने’ के लिए जीने को मजबूर है, दिखावा में चाहे हो कोई कविता हो या कोई तस्वीर. याद करो कोई ऐसी जगह जहां तुम गए हो और तुम्हारे पास वहां की एक भी तस्वीर न हो. एक मिनट के लिए याद करो बिना तस्वीर वाली यादें. जब तुम आज़ादी की बातें करते हो तो मुझे हंसी आती है. तुम ये मान क्यूं नहीं लेते कि तुम कैद हो अपने शरीर में, अपने सरनेम में, अपनी देशभक्ति में, अपनी इबादत में, अपने प्यार में, इस धरती पर, इस आसमान में. तुम्हें चिड़ियां आज़ाद लगती हैं न यार! ध्यान से देखो वो आसमान से बंधी हुई हैं. वो अपनी मर्ज़ी से आसमान छोड़ नहीं सकती.
मुझे मालूम नहीं कि ये चिट्ठी मैं खुद के लिए लिख रहा हूं या तुम्हारे लिए. ज़िंदगी का भी तो ऐसा ही है समझने में टाइम ही लग गया कि मैं अपने लिए जिया या दूसरों के लिए. अपने लिए जीना सुनने में इतना सेल्फिश लगता है कि लोग दूसरों के लिए ही जिए जा रहे हैं.कभी कभी उदासी से बढ़िया नशा कुछ हो ही सकता. तुम मांगते रहो यार दुनिया भर की चीज़ों से आज़ादी, अगर कभी दिला पाना तो मुझे अपनी मर्ज़ी से उदास होने आज़ादी दिला देना.
दुनिया की सारी सांत्वना तुम अपनी ज़ेब में रखो, ‘दिखाने’ के काम आएगी. मैं चला.
दिव्य प्रकाश दुबे
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