मई चल रहा है. मतलब महीना मंटो का. हम आपको हर रोज मंटो से जुड़ा कुछ न कुछ पढ़वा रहे हैं. आज उनकी कहानी पढ़िए. कहानी का नाम है ‘पेशावर से लाहौर तक’ ये कहानी जो है वाणी प्रकाशन से मिली हमें. वाणी प्रकाशन ने मंटो की सारी कहानियां छापी हैं. ये रचना भी हमें उन्होंने ही उपलब्ध कराई है. ‘मैडम डिकॉस्टा’ किताब से ये कहानी- पेशावर से लाहौर तक.
पेशावर से लाहौर तक
वह इंटर क्लास के जनाना डब्बे से निकली. उसके हाथ में छोटा-सा अटैची केस था. जावेद पेशावर से उसे देखता चला आ रहा था. रावलपिंडी के स्टेशन पर गाड़ी काफ़ी देर ठहरी तो वह साथ वाले जनाना डब्बे के पास से कई मरतबा गुज़रा. लड़की हसीन थी. जावेद उसकी मुहब्बत में गिरफ़्तार हो गया.

उसकी नाक की फुनंग पर छोटा-सा तिल था. गालों में नन्हे-नन्हे गड्ढे थे जो उसके चेहरे पर बहुत भले लगते थे. रावलपिंडी स्टेशन पर उस लड़की ने खाना मंगवाया. बड़े इतमिनान से एक-एक निवाला उठा कर अपने मुंह में डालती रही. जावेद दूर खड़ा यह सब देखता रहा. उसका जी चाहता था कि वह भी उसके साथ बैठ जाय और दोनों मिल कर खाना खाएं. वह यक़ीनन उसके पास पहुंच जाता मगर मुसीबत यह थी कि डब्बा जनाना था औरतों से भरा हुआ. यही वजह है कि जुर्अत न कर सका.
लड़की ने खाना खाने के बाद हाथ धोये जो बहुत नाज़ुक थे. लम्बी-लम्बी मख़स्ती उंगलियां, जिनको उसने अच्छी तरह साफ किया और अटैची केस से तौलिया निकाल कर अपने हाथ पोछे. फिर इतमिनान से अपनी सीट पर बैठ गयी. जावेद गाड़ी चलने तक उसकी तरफ देखता रहा. आख़िर अपने डब्बे में सवार हो गया और उसी लड़की के ख़यालों मे ग़र्क़ हो गया. मालूम तो यह होता है कि बड़े अच्छे घराने की है. दोनों कलाइयों में करीब-करीब बारह-बारह सोने की चूड़ियां होंगी. कानों में टाप्स भी थे. दो उंगलियों में अगर मेरा अन्दाज़ा गलत नहीं तो हीरे की अंगूठियां हैं. लिबास बहुत उम्दा. साटन की शलवार टफ़टिया की कमीज शनूत का दोपट्टा.
हैरत है कि घटिया दर्जे में क्यों सफर कर रही है?
पेशावर से आई है. वहां की औरतें तो सख़्त पर्दा करती हैं. लेकिन यह बुर्के के बग़ैर वहां से गाड़ी में सवार हुई. और इसके साथ कोई मर्द भी नहीं. न कोई औरत. अकेली सफर कर रही है आख़िर यह किस्सा क्या है. मेरा ख़याल है, पेशावर की रहने वाली नहीं, वहां किसी अज़ीज़ से मिलने गयी होगी. मगर अकेली क्यों? क्या इसे डर नहीं लगा कि उठा कर ले जायेगा कोई-ऐसे तन्हा पर तो हर मर्द झपट्टा मारना चाहता है.
फिर जावेद को एक अन्देशा हुआ-कि शादी शुदा तो नहीं? वह दरअसल दिल में तहय्या कर चुका था कि उस लड़की का पीछा करेगा और रोमान लगकर उससे शादी कर लेगा. वह हरामकारी का बिलकुल क़ायल नहीं था. कई स्टेशन आये और गुज़र गए. उसे सिर्फ़ रावलपिंडी तक जाना था कि वहां ही उसका घर था, मगर वह बहुत आगे निकल गया. एक स्टेशन पर चेकिंग हुई, जिसके बायस उसे जुर्माना अदा करना पड़ा मगर उसने इसकी कोई परवाह न की.
टिकट चेकर ने पूछा, 'आपको कहां तक जाना है.'
जावेद मुस्कुराया, 'जी अभी तक मालूम नहीं. आप लाहौर का टिकट बना दीजिए कि वही आख़री स्टेशन है.' टिकट चेकर ने उसे लाहौर का टिकट बना दिया. रुपये वसूल किए और दूसरे स्टेशन पर उतर गया. जावेद भी उतरा कि ट्रेन को टाइमटेबुल के मुताबिक पांच मिनट ठहराना था. साथ वाले कम्पार्टमेंट के पास गया. वह लड़की खिड़की के साथ लगी दांतों से खेला कर रही थी. जावेद की तरफ जब उसने देखा तो उसके दिल व दिमाग में च्यूंटियां दौड़ने लगीं. उसने महसूस किया कि वह उसकी मौजूदगी से ग़ाफ़िल नहीं है। समझ गयी है कि वह बार-बार सिर्फ़ उसे ही देखने आता है. जावेद को देख कर वह मुस्कुराई. उसका दिल बाग़-बाग़ हो गया. लेकिन जावेद फर्ते जजबात की वजह से फ़ौरन वहां से हट कर अपने डब्बे में चला गया और रोमानों की दुनिया की सैर करने लगा-उसको ऐसा महसूस होता था कि उसके आस-पास की तमाम चीज़े मुस्कुरा रही हैं. ट्रेन का पंखा मुसकुरा रहा है. खिड़की से बाहर तार के खम्बे मुस्कुरा रहे हैं. इंजन की सीटी मुस्कुरा रही है और वह बदसूरत मुसाफिर जो उसके साथ बैठा था, उसके मोटे-मोटे होंठों पर भी मुस्कुराहट है. उसके अपने होंठो पर मुस्कुराहट नहीं थी लेकिन उसका दिल मुसकुरा रहा था. अगले स्टेशन पर जब वह साथ वाले कम्पार्टमेंट के पास गया तो वह लड़की वहां नहीं थी. उसका दिल धक से रह गया. कहां चली गयी? कहीं पिछले स्टेशन पर तो नहीं उतर गयी, जहां उसने एक मुस्कुराहट से मुझे नवाज़ा था? नहीं-नहीं गुसलख़ाने में होगी. वह वाकई गुसलख़ाने ही में थी. एक मिनट के बाद वह खिड़की में नमूदार हुई. जावेद को देख कर मुस्कुराई और हाथ के इशारे से उसको बुलाया. जावेद कांपता लरज़ता खिड़की के पास पहुंचा. उस लड़की ने बड़ी महीने और सुरीली आवाज में कहा, एक तकलीफ देना चाहती हूं आपको. मुझे दो सेब ला दीजिए. यह कह कर उसने अपना पर्स निकाला और एक रुपये का नोट जावेद की तरफ बढ़ा दिया.
जावेद ने इस ग़ैर मुतवक्के बुलावे से क़रीब-करीब बर्क जदह था. एक रुपये का नोट पकड़ लिया लेकिन फ़ौरन उसके होश हवास बरकरार हो गए. नोट वापस देकर उसने लड़की से कहा, 'आप यह रखिए मैं सेब ले आता हू.' और वह पलट कर प्लेटफ़ार्म पर उस रेढ़ी की तरफ दौड़ा जिसमें फल बेचे जाते थे. उसने जल्दी-जल्दी छह सेब ख़रीदे, क्योंकि विसिल हो चुकी थी.
दौड़ा-दौड़ा वह उस लड़की के पास आया. उसको सेब दिये और कहा- माफ कीजिएगा. विसिल हो रही थी इसलिए मैं अच्छे सेब चुन न सका.
लड़की मुस्कुराई. वही दिलफरेब मुसकुराहट. गाड़ी हरकत में आयी जावेद अपने कम्पार्टमेंट में दाख़िल होते गो कांप रहा था लेकिन बहुत खुश था उसको ऐसा महसूस हो रहा था कि उसको दोनों जहान मिल गये हैं. उसने अपनी जिन्दगी में कभी किसी से मुहब्बत नहीं की थी, लेकिन अब वह इसकी लज़्ज़त से लुत्फ़ अन्दोज हो रहा था. उसकी उम्र पच्चीस बरस के करीब थी. उसने सोचा कि इतनी देर मैं कितना ख़ुश्क रहा हूं. आज मालूम हुआ कि मुहब्बत इंसान को कितना तरोताज़ह बना देती है. वह सेब खा रही होगी-लेकिन उसके गाल तो ख़ुद सेब हैं. मैंने जो सेब उसको दिये हैं क्या वह उनको देख कर शर्मिन्दा नहीं होंगे. वह मेरी मुहब्बत के इशारों को समझ गयी है जभी तो वह मुसकराई और उसने मुझे हाथ के इशारे से बुलाया और कहा कि मैं उस सेब ला दूं. मुझसे अगर वह कहती कि गाड़ी का रुख पलट दूं तो मैं खुदा की कसम उसकी ख़ातिर यह भी कर देता. गो मुझमें इतनी ताकत नहीं. लेकिन मुहब्बत में आदमी बहुत बड़े-बड़े काम सरअंजाम दे सकता है-फ़रहाद ने शीरी के लिए पहाड़ काट कर क्या नहर नहीं खोदी थी? मैं भी कितना बेवकूफ हूं उससे और कुछ नहीं तो कम अज़ कम यही पूछ लिया होता कि तुम्हें कहां तक जाना है. और मैं लाहौर तक का टिकट तो बन चुका हूं. हर स्टेशन पर देख लिया करूंगा. वैसे वह जब मुझे बिना बताए जायेगी भी नहीं. शरीफ ख़ानदान की लड़की है. मेरे जजबऐ-मुहब्बत ने उसे काफ़ी मुतास्सिर किया है-सेब खा रही है, काश कि मैं उसके पास बैठा होता. हम दोनों एक सेब को बयकवक़्त अपने दांतों से काटते. उसका मुंह मेरे मुंह से कितना करीब होता.
मैं उसके घर का पता लूंगा. जरा और बातें कर लूं. फिर रावलपिंडी पहुंच कर अम्मी से कहूंगा कि मैंने एक लड़की देख ली है. उससे मेरी शादी कर दीजिए. वह मेरी बात कभी नहीं टालेंगी. बस एक दो महीने के अन्दर-अन्दर शादी हो जायेगी. अगले स्टेशन पर जावेद उसे देखने लगा तो वह पानी पी रही थी. वह र्जुअत करके आगे बढ़ा और उससे मुख़ातिब हुआ, आपको किसी और चीज की ज़रूरत हो तो फरमाइए.
लड़की मुस्कुराई वही दिलफरेब मुस्कुराहट, मुझे सिगरेट ला दीजिए.
जावेद ने बड़ी हैरत से पूछा, 'आप सिगरेट पीती हैं?
वह लड़की फिर मुसकुराई, 'जी नहीं-यहां एक औरत है, पर्दादार, उसको सिगरेट पीने की आदत है.
ओह! मै अभी लाया. किस ब्रांड के सिगरेट हो?
मेरा ख़याल है वह गोल्डफ्लैक पीती है
मैं अभी हाज़िर किए देता हूं. यह कह कर जावेद स्टाल की तरफ दौड़ा. वहा से उसने दो पैकेट लिए और उसे लड़की के हवाले कर दिया. उसने शुक्रिया उस औरत की तरफ़ से अदा किया जो सिगरेट पीने की आदी थी. जावेद अब और भी ख़ुश था कि उस लड़की से एक और मुलाक़ात हो गयी मगर इस बात की बड़ी उलझन थी कि वह उसका नाम नहीं जानता था उसने कई मरतबा ख़ुद को कोसा कि उसने नाम क्यों न पूछा. इतनी बातें होती रहीं, लेकिन वह उससे इतना भी न कह सका- आप का नाम? उसने इरादा कर लिया कि अगले स्टेशन पर जब गाड़ी ठहरेगी तो वह उससे नाम ज़रूर पूछेगा. उसे यक़ीन था कि वह फ़ौरन बता देगी क्योंकि इसमें कबाहत ही क्या थी. अगला स्टेशन बहुत देर के बाद आया, इसलिए कि फ़ासला बहुत लम्बा था. जावेद को बड़ी कोफ़्त हो रही थी. उसने कई मरतबा टाइमटेबुल देखा. घड़ी बार-बार देखी. उसका जी चाहता था कि इंजन को पर लग जायें ताकि वह उड़कर जल्दी अगले स्टेशन पहुंच जाय.
गाड़ी एकदम रुक गयी. मालूम हुआ कि इंजन के साथ एक भैंस टकरा गयी है. वह अपने कम्पार्टमेंट से उतर कर साथ वाले डब्बे के पास पहुंचा. मगर लड़की अपनी सीट पर मौजूद नहीं थी.
मुसाफिरों ने मरी कटी हुई भैंस को पटरी से हटाने में काफ़ी देर लगा दी. इतने में वह लड़की जो ग़ालिबन दूसरी तरफ तमाशा देखने मे मशग़ूल थी, आयी और अपनी सीट पर बैठ गयी. जावेद पर जब उसकी नजर पड़ी तो मुसकुराई. वही दिलफरेब मुसकुराहट.
जावेद खिड़की के पास गया, मगर उसका नाम पूछ न सका.
लड़की ने उससे कहा, यह भैंसे क्यों गाड़ी के नीचे आ जाती हैं. जावेद को कोई जवाब न सूझा गाड़ी चलने वाली थी, इसलिए वह अपने कम्पार्टमेंट में चला गया. कई स्टेशन आए. मगर वह न उतरा, आख़िर लाहौर आ गया. प्लेटफार्म पर जब गाड़ी रुकी तो वह जल्दी-जल्दी बाहर निकला. लड़की मौजूद थी. जावेद ने अपना सामान निकलवाया और उससे जिसने हाथ में अटैची कैस पकड़ा हुआ था कहा, लाइए यह अटैची केस मुझे दे दीजिए.
उस लड़की ने अटैची केस जावेद के हवाले कर दिया. कुली ने जावेद का सामान उठाया और दोनों बाहर निकले. तांगा लिया. जावेद ने उससे पूछा आपको जाना कहां है?
लड़की ने बड़े नर्म व नाज़ुक लहज़े में जवाब दिया, 'जी रावी रोड'
चलिए मैं आपको वहां छोड़ आता हूं.
बहुत बहुत शुक्रिया.
तांगा रावी रोड से गुजर रहा था. जावेद ने उस लड़की से पूछा, 'कहां जाइएगा अब आप?
लड़की के होंठों पर वही दिलफ़रेब मुस्कुराहट पैदा हुई, जी हीरा मंडी.
जावेद बौखला सा गया, क्या आप वहां रहती हैं.
लड़की ने बड़ी सादगी से जवाब दिया, जी हां मेरा मकान देख लें. आज रात मेरा मुजरा सुनने जरूर आइएगा. जावेद पेशावर से लाहौर तक अपना मुजरा सुन चुका था. उसने उस तवायफ को उसके घर छोड़ा और उसी तांगे में सीधा लारियों के अड्डे पर पहुंचा और रावलपिंडी रवाना हो गया.
कल आपने मंटो वाला महीना में कहानी पढ़ी- वह लड़की