
ये लेख हमारे एक पाठक अखिल पराशर ने भेजा है. अखिल पेइचिंग स्थित 'चाइना रेडियो इंटरनेशनल' में पत्रकार हैं.
भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का सम्मान पूरी दुनिया करती है. वो सबके भले के लिए काम करते थे. उनके किए में आपको उनका सिद्धांतों की छाप दिखेगी. गांधी दुनिया के कई देशों में गए, लेकिन वे कभी चीन नहीं गए. जाना तो चाहते थे, लेकिन उन दिनों चीन के जैसे हालात थे, उसने गांधी को वहां जाने से रोक दिया. गांधी भले चीन न गए हों, लेकिन वहां उनकी काफी इज्जत है.
चीन में गांधी को काफी पढ़ा जाता है चीन के युवा चीनी भाषा में उपलब्ध गांधी साहित्य में काफी दिलचस्पी लेते हैं. उन्होंने न केवल गांधी के बारे में पढ़ा है, बल्कि खुद गांधी को भी पढ़ा है. इसी वजह से वो गांधी के प्रति काफी श्रद्धा रखते हैं. चीन में गांधी के ऊपर सैकड़ों किताबें लिखी गई हैं. चीनी क्रांति से पहले के 20 सालों में गांधी की आत्मकथा, उनके विचार और कामों से जुड़ी लगभग 30 तरह की किताबें चीनी भाषा में छपी और पढ़ी गईं. इनमें चार तरह की किताबें तो सिर्फ गांधी की आत्मकथा की थीं. इनके अलावा गांधी की प्रतिनिधि रचना, जैसे 'भारतीय स्वायत्त' वगैरह का भी चीनी भाषा में अनुवाद हुआ. चीन की एक जानी-मानी मैगजीन 'पूर्वी पत्रिका' में गांधी और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े अलग-अलग विषयों पर लगभग 70 लेख प्रकाशित हुए. चीन में गांधी और गांधीवाद को पढ़ने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है. उनके जीने के तरीके से भी लोग काफी प्रभावित हैं वहां.

प्रधानमंत्री मोदी जब बतौर PM पहली बार चीन गए, तब उन्होंने वहां एक गांधी अध्ययन केंद्र का उद्घाटन किया (फोटो: अखिल पराशर)
गांधी पर पढ़ाई-लिखाई के लिए स्पेशल सेंटर भी शुरू हुआ चीन की सभी इतिहास की किताबों में गांधी पढ़ाए जाते हैं. शंघाई को चीन की आर्थिक राजधानी माना जाता है. यहां के फुतान विश्वविद्यालय ने भारत सरकार को लिखा था कि वो उनके साथ मिलकर अपने यहां एक गांधी अध्ययन केंद्र खोलना चाहते हैं. ताकि उनके छात्रों को गांधी और भारत के बारे में और अधिक जानकारी मिल सके. 2015 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के दौरे पर गए, तो उन्होंने फुतान विश्वविद्यालय में गांधी अध्ययन केंद्र का उद्घाटन किया. ये पहला मौका था, जब चीन में गांधी अध्ययन को समर्पित एक केंद्र शुरू किया गया था.
जैसे रूस में टॉल्सटॉय थे, वैसे ही भारत में गांधी गांधी के 'असहयोग आंदोलन' पर भी चीन की जनता ने काफी ध्यान दिया. मसलन, 1920-1924 से पहले असहयोग आंदलन के दौरान ‘पूर्वी पत्रिका’ में 20 लेख छपे. इनमें से ज्यादातर लेखों में गांधी और गांधीवाद की तारीफ थी. गांधी को भारत के विचार-जगत के नेता, महान क्रांतिकारी और समाज सुधारक के तौर पर पेश किया जाता था. सत्य और अहिंसा के पर यकीन रखने वाले गांधी चीनी जनता की नजरों में भारत के टॉलस्टॉय थे.

जब चीन के लोगों ने जापान के साम्राज्यवाद के खिलाफ विरोध शुरू किया, तो गांधी ने उनके संघर्ष को समर्थन दिया. चीन के लोग आज भी ये नहीं भूले हैं (फोटो: अखिल पराशर)
गांधी की अहिंसा चीन के लिए नया दर्शन थी गांधी के अहिंसक आंदोलनों ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम को एक अलग दिशा दी थी. चीनी विद्वानों के लिए ये एक नया दर्शन था. गांधी का मानवतावादी नजरिया बस भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए था. भारत के अलावा एशिया के कई और देशों पर भी गांधी का असर पड़ा. अफ्रीका, लैटिन अमेरिका ने भी गांधी के अनुभवों से काफी कुछ सीखा.
गांधी की ये बात चीनियों को अब भी याद है राजधानी पेइचिंग में एक छाओयांग नाम का पार्क है. इसके अंदर गांधी की मूर्ति लगी है, जो चीन में गांधी की इकलौती मूर्ति है. यहां गांधी के साथ कार्ल मार्क्स, इग्नेसी जान पेडेरेव्स्की और ह्रिस्टो बोटेव जैसी शख़्सियतों के स्टैचू भी हैं. 1920 के आसपास जब गांधी का प्रभाव भारत के कोने-कोने में फैल रहा था, तब चीन में भी कई लोग उनसे प्रेरणा ले रहे थे. सत्याग्रह और अहिंसा के रास्ते पर चलने से उनके देश का भला होगा कि नहीं, ये सवाल उनके भी मन में था. उन दिनों भारत में अंग्रेजों का राज था. चीन में ब्रिटेन के साथ-साथ अमेरिका और फ्रांस जैसे बड़े देशों का जोर था. इसके साथ ही चीन में अलग-अलग गुटों में छिड़ी लड़ाई के कारण गृह युद्ध जैसी स्थिति बन गई थी. ये शायद चीन का सबसे मुश्किल दौर था. जब चीनी जनता ने जापान के साम्राज्यवाद का विरोध किया, तो गांधी ने सैद्धान्तिक और नैतिक तौर पर उनका समर्थन किया था. चीन की जनता उस बात को आज भी नहीं भूली है. वो आज भी गांधी का आभार मानती है. भारत और चीन के आपसी रिश्ते काफी पुराने हैं. दोनों देश चाहें, तो वो अपनी दोस्ती मजबूत करने के लिए गांधी की विचारधारा का इस्तेमाल कर सकते हैं. ये दोनों मुल्क अगर दोस्त हो जाएं, तो दुनिया के लिए कुछ बेहतर ही करेंगे.
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