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ये हैं नरेंद्र मोदी के 6 सेनापति जिन पर 2019 की हार-जीत टिकी हुई है

बीजेपी के ये नेता पर्दे के पीछे के खेल में माहिर माने जाते हैं.

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फोटो - thelallantop
लोकसभा चुनाव 2019 में अब कुछ ही सप्ताह का समय रह गया है. सत्ताधारी पार्टी बीजेपी इतिहास में अपने शीर्ष पर है. केंद्र में पूर्ण बहुमत के अलावा 16 राज्यों में बीजेपी गठबंधन की सरकार हैं. पहली बार उत्तर-पूर्व के मोर्चे पर बीजेपी का झंडा लहरा रहा है. बंगाल और ओडिशा में बीजेपी की उपस्थिति को नजरंदाज किया जाना मुश्किल हो गया है. ठीक उसी समय बीजेपी उत्तर प्रदेश और बिहार में बुरी तरह घिरी हुई है. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन की वजह से बीजेपी के माथे पर शिकन है. बिहार में विपक्ष के संयुक्त मोर्चे की वजह बीजेपी को मुश्किल झेलनी पड़ रही है. आने वाले चुनाव में नरेंद्र मोदी बीजेपी के चहरे के तौर पर मैदान में उतरेंगे. लेकिन चुनाव सिर्फ चहरे से नहीं लड़े जाते. चुनाव मैनेजमेंट वो मोर्चा है जहां से असल में चुनाव के नतीजे तय होते हैं. हम आपको बीजेपी के उन सिपहसालारों के बारे में बताने जा रहे हैं जिन पर बैकरूम ऑपरेशन संभालने का दारोमदार रहेगा.
1. प्रकाश जावड़ेकर
प्रकाश जावड़ेकर ने सियासत का इमला प्रमोद महाजन की सरपरस्ती में सीखा था. किसी दौर में उन्हें महाजन का दाहिना हाथ कहा जाता था. प्रकाश जावड़ेकर के पास बैकरूम संभालने का लंबा अनुभव है. हाल ही में शिवसेना और बीजेपी में गठबंधन फिर से कायम करवाने में जावड़ेकर की अहम भूमिका रही है. बीजेपी की तरफ से पिछले साल जून से शुरू हो गए थे. लेकिन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस से बात करने के लिए तैयार नहीं थे. ऐसे में उद्धव को मनाने का काम प्रकाश जावड़ेकर को सौंपा गया. जावड़ेकर की शिवसेना की नब्ज पर बेहतर पकड़ है. प्रमोद महाजन के साथ काम करते हुए वो एक से ज्यादा बार शिवसेना के साथ संतुलन साधने का काम कर चुके हैं. तीन महीने पहले उन्होंने उद्धव के विश्वस्त माने जाने वाले सुभाष देसाई के साथ पांच बार मीटिंग की. इसके बाद वो खुद उद्धव से मिलने उनके मुंबई स्थित घर मातोश्री गए. शिवसेना और बीजेपी की महायुति का मुस्तकबिल इसी मुलाकात से तय हुआ.
प्रकाश जावड़ेकर को किसी दौर में प्रमोद महाजन का दाहिना हाथ कहा जाता था. उस दौर में शिवसेना के साथ बने संबंध आज उनकी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं.
प्रकाश जावड़ेकर को किसी दौर में प्रमोद महाजन का दाहिना हाथ कहा जाता था. उस दौर में शिवसेना के साथ बने संबंध आज उनकी पार्टी के लिए फायदेमंद साबित हो रहे हैं.

जावड़ेकर के पास फिलहाल राजस्थान और कर्नाटक का प्रभार है. इन दोनों राज्यों में हाल ही हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी हार का सामना करना पड़ा है. कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी सूबे में सरकार नहीं बना पाई. इसे जावड़ेकर की बड़ी नाकामयाबी के तौर पर देखा गया. लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कई राज्यों में अपने प्रभारी बदले. दोनों राज्यों में कमजोर प्रदर्शन के बावजूद जावड़ेकर से प्रभार नहीं छीना गया. कर्नाटक और राजस्थान बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान की सभी 25 सीटें बीजेपी के खाते में गई थीं. कर्नाटक की 28 में से 17 सीटें बीजेपी के खाते में गई थी. दोनों ही राज्यों में बीजेपी सत्ता से बाहर है. कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस का गठबंधन बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है. राजस्थान में उन्हें अशोक गहलोत जैसे कुशल रणनीतिकार की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा.
2.पीयूष गोयल
पीयूष गोयल फिलहाल केंद्र सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. उनके पास तमिलनाडु का प्रभार है. हाल ही में हुए AIADMK और बीजेपी गठबंधन में पीयूष गोयल की अहम भूमिका रही है.  तमिलनाडु में बीजेपी की उपस्थिति ना के बराबर है. पिछले लोकसभा चुनाव में तमिलनाडु की 39 में से महज 1 सीट बीजेपी के खाते में गई थी. 2014 में यहां के दोनों ही बड़े दलों ने बीजेपी से गठबंधन करने से इनकार कर दिया था. इस बार पीयूष गोयल सूबे की सत्ताधारी पार्टी AIADMK को बीजेपी के गोल में लाने में कामयाब रहे हैं.
पीयूष गोयल ने भाषा की बाधा को पार करके दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए राह बनाने का काम किया है.
पीयूष गोयल ने भाषा की बाधा को पार करके दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए राह बनाने का काम किया है.

AIADMK को साधने के लिए गोयल को काफी पसीना बहाना पड़ा है. इससे पहले उनका तमिल राजनीति से सीधा साबका नहीं था. ऊपर से भाषा संवाद में बड़ी बाधा बनी हुई थी.ऐसी स्थिति में तमिलनाडु से आने वाले केन्द्रीय मंत्री पोन राधाकृष्णन उनके बहुत काम आए. पीयूष गोयल पलानीस्वामी और पन्नीरसेल्वम को यह समझाने में कामयाब रहे कि DMK के कांग्रेस के साथ जाने के बाद उनके पास कोई खास विकल्प बचे नहीं थे. इसके अलावा अगर 2021 में होने वाले विधानसभा चुनाव जीतने के लिए AIADMK को लोक-लुभावन योजनाओं की घोषणा भी करनी पड़ेगी. पीयूष गोयल ने पलानीस्वामी को भरोसा दिलाया कि अगर केंद्र में बीजेपी की सरकार आती है तो वो तमिलनाडु सरकार को जरुरी बजट सहयोग देगी. पीयूष गोयल का यह दांव काम कर गया.
3.हेमंत बिस्व सरमा
पिछले पांच साल में बीजेपी ने उत्तर पूर्व के सात में से सात राज्यों में बीजेपी गठबंधन की सरकार चल रही हैं. बीजेपी की इस जीत के पीछे हेमंत बिस्व सरमा का बहुत बड़ा हाथ है. हेमंत बिस्व सरमा उत्तर पूर्व में बीजेपी के संकटमोचक हैं. वो फिलहाल नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलाइंस के संयोजक हैं. हाल ही में आए नागरिकता (संसोधन) विधेयक 2016 के चलते बीजेपी को उत्तर पूर्व में काफी विरोध का सामना करना पड़ रहा है.हेमंत बिस्व सरमा ने इस गाढे समय में भी बीजेपी गठबंधन में दरार कोई बड़ी दरार नहीं आने दी.
हेमंत बिस्वा सरमा की बदौलत उत्तर-पूर्व के मोर्चे पर भगवा झंडा लहरा रहा है.
हेमंत बिस्वा सरमा की बदौलत उत्तर-पूर्व के मोर्चे पर भगवा झंडा लहरा रहा है.

नार्थ ईस्ट से कुल 25 सांसद आते हैं. बीजेपी ने यहां से 21 सांसद जीतने का लक्ष्य रखा है. सरमा यहां बीजेपी के लिए तुरुप का पत्ता साबित हुए हैं. उनके सभी पार्टियों में दोस्त हैं. कांग्रेस से बगावत करके बीजेपी में आए सरमा के साथ कांग्रेस के कई नेताओं से आज भी अच्छे संबंध हैं. हेमंत बिस्व सरमा और राम माधव फिलहाल गठबंधन से छिटकी असम गण परिषद को फिर से एनडीए के पाले में लाने की कोशिश कर रहे हैं.
4.सुनील बंसल
सुनील बंसल अमित शाह के भरोसेमंद सेनापति हैं. बंसल के पास फिलहाल सबसे बड़े और सबसे नाजुक सूबे उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी है. वो सूबे में बीजेपी के संगठन प्रमुख हैं. संघ के कोटे से बीजेपी में आने वाले बंसल संगठन के काम में माहिर माने जाते हैं. फिलहाल वो सभी 80 सीटों पर जिताऊ उम्मीदवारों की सूची बनाने में व्यस्त हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इस बार सपा-बसपा गठबंधन की वजह से बीजेपी को कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.
सुनील बंसल
सुनील बंसल देश के सबसे बड़े और बीजेपी के लिए सबसे नाजुक सूबे उत्तर प्रदेश को संभल रहे हैं.

एक तरफ सुनील बंसल सूबे में संगठन को चाक-चौबंद कर रहे हैं. दूसरी तरफ अरुण जेटली सपा-बसपा गठबंधन में फूट डालने की कोशिश में लगे हुए हैं. कहा जा रहा है कि जेटली ने इस बीच बसपा में नंबर दो की हैसियत रखने वाले सतीश मिश्रा के साथ संपर्क में हैं. जेटली की कोशिश है कि वो मिश्रा के जरिए मायावती को गठबंधन तोड़ने के लिए मना पाए. अगर सूत्रों की माने तो जेटली को अपने मिशन में आधी कामयाबी हासिल भी हो गई है. कांग्रेस के एक सूत्र का कहना है कि मायावती ने जेटली के दबाव और सीबीआई जांच के डर से कांग्रेस के साथ गठबंधन करने से इनकार कर दिया. 5.राम माधव
राम माधव के पास उत्तर पूर्व के अलावा तेलगुभाषी दो राज्यों की जिम्मेदारी भी है. माधव खुद आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं. वेंकैया नायडू के जाने के बाद पार्टी के पास आंध्र-तेलंगाना को संभलाने के लिए भरोसेमंद सेनापति की कमी खल रही थी. उनके अलावा त्रिपुरा में बीजेपी की जीत के हीरो रहे सुनील देवधर को भी आंध्रप्रदेश भेजा गया है. दोनों लोग उत्तर-पूर्व में साथ-साथ काम कर चुके हैं. 2014 में आंध्र प्रदेश में बीजेपी के पास तेलगुदेशम जैसी ताकतवर पार्टी का साथ था. लेकिन आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग पर तेलगुदेशम बीजेपी गठबंधन से छिटक चुकी है. तेलंगाना में भी के. चंद्रशेखर राव की पार्टी टीआरएस ने बीजेपी के साथ गठबंधन के कोई संकेत नहीं दिए हैं.
त्रिपुरा चुनाव में जीत का जश्न मनाते हुए बिप्लव देब और राम माधव
त्रिपुरा चुनाव में जीत का जश्न मनाते हुए बिप्लव देब और राम माधव

राम माधव के आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी से संपर्क बनाए हुए हैं. टीडीपी के कांग्रेस के साथ जाने के बाद जगन के पास राष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप के लिए सीमित विकल्प बचे हैं. राम माधव की कोशिश है कि चुनाव से पहले ना सही लेकिन चुनाव के बाद जगन बीजेपी को समर्थन देने के लिए तैयार हो जाएं. तेलंगाना में भी लगभग यही हालात थे. के. चंद्रशेखर राव ने चुनाव से पहले अपने पत्ते खोलने से इंकार कर दिया है.
6.मुकुल रॉय
कभी ममता बनर्जी का दाहिना हाथ रहे और शारदा चिटफंड घोटाले में घिरे मुकुल रॉय फिलहाल बंगाल में बीजेपी की कमान संभाल रहे हैं. रॉय सूबे में तृणमूल कांग्रेस के संगठन को खड़ा करने वाले आदमी हैं. बीजेपी ने पिछले चार साल में बंगाल में तेजी से अपना आधार बढ़ाया है. सूबे में कुल 42 लोकसभा सीट हैं. यहां परम्परागत तौर पर मुकाबला मकपा और तृणमूल के बीच रहता आया है. इस चुनाव में बीजेपी तीसरी ताकत के तौर पर उभर रही है. पार्टी ने यहां 23 लोकसभा सीट जीतने का लक्ष्य रखा है. आने वाले चुनाव में बीजेपी पश्चिम बंगाल से काफी उम्मीद बांधकर बैठी हुई है और इन उम्मीदों का भार मुकुल रॉय के कंधों पर है.


सांसद ने अपनी ही पार्टी के विधायक को धुन दिया

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