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यूनिफॉर्म सिविल कोड: क्या ये मुसलमानों को हिंदू बनाने की साजिश है?

लेकिन UP चुनावों से पहले ही BJP को क्यों याद आया ये मुद्दा?

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Symbolic Image. Source: Reuters

अगर एक मुसलमान लड़की किसी क्रिश्चियन लड़के से हिन्दू धर्म के रिवाजों से शादी करे तो क्या होगा?

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कौन से कानून के तहत शादी 'कानूनी' मानी जाएगी?

अब, अगर एक हिन्दू लड़का किसी मुसलमान लड़के से जैन धर्म के रिवाजों से शादी करे तो क्या होगा?

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अगर एक हिन्दू लड़की किसी मुसलमान लड़के से जैन धर्म के रिवाजों से शादी करे तो क्या होगा?

कन्फ्यूज? अगर इन तीनों केस में एक-दो साल बाद कपल साथ नहीं रहना चाहे तो क्या होगा? तलाक? कहां होगा? कैसे होगा? या मार-कुटाई? गला रेतकर हत्या? 'उक्त युवक बेवफाई कर रहा था. बीती रात दीवाल टाप के घर में घुसा और आरी से नाक-कान काट दिया.'

एक खबर आई है. केंद्र सरकार के लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने लॉ कमीशन के पास 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' लागू करने से जुड़े पेचों के बारे में पूछा है. बवाल हो गया है.

लगे हाथ ये भी जान लें कि 'लॉ कमीशन' कोई कोर्ट नहीं है. बल्कि लॉ मिनिस्ट्री ही बनाती है कमीशन को. इसका काम है पुराने कानूनों में सुधार की गुंजाइश देखना और नए कानूनों की सिफारिश करना.

है क्या चीज ये 'यूनिफॉर्म सिविल कोड'?

भारत के संविधान के आर्टिकल 44 में दिया हुआ है:

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भारत सरकार सबके लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का पूरा प्रयास करेगी.

अब ऐसा क्यों हैं कि सरकार लागू नहीं कर पा रही? और जब लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने लॉ कमीशन के पास 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' लागू करने से जुड़ी दिक्कतों के बारे में पूछा है तो बवाल क्यों मचा हुआ है?

आर्टिकल 44 'डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स ऑफ़ स्टेट पालिसी' में आता है. मतलब इसको लागू करने के लिए आप कोर्ट में नहीं जा सकते. पर सरकार को धीरे-धीरे समय से लागू कर देना चाहिए. सबसे बड़ी बात कि संविधान लागू हुआ था 1950 में तो फिर इतना वक़्त कैसे लग गया?

क्या ये मुसलमानों को हिन्दू बनाने की साजिश है?

यूनिफॉर्म सिविल कोड सिर्फ मुसलमानों के लिए नहीं है. और न ही ये मुसलमानों को हिन्दू बनाने की साजिश है. इसका मतलब ये भी नहीं है कि हिन्दू श्रेष्ठ हैं और मुसलमान अधम. इसका धर्म से लेना-देना नहीं है. किसी की पहचान नहीं जा रही और किसी की 'घर-वापसी' नहीं हो रही. यूनिफॉर्म सिविल कोड सीधा-सीधा जुड़ा है देश के हर नागरिक के अधिकारों से. नागरिक बोले तो हिन्दू, मुसलमान, सिख, ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन सब. होता क्या है कि मार-पीट, जमीन-जायदाद आदि के मुद्दे IPC और CrPC से सुलझाये जाते हैं. शादी-विवाह, तलाक, मां-बाप की जायदाद में हिस्सा हर चीज के लिए कानून है.

इरादे ठीक हैं तो दिक्कत कहां है?

पर इसमें पेच है. धार्मिक पेच. हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन धर्म के लोग शादी-विवाह , तलाक, मां-बाप की जायदाद में हिस्सा के लिए कानून का सहारा ले सकते हैं. पर इस्लाम माननेवालों के लिए कानून थोड़ा सा अलग है. इससे हिन्दू-मुसलमान या किसी और धर्म को दिक्कत नहीं है. दिक्कत है तो सिर्फ औरतों को. इस्लाम में औरतों की शादी, तलाक और फिर शादी को लेकर बड़े पुराने किस्म के कानून हैं. वैसे कानून को आज के ज़माने में लागू करना औरतों की तौहीन है.

'संस्कारी देश भारत' को क्या अंग्रेजों ने बिगाड़ दिया?

हुआ क्या था कि पहले हिंदुस्तान में कोई लिखित कानून नहीं था. सब बड़े-बुजुर्गों से पूछकर चलता था. तभी ये सारी चीजें आ गयीं थीं कि 'गोत्र' में शादी नहीं करनी है. अपने गांव में शादी नहीं करनी है. इत्यादि-इत्यादि. मुस्लिम समाज में अपने कुछ अलग उसूल थे. सब चल रहां था.
पर सबमें एक बात कॉमन थी: औरतों को कोई अधिकार नहीं था. कन्यादान हुआ, बात ख़त्म. तलाक नहीं होगा. जिस घर में बियाह  के गईं, अब वहां से अर्थी निकलेगी. अगर जिन्दगी नरक हो गई तो भगवान का दिया मान के निभा जाओ.
फिर आये अंग्रेज. उनको कानूनों से बड़ा प्यार था. हर चीज का सिस्टम लगाया. फिर हिन्दू-मुस्लमान के शादी-विवाह के कानूनों की भी स्टडी करने लगे. बड़ा ही जटिल था. हर एक किलोमीटर पर कानून ही बदल जाता था. 'हमारे यहां ऐसे नहीं, ऐसे शादी होती है. बेटी ससुराल गई अब मायके से कोई रिश्ता नहीं. बस तीज-त्यौहार जायेगा'. अब अंग्रेजों को ये समझ ना आये. भाई ये क्या बात है? बेटी को हिस्सा नहीं दोगे प्रॉपर्टी में से?

1857 की क्रांति

तब तक एक गड़बड़ हो गई. 1857 की क्रांति. वजह हुई कि सैनिकों के बैरक में एक अफवाह फैल गई. कि हिन्दुओं का धर्म भ्रष्ट करने के लिए कारतूस में गाय की चर्बी और मुसलमानों का धर्म भ्रष्ट करने के लिए सूअर की चर्बी मिलाई गई है. अंग्रेजों को समझ में आ गया कि कुछ भी करो यहां, इस मामले में दखल मत दो. फिर उन्होंने इसी हिसाब से सबको उनके अपने ही तरीके से रहने दिया. पर ये करने लगे कि जो कानून जुबानी चलते थे उनको लिखना शुरू कर दिया. फिर कुछ-कुछ कानून तो उन्होंने जबरदस्ती पास करा लिए थे. जैसे सती-प्रथा को ख़त्म करना, विधवा-विवाह. धीरे-धीरे शादी के लिए लड़का-लड़की की उम्र भी तय कर दी. बाल-विवाह के सख्त खिलाफ थे अंग्रेज. वही लोग 1929 में शारदा एक्ट लाये विवाह की मिनिमम उम्र के लिए. वहीं मुहम्मद अली जिन्ना की मांग पर Muslim Personal Law (Shariat) Application Act, 1937 पास कर दिया गया. ये कानून 'शरीयत' के हिसाब हैं. तब से मुस्लिम समाज में शादी-विवाह और तलाक सम्बन्धी केस इसी के अंडर आते हैं.

हिन्दू कोड बिल

आज़ादी के बाद जवाहर लाल नेहरु और भीमराव अम्बेडकर ने 1956 में 'हिन्दू धर्म' के पंडों के 'शास्त्र-सम्मत विधियों' की ऐसी-तैसी करते हुए तलाक, एलिमोनी यानी तलाक के बाद का भत्ता, पिताजी की संपत्ति में बेटे-बेटियों को बराबर हिस्सा और बच्चा गोद लेने की सुविधा हर चीज के लिए हिन्दू कोड बिल लेकर आये. उस समय देश आज़ादी के वक़्त हुए क़त्ल-ए-आम से गुजरा था. इसके चलते बाकी धर्मों के लिए कानून नहीं लाए गए. कहा गया कि वक़्त आएगा तो फिर सब हो जायेगा. पर तत्काल सहूलियत के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट 1954 लाया गया. अगर कोई अपने धर्म की रीति-रिवाजों से शादी नहीं करना चाहता तो इस एक्ट के अंतर्गत शादी कर सकता था. पर 'धर्म के माफिया' इस एक्ट को 'अधर्मी' बताते रहते हैं. सब ठीक हो जाने वाला वक़्त आया नहीं. वक़्त तो लाना पड़ता है. चीन से, पाकिस्तान से लड़ाई, सूखा, इमरजेंसी, गिरती-पड़ती सरकारें, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या. सब कुछ रुक सा गया था.
फिर एक दौर आया. राजीव गांधी भारत के इतिहास के सबसे बड़े जनादेश के साथ प्रधानमंत्री बने.

शाह बानो मामले ने सब बदल दिया!

उसी समय एक घटना हुई. 1986 में एक 73 साल की बूढ़ी औरत शाह बानो कोर्ट पहुंची. उसके पति ने 'तीन बार' तलाक कहकर उसको तलाक दे दिया था! बरसों पहले हुई शादी में 'मेहर' की रकम तय की थी पति ने. वो उसने वापस कर दी शाह बानो को. पर वो रकम 50-60 साल बाद पेट भरने लायक तो नहीं थी.
मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार: 'इद्दत' के मुताबिक शाह बानो को सिर्फ तीन महीने के लिए भत्ता मिलना चाहिए'. CrPC की धारा 125, जो सारे भारतीयों पर लागू है, के अनुसार: मेंटेनेंस हमेशा देना पड़ेगा.
मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया. 5 जजों की बेंच ने कड़े शब्दों में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को फटकार लगाई और कहा कि देश के कानून का पालन करना पड़ेगा. भत्ता तो देना पड़ेगा. साथ ही ये भी कह दिया कि यूनिफॉर्म सिविल कोड जल्दी लागू किया जाये. 1984 के दंगों के बाद देश अभी संभल रहा था. अब सिविल कोड को लेकर बवाल कट गया. कहा जाने लगा कि सरकार और कोर्ट सब मिलकर देश के 'माइनॉरिटीज' पर हिन्दू कानून लागू करना चाहते हैं. माइनॉरिटीज की अपनी पहचान ही ख़त्म करना चाहते हैं. राजीव गांधी के एक मंत्री ने आत्मदाह करने की धमकी दी. राजीव प्रेशर में आ गए. उनके पास पार्लियामेंट में बहुत बड़ा बहुमत था. चाहते तो क्या नहीं कर सकते थे. एक मंत्री की धमकी और लाखों-करोड़ों औरतों का हक़. पर उन्होंने चुना सेफ रास्ता. तुरंत Muslim Women’s (Protection of Rights on Divorce) Act 1986 पास किया गया. एक्ट ने कहा कि CrPC की 'धारा 125' मुस्लिम औरतों पर लागू नहीं होगी. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में ही याचिका दायर की गई. कहा गया कि नया कानून संविधान के आर्टिकल 14, 15 और 21 को तोड़ता है. सही में तोड़ता है. इन आर्टिकल्स में 'सबको एक सामान अधिकार' और 'जीने का हक़' जैसे चीजें कही गई हैं. सुप्रीम कोर्ट पार्लियामेंट के फैसले को बदल तो नहीं सकता था. इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया. कहा गया कि ऐसा नहीं है कि ये संविधान के खिलाफ है. तीन महीनों में इतना पैसा मिल जाएगा कि काम चलता रहेगा! यहां से भारत की राजनीति बदल गई. 1956 में कांग्रेस की सरकार 'हिन्दू कोड बिल' लाई थी. लेफ्ट सहित कई सारे दलों ने इसका समर्थन किया था. पर जनसंघ और आरएसएस ने इसका भयानक विरोध किया था.
1986 के 'शाह बानो' मुद्दे के बाद मामला उलट गया. जनसंघ से चलकर बनी पार्टी बीजेपी ने अपने राजनीति तीन मुद्दों पर डिक्लेयर की: 1. राम जन्मभूमि 2. धारा 370 3. यूनिफॉर्म सिविल कोड

यूनिफॉर्म सिविल कोड और 'मुसलमान तुष्टिकरण'

बीजेपी ने हिंदुत्व का मुद्दा उठाते हुए यूनिफॉर्म सिविल कोड को 'मुसलमान तुष्टिकरण' के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू किया. और आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस और लेफ्ट ने यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करना शुरू कर दिया! पिछले 25 सालों से यही चल रहा है. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने भी 'यूनिफॉर्म सिविल कोड' का राग अलापा था पर किया कुछ नहीं. 2014 लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने क्लियर किया था कि यूनिफॉर्म सिविल कोड उनके मुद्दे में है. 2015 में लॉ मिनिस्टर सदानंद गौड़ा ने कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने में दिक्कतें तो हैं पर धीरे-धीरे देखेंगे. 2016 में उन्होंने पहला कदम उठा लिया है. अभी उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं. कहा जा रहा है कि बीजेपी की सरकार ने 'चुनावी फायदा' उठाने के लिए अभी यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात कही है. जो भी हो, यूनिफॉर्म सिविल कोड किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है.

सरकार पूरी तरह ईमानदार नहीं है!

अब यहां एक और पेच है. पेच वही हैं जो ऊपर सवाल के रूप में पूछे गए थे. चलो मान लेते हैं कि औरतों के हक़ में आपकी आवाज उठी है. आप कुछ करना चाह रहे हैं. पर ट्रांसजेंडर, गे, लेस्बियन लोगों का क्या? क्या उनके लिए फिर से कोई राजनीतिक पार्टी बनानी पड़ेगी? जब आप कानून बना ही रहे हैं तो फिर ये क्यों नहीं बोलते कि इस बार सबका ख्याल रखा जायेगा? यूएन की मीटिंग में LGBT के मुद्दे पर आपने वोट क्यों नहीं किया? यूनिफॉर्म सिविल कोड 'पूरी जनता' के लिए है. जब तक आप सबके हकों की बात नहीं करेंगे हमें यकीन नहीं आएगा. और तब तक आपको भी अपने कानून पर यकीन नहीं करना चाहिए.

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