- पहला, अमेरिका के वैक्सिनेशन प्रोसेस पर. यहां लगभग आधी व्यस्क आबादी को कोरोना का कम-से-कम एक टीका लग चुका है. इसके बावजूद ‘हर्ड इम्युनिटी’ कोसों दूर है. हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि ‘हर्ड इम्युनिटी’ शायद कभी न आए. ऐसा कहने की वजह क्या है? अगर हर्ड इम्युनिटी नहीं आई तो वैक्सिनेशन से क्या फायदा होगा?
- दूसरे बिंदु में बात होगी यमन की. सिविल वॉर और विदेशी दखल से जूझ रहा यमन वैक्सीन के लिए कोवैक्स प्रोग्राम पर निर्भर है. पहली खेप में यहां 03 लाख 60 हज़ार खुराकें आईं है. इसके बावजूद कुछ सौ लोगों को ही टीका लग सका है. ये देरी क्यों हो रही है? इससे यमन के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?
- और तीसरा, अगर कोरोना वायरस के असर को खत्म करना है तो पूरी दुनिया को वैक्सीन लगाना ज़रूरी है. आपको पोलियो के टीके का ऐड याद है? जिसमें कहते थे, कोई बच्चा छूट न जाए. ये भी कुछ-कुछ वैसा ही है. कोई इंसान छूट न जाए. पूरी दुनिया को वैक्सिनेट करने का लक्ष्य कैसे हासिल होगा? इसमें कितना समय लगेगा?
शुरुआत अमेरिका से
एक समय अमेरिका कोरोना का एपिसेंटर था. संक्रमण और मौतों के मामले में रोज़ाना अनचाहा रेकॉर्ड बन रहा था. पीक पर संक्रमण का ग्राफ़ तीन लाख के पार भी पहुंचा. अमेरिका कुल संक्रमण और मौतों के मामलें में अभी भी टॉप पर है. लगभग 33 करोड़ की आबादी वाले देश का दस फीसदी हिस्सा कोरोना से संक्रमित हो चुका है. यहां लगभग 05 लाख 80 हज़ार लोगों की कोरोना से मौत भी हुई है.
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, संक्रमण और मौतों का ग्राफ़ नीचे जा रहा है. बीते हफ़्ते नए पॉज़िटिव केस 16.2 प्रतिशत तक घट गए. कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा भी 8.2 फीसदी तक कम हुआ. पिछले तीन हफ़्ते से लगातार इसमें गिरावट दर्ज़ हो रही है. कई राज्यों ने पहले से लगे प्रतिबंधों को कम कर दिया है. सेंटर्स फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेन्शन (CDC) ने कहा था कि पूर्ण तौर पर वैक्सिनेट हो चुके लोगों को आउटडोर मास्क पहनने की ज़रूरत नहीं है. राष्ट्रपति जो बाइडन ने कोरोना वायरस से आज़ादी के लिए चार जुलाई की तारीख़ भी तय कर दी है.

अमेरिका में अब तक 5 लाख 80 हज़ार से अधिक लोगों की कोरोना से मौत हुई है. (तस्वीर: एपी)
इस परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ा हाथ वैक्सीन का है!
अमेरिका में कोरोना के तीन टीकों को अप्रूवल मिला है. फ़ाइज़र, मॉडर्ना और जॉनसन एंड जॉनसन. इन्हीं तीनों के सहारे अमेरिका कोरोना से जंग को आगे बढ़ा रहा है. अभी तक 30 प्रतिशत से अधिक व्यस्क आबादी को पूरी तरह वैक्सिनेट किया जा चुका है. जबकि 50 फीसदी से अधिक को कम-से-कम एक खुराक लग चुकी है.
अमेरिका उस माइलस्टोन को छूने के क़रीब पहुंच गया है, जिसे इस जंग का अंतिम पड़ाव बताया जा रहा था. हर्ड इम्युनिटी. यानी लोगों में रोग के प्रति लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता तैयार करना. ताकि वायरस का असर खत्म हो जाए. ये कैसे होता? आबादी के एक तय हिस्से को टीका लगाकर. महामारी की शुरुआत में ही वैज्ञानिकों ने इसपर विचार किया था. तब वैक्सीन का काम अपने शुरुआती स्टेज में था.
उस वक़्त क्या तय हुआ था? यही कि अगर 60 से 70 फीसदी आबादी को टीका लगा दिया जाए तो हर्ड इम्युनिटी डेवलप हो जाएगी. इससे वायरस का असर खत्म हो जाएगा और दुनिया अपनी पुरानी स्थिति में वापस लौट पाएगी. अमेरिका वैक्सिनेशन का लक्ष्य तो जल्दी ही हासिल कर लेगा. लेकिन जहां तक हर्ड इम्युनिटी की बात है, वो अभी भी दूर की कौड़ी है. हेल्थ एक्सपर्ट्स ने कहा है कि ये वायरस कभी खत्म नहीं होने वाला है. उनका कहना है कि हाल-फिलहाल में हर्ड इम्युनिटी हासिल करने का दावा नहीं किया जा सकता. हालांकि, हम वायरस के असर को नियंत्रित करने में कामयाब हो जाएंगे.

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन. (तस्वीर: एपी)
कोरोना पर राष्ट्रपति जो बाइडन के सबसे अहम सलाहकार हैं डॉ. एंथनी फ़ाउची. उन्होंने भी इस दावे पर अपनी सहमति जताई है. उन्होंने कहा कि लोगों को लगता है कि हर्ड इम्युनिटी कोई चमत्कारिक पड़ाव है. वहां तक पहुंच गए तो आपको कभी संक्रमण नहीं होगा. फ़ाउची ने कहा कि हमें कुछ समय के लिए इसे भूल जाना चाहिए. हमारा फ़ोकस ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को टीका लगाने पर होना चाहिए. इसी तरीके से संक्रमण को कम किया जा सकता है.
हर्ड इम्युनिटी पर एक्सपर्ट्स की राय बदलने की वजह क्या है?
पहली वजह है, पुराना कैलकुलेशन. एक्सपर्ट्स की शुरुआती गणना कोरोना वायरस के ओरिजिनल वर्ज़न पर बेस्ड थी. समय के साथ वायरस म्यूटेट हुआ. इसके नए वैरिएंट्स सामने आए हैं. जो न सिर्फ़ तेज़ी से संक्रमण फैलाते हैं, बल्कि उसी अनुपात में लोगों की जान भी ले रहे हैं. नई गणना में हर्ड इम्युनिटी के लिए 80 फ़ीसदी आबादी को टीका लगाने की बात कही गई है. अगर इस बीच कोई ज़्यादा संक्रामक वैरिएंट मिला तो ये कैलकुलेशन फिर से बदल सकता है.
दूसरी वजह है, वैक्सिनेशन की रफ़्तार में कमी. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका में 30 फ़ीसदी से अधिक लोग अभी भी वैक्सीन लगाने में हिचक रहे हैं. पिछले हफ़्ते वैक्सिनेशन में 10 फ़ीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज़ हुई है.

कोरोना पर राष्ट्रपति जो बाइडन के सबसे अहम सलाहकार डॉ. एंथनी फ़ाउची. (तस्वीर: एपी)
तीसरी वजह है, वैक्सीन के डिस्ट्रीब्यूशन में असमानता. एक तरफ़ अमीर देश अपनी आधी आबादी को वैक्सीन लगा चुके हैं. जबकि बाकी दुनिया में ये आंकड़ा काफी कम है. भारत में सिर्फ़ दो फ़ीसदी लोग दोनों खुराक लगा पाए हैं. दक्षिण अफ़्रीका में ये आंकड़ा एक फीसदी पर अटका हुआ है. कोरोना महामारी वैश्विक है. अगर दुनिया का कोई भी हिस्सा वैक्सीन से अछूता रहा, और वहां वायरस का नया वैरिएंट पनपा तो वो आसानी से अमेरिका तक पहुंच सकता है. इसलिए ज़रूरत है सबको वैक्सीन लगाने की.
जानकारों का कहना है वैक्सीन से हर्ड इम्युनिटी भले डेवलप न हो, लेकिन अस्पतालों पर से दबाव हट जाएगा. कोरोना वायरस सीज़नल बुखार की तरह हो जाएगा, जिसका आसानी से इलाज किया जा सकता है. बहुत कम लोगों को अस्पताल जाने की ज़रूरत पड़ेगी. कोरोना वायरस से मचने वाली अफरा-तफरी बीते समय की बात हो जाएगी.
अमेरिका के बाद अब चलते हैं यमन की तरफ
ये देश सिविल वॉर और भूखमरी से जूझ रहा है. देश के बड़े हिस्से पर ईरान-समर्थित हूती विद्रोहियों का कब्ज़ा है. जबकि बाकी हिस्सा सऊदी अरब के समर्थन वाली सरकार के नियंत्रण में है. दोनों पक्ष 2014 से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं. बीच में पिस रही है आम जनता. यमन की 80 फीसदी आबादी विदेशी मदद पर निर्भर हो चुकी है.

यमन आज भी सिविल वॉर और भूखमरी से जूझ रहा है. (तस्वीर: एपी)
जहां तक कोरोना की बात है. अभी तक लगभग 6,300 लोग संक्रमित हुए हैं. इनमें से 1239 की मौत हो गई. संक्रमण में कमी की कड़ी टेस्टिंग से जुड़ती है. पूरे यमन में अभी तक महज 27 हज़ार कोरोना टेस्ट हुए हैं. हेल्थ सिस्टम लगभग कोलैप्स हो चुका है. मेडिकल स्टाफ़्स की भारी कमी है. बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे यमन के लिए कोरोना का संकट कम था. यूएन की एक रिपोर्ट में दर्ज़ हुआ- यमन कोरोना वायरस के बारे में चिंता करना भी अफ़ोर्ड नहीं कर सकता.
कोरोना वैक्सीन के लिए यमन पूरी तरह से WHO के कोवैक्स प्रोग्राम पर निर्भर है. इसके तहत ग़रीब देशों को कोरोना की मुफ़्त वैक्सीन दी जा रही है. अप्रैल 2021 में यमन को पहली खेप मिली. कुल 03 लाख 60 हज़ार खुराक. वैक्सीन की आवक को दो हफ़्ते से ज़्यादा हो चुके हैं. लेकिन अभी तक सिर्फ़ कुछ सौ लोगों को ही टीका लगाया जा सका है.
लोगों में वैक्सीन को लेकर कई तरह की आशंकाएं हैं. किसी को लगता है कि टीका लगाने से रमज़ान का उपवास टूट जाएगा. कई हेल्थ वर्कर्स इसी वजह से टीका नहीं ले रहे हैं. कईयों का मानना है कि ये बीमारी सिर्फ़ अमीरों को होती है. कुछ को अपनी इम्युनिटी पर इतना भरोसा है कि वे वैक्सीन के लिए तैयार नहीं हैं. यमन में कोरोना से पहले अफ़वाहों से जंग जीतना ज़रूरी हो गया है.

यमन में कोरोना से अब तक 1200 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. (तस्वीर: एपी)
इन सबके अलावा, अस्पतालों तक पहुंच की कमी भी लोगों को इससे दूर कर रही है. गांव के लोगों को सरकारी अस्पताल तक आने के लिए 40-50 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है. रास्ते में स्नाइपर्स और हमले के डर से भी लोग वैक्सीन लेने नहीं आ रहे हैं.
ये स्थिति अगर नहीं बदली तो यमन के लिए हालात बदतर हो सकते हैं. अगर यहां संक्रमण का विस्फ़ोट हुआ तो यमन का भविष्य गर्त में चला जाएगा. जहां से उसे बचा पाना लगभग असंभव हो जाएगा.
पूरी दुनिया को वैक्सिनेट करने में कितना समय लगेगा?
आज का अंतिम बिंदु भी कोरोना वैक्सीन से जुड़ा है. आपके मन में अक्सर सवाल आता होगा कि ये सब कब ठीक हो जाएगा? कब दुनिया नॉर्मल स्थिति में लौट पाएगी? पूरी दुनिया को वैक्सिनेट करने में कितना समय लगेगा?
वैक्सीन कोरोना महामारी से मुक्ति का सबसे सटीक उपाय है. वैक्सीन हमारे शरीर के अंदर प्रतिरोधक क्षमता विकसित करती है. साथ ही, वायरस के असर और संक्रमण फैलने की आशंका को भी कम करती है. जानकारों का कहना है कि नॉर्मल में लौटने के लिए आबादी को वैक्सिनेट करना ज़रूरी है. ये कई देशों में देखने को भी मिल रहा है. इजरायल, डेनमार्क और ब्रिटेन ने अधिकांश प्रतिबंध हटा दिए हैं. अमेरिका में भी लोगों को छूट मिल रही है. और, ये सब हुआ है वैक्सीन से.
अगर वैक्सीन से लाभ हो रहा है, तो पूरी दुनिया ऐसा उपाय क्यों नहीं अपनाती? ताकि जल्द-से-जल्द ये महामारी हमारी ज़िंदगियों से दूर चली जाए. ऐसा न होने की कई वजहें हैं-

कोवैक्स में 170 से ज़्यादा देश शामिल हो चुके हैं. (तस्वीर: एपी)
पहली वजह है वैक्सीन राष्ट्रवाद
अमीर देशों के पास इंफ़्रास्ट्रक्चर था. उनके पास रिसर्च के लिए पैसे थे. कच्चे माल की उपलब्धता भी थी. उन्होंने वैक्सीन बनाई तो सबसे पहले अपने लिए सुरक्षित किया. आबादी से कई गुणा ज़्यादा. इससे हुआ ये कि विकासशील और अल्प-विकसित देश पीछे छूट गए. उन्हें वैक्सीन हासिल करने के लिए अमीर देशों पर निर्भर होना पड़ा. जो बिल्कुल अफ़ोर्ड नहीं कर सकते, वे WHO के कोवैक्स प्रोग्राम पर निर्भर हैं. उन्हें पूरी आबादी के लायक वैक्सीन हासिल करने में कई वर्षों का समय लग जाएगा.
दूसरी वजह है लिमिट
पहली बार दुनिया ने इस स्तर की महामारी का सामना किया है. शायद ही कोई देश इससे अछूता रहा हो. सबको वैक्सीन चाहिए. वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां इसके लिए कतई तैयार नहीं थी. वे पहले से दूसरी बीमारियों के लिए वैक्सीन बना रहीं थी. उन्हें उसके साथ-साथ कोरोना के लिए भी तैयारी करनी पड़ी. उन्होंने किया भी. लेकिन उनकी भी एक सीमा है. कच्चे माल और प्रशिक्षित स्टाफ़्स की कमी भी प्रोडक्शन की सीमा तय करती है. WHO वैक्सीन प्रोडक्शन के लिए स्टाफ़्स को ट्रेन करने के मैकेनिज़्म पर काम कर रहा है. लेकिन उसमें समय लगेगा. वैक्सीन प्रोडक्शन विशेषज्ञता का काम है. अचानक से किसी कंपनी को ऑर्डर देकर इसे नहीं पूरा किया जा सकता.
तीसरी वजह है अमीर देशों का लालच
हमने पहले भी दुनियादारी में बताया था कि अमीर देश कोरोना वैक्सीन पर पेटेंट राइट्स हटाने के लिए तैयार नहीं हैं. भारत और साउथ अफ़्रीका पिछले साल से इसकी मांग कर रहे हैं. कई नोबेल विजेताओं ने चिट्ठी लिखकर इस मांग का समर्थन किया था. इसके बावजूद अमीर देश पेटेंट राइट्स हटाने से पीछे हट रहे हैं. उन्हें मुनाफ़ा कमाना है. अगर पेटेंट राइट्स हट गए तो दुनिया में कोई भी कंपनी वैक्सीन बना सकती है. भारत और साउथ अफ़्रीका के पास पूरा सेटअप है. ऐसा हुआ तो वैक्सिनेशन की रफ़्तार ख़ुद-ब-ख़ुद तेज़ हो जाएगी. अमीर देश ऐसा दिल दिखाएंगे, इसपर से संशय हटा नहीं है.
इस समय जिस गति से टीका लगाने का काम चल रहा है, पूरी दुनिया को वैक्सिनेट करने में चार से साढ़े चार साल का वक़्त लग सकता है. भले ही कुछ देश इस साल के अंत तक पूरी आबादी को वैक्सीन लगा दें, उनपर खतरा मंडराता रहेगा. क्यों? जब तक दुनिया की समूची आबादी वैक्सिनेट नहीं हो जाती, नए वैरिएंट्स के पनपने की आशंका बनी रहेगी. और एक संक्रमण पूरी दुनिया में हलचल मचाने के लिए काफी है. चीन के वुहान से शुरू हुए संक्रमण का कहर हम देख ही रहे हैं.
कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को सचमुच में ‘वैश्विक गांव’ बना दिया है.

















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