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अब पाकिस्तान की तरफ से जिन्न करेंगे हमला!

जिन्नात. जो किसी को नहीं दिखते. लेकिन पाकिस्तान उनसे बिजली बनवाने की तैयारी में है!

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फोटो - thelallantop

आप बिना साइंस पढ़े जिन्नातों से अपना इलाज करा सकते हैं. हवा को कैद कर सकते हैं. बिजली बना सकते हैं मगर कैसे. ये ही बताया है परवेज हूदभाई ने. उनके लेख का तर्जुमा हम आपको पढ़वा रहे हैं. परवेज लाहौर और इस्लामाबाद में फिजिक्स पढ़ाते हैं.

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कोमसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी इस्लामाबाद, पाकिस्तान की बड़ी यूनिवर्सिटियों में से एक है. कैंपस में 'जिन्नात और काला जादू' के नाम से एक वर्कशॉप हुई. मेहमान स्पीकर राजा जिया उल हक़ थे. जिनके बारे में बताया गया मियां रूहानी (आत्माओं) कार्डियोलॉजिस्ट, काली बलाओं (मुसीबत) और दूसरे तंतर मंतर के माहिर हैं. उनका तंतर मंतर इतना मशहूर है कि हॉल स्टूडेंट्स से खचाखच भरा हुआ था.
राजा जिया उल हक़ ने जिन्नात और काले जादू के फेवर में एक बेहद दिलचस्प दलील दी. जिस चीज को देखा नहीं उसको राजा साब ने तीन कैटेगरी में बांट दिया. एक जो उड़ती हैं. दूसरी जो हालात के मुताबिक अपनी शक्ल-ओ-सूरत को तब्दील करती हैं और तीसरी वो जो गंदी जगहों मतलब कूड़े वगैरहा में रहती हैं. उन्होंने कहा कि अगर इनका वजूद नहीं है तो फिर बॉलीवुड इतनी बड़ी संख्या में डरावनी फ़िल्में क्यों तैयार कर रहा है.
जरा ठहरिए! क्या आप को ये दलील सोचने को मजबूर नहीं करती कि हॉलीवुड की मशहूर चुड़ैले, आत्माएं, और डरावने जानवर ख्याली होने के बजाए हकीकत में वजूद रखते हैं. यक़ीनन इस तरह के बचकाने दावे को कोई भी आसानी से चैलेंज कर सकता है, लेकिन ऐसे मौके पर इंतजामिया की कोशिश होती है कि तीन घंटे की तक़रीर में कोई खलल न पड़े. और वो अपनी बात बगैर कोई हंगामा हुए पूरी कर सके. अब आगे क्या होना चाहिए. शायद कोमसेट्स इंस्टिट्यूट जिन्नात के जरिए टेलीकम्युनिकेशन नेटवर्क तैयार कर सकती है. या फिर ऐसे जिन्नाती मिसाइल तैयार कर सकती है, जो राडार में नजर आए. और देश की सुरक्षा कड़ी हो जाए. जिन्नात पर आधारित केमिस्ट्री के जरिए बहुत से काम किए जा सकते हैं. जनरल जिया के दौर में तो जिन्नात से बिजली पैदा करने का मशवरा भी दिया गया था. ये मशवरा पाकिस्तान एटॉमिक एनर्जी कमीशन के सीनियर डायरेक्टर ने दिया था कि जिन्नात की मदद से एटमी और कूड़ा करकट से ईंधन तैयार किया जा सकता है. इस तरह की वर्कशॉप का होना कोई नई बात नहीं है. स्कूलों, कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों में इस तरह के रूहानी स्पीकर बुलाये जाते हैं, जो मौजूदा साइंसी इल्म से अलग ही इल्म बयान करते हैं. मिसाल के तौर पर इंस्टिट्यूट ऑफ़ बिजनेस मैनेजमेंट, कराची की एक मीटिंग का मौजू था 'आदमी के आखिरी लम्हात.' इसके पोस्टर में दिखाया गया कि अधेड़ उम्र का शख्स पुरानी कश्ती में कब्रिस्तान से गुजर रहा है. और हर बार की तरह हॉल स्टूडेंट्स से खचाखच भरा हुआ था. (जैसा कि मुझे बताया गया) इस लेक्चर में मरने के बाद की जिंदगी को कुछ खाकों के मदद से समझाया गया था. मरने के बाद की जानकारी देने वाले वो खुफिया एसएमएस थे, जो शायद स्पीकर को कब्र के अंदर से किसी मुर्दे ने भेजे होंगे.
कोई ये सोच सकता है कि पाकिस्तान की महंगी यूनिवर्सिटी ऐसी खुराफात से पाक होगी. लाहौर यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस, मुल्क की महंगी यूनिवर्सिटी है. उसका स्कूल ऑफ़ साइंस नद इंजीनियरिंग अमेरिकी डॉलर की मदद से तैयार किया गया है. जिसका मतलब है कि यहां कोई संजीदा काम होगा, लेकिन वहां के कई प्रोफेसर साइंस का मजाक उड़ाते हैं.
इत्तेफाक से इस साल के शुरू में मुझे यहां ह्यूमनिटीज़ के एक प्रोफेसर का लेक्चर सुनने का मौका मिला. एस लेक्चर कि खास बात साइंस पर लानत मलामत (बुरा बताना) करना था. उन्होंने ये तस्लीम किया कि वो फिजिक्स नहीं जानते हैं. और साइंस को ऐसे निशाना बनाना शुरू कर दिया जैसे वो बहुत बड़े जानकार हैं. और फिर ये भी दावा कर डाला कि 1923 में फिजिक्स का नोबल प्राइज जो रॉबर्ट एंड्रयूज मिलिकन को दिया गया था. वो उसका हकदार नहीं था. अभी मैं हैरान परेशान ये लेक्चर सुन ही रहा था कि प्रोफेसर साहब ने आइंस्टीन के मशहूर सिद्धांत E=mc2 को ही नकार डाला. ये सुनके मेरी पलकें झपकना बंद हो गईं और ऐसा लगा कि शायद दिल की धड़कन रुक गई है. एटम बम फटेगा या न्यूक्लियर रिएक्टर कितनी बिजली पैदा करेगा तो क्या होगा. यक़ीनन ये काम जिन्नात का होगा. लेकिन वो ऐसा दावा करने वाले अकेले नहीं हैं.
यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस के बायोलॉजी डिपार्टमेंट ने तमाम फैकल्टी को एक ईमेल भेजा, जिसमें उन्होंने दावा किया कि कुरानी आयत की तिलावत करने या सुनने से 'जींस और मेटाबोलाइट' को कंट्रोल किया जा सकता है. ऑडियो विजुअल कमरे बनाए जाएं ताकि उस मर्ज़ के मरीजों का इलाज किया जा सके.
साइंस से तवज्जो हटाने के लिए पिछले माह यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेस ने पाकिस्तान के एक आला और काबिल मैथमेटिकल फिजिस्ट को नौकरी से निकाल दिया. खुशकिस्मती से उसका कोई नुकसान नहीं हुआ. क्योंकि उसे जल्द ही हार्वर्ड, प्रस्टीन या फिर एमआईटी, जहां उसने पीएचडी की थी, वहां जॉब मिलने वाली है.
हमारे तालीमी इदारों में बगैर दलील और साइंस मुखालिफ रवैयों की भरमार है. हो सकता है आपके लिए ये समझना मुश्किल हो... नहीं बिल्कुल नहीं. एक लम्हे के लिए सोचिए. साइंस को गलत साबित करना बहुत आसान है. साइंस को रद्द करने के मतलब है कि आप बहुत बड़ी जहनी मशक्कत और मुश्किल काम से बच जाते हैं. ऐसे समझिए फिजिक्स और मैथ से पीछा छूट जाता है. साइंस को समझने के मुकाबले उसे बुरा भला कहना आसान है.
इसके बहुत से फायदे हैं. बिना दिमाग लगाए न्यूरो सर्जन या क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट के बगैर आप जिन्नात की मदद से उस का इलाज कर सकते हैं. एक मकामी पीर भी ये इलाज कर सकता है. आप साइंस को पढ़ने के बजाए जिन्नात के जरिए हवा को कंट्रोल कर सकते हैं. और हां, साइंस पढ़के जलजलों की तहकीक करने की तो जरा भी जरूरत नहीं है. क्योंकि ये तो हमारे गलत कर्मों का नतीजा होते हैं.
जहां तक आम से खिलौने या औजार जैसे कंप्यूटर और सेलफोन का मामला है तो ये हम अपने सऊदी भाइयों की तरह हमेशा एप्पल, सैमसंग और नोकिया के खरीदेंगे. कोई पैसे की भूकी जिंग जैंग जोंग कंपनी सेलफोन चलाने के लिए पाकिस्तान में अपना नेटवर्क कायम कर लेगी. टेक्नोलॉजी या कोई चीज ईजाद करने जैसा गंदा काम हमने चीनियों, अमेरिकियों और यूरोपियन के लिए छोड़ रखा है. उनके जिन्नात को मालूम है कि अपना काम कैसे करना है.
पाकिस्तान के तालीमी इदारों को रोशन ख्याल होना चाहिए. खुले जहन के साथ नई सोच को जगह देनी चाहिए. नहीं तो जानवरों का बाड़ा बनके रह जाएगा. जहनी तौर पर सुस्त और नालायक प्रोफेसर की फ़ौज को ऐसे स्टूडेंट की जरूरत होती है जो उनकी हर बात पर सवाल उठाने या चैलेंज करने के बजाए उसपर अपना सिर झुकाए. क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि ऐसे 20 से 25 साल के नौजवानों को मौत का खौफ दिखाकर डराया जा सकता है.

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