आपको एक बरस पहले का दिन याद है? 15 अगस्त 2021 को भारत अपनी आज़ादी की 74वीं सालगिरह मना रहा था. वैसे, वो दिन रविवार का था. आमतौर पर रविवार का दिन शांति का होता है. लेकिन उस रोज़ अफ़ग़ानिस्तान में भारी हंगामा बरपा था. अमेरिका और उसके सहयोगी अपना बैग बांधकर निकल रहे थे, जबकि तालिबान अपने पैर पसारने की तैयारी में जुटा था. ये वही तालिबान था, जिसने अलक़ायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को अपने यहां शरण दी और लादेन के आतंकियों ने अमेरिका पर 9/11 का हमला किया. उसी तालिबान को हराने के लिए अमेरिका ने 2001 में वॉर ऑन टेरर की शुरुआत की थी. इसी तालिबान के शासन को पश्चिमी देशों में बर्बरता के उदाहरण के तौर पर पेश किया जाता था. और, इसी तालिबान के साथ समझौता करके अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान को उसकी किस्मत के सहारे छोड़ दिया.
एक साल में तालिबान ने क्या कर दिया?
तालिबान के एक साल के शासन में क्या कुछ बदल गया?


अमेरिका और उसके सहयोगी देश 20 बरस तक अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के ख़िलाफ़ लड़े. फिर उन्होंने हार मान ली. समझौता तो पहले ही हो चुका था, 15 अगस्त 2021 को तालिबान के लड़ाकों ने काबुल में राष्ट्रपति के घर पर क़ब्ज़ा कर लिया. उस समय अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति थे, अशरफ़ ग़नी. वो तालिबान के आने से पहले ही देश छोड़कर भाग चुके थे. उन्हें अपनी हत्या का डर सता रहा था. अफ़ग़ानिस्तान नेतृत्व-विहीन हो चुका था. कुर्सी खाली थी, तालिबान ने अपना रुमाल रख दिया. अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में तालिबान की वापसी हो चुकी थी. पूरे बीस साल बाद.
कुछ चुनिंदा विरोध को छोड़ दिया जाए, तो इस वापसी को चुनौती देने वाला कोई नहीं था. इसी वजह से एक साथ कई सवाल खड़े हुए. मसलन, क्या तालिबान फिर से वही बर्बरता दोहराएगा? विदेशी सरकार के साथ काम करने वाले अफ़ग़ान नागरिकों का क्या होगा? क्या महिलाओं को फिर से पर्दे में रहना होगा? क्या एक बार फिर अफ़ग़ानिस्तान आतंकी संगठनों का अड्डा बन जाएगा? आदि.
इन्हीं सवालों के बीच 17 अगस्त 2021 को तालिबान ने पहली प्रेस कॉन्फ़्रेंस की. इसको तालिबान के प्रवक्ता ज़बीउल्लाह मुजाहिद ने संबोधित किया था. उसने तालिबान की तरफ़ से कई वादे किए. क्या-क्या कहा था?

- मैं अमेरिका और बाकी अंतरराष्ट्रीय समुदाय को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि, किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा. हम अफ़ग़ानिस्तान के अंदर या बाहर, कोई दुश्मन नहीं चाहते.
- किसी से भी कोई बदला नहीं लिया जाएगा. भले ही उसने अमेरिका या नेटो की सेना के लिए काम किया हो.
- महिलाओं को पढ़ने और काम करने की आज़ादी दी जाएगी. लेकिन उन्हें इस्लामिक कानून का पालन करना होगा.
- मीडिया धार्मिक कानूनों के अंदर रहकर काम कर सकती है. निजी मीडिया संस्थानों को बिना किसी रुकावट के काम करने की अनुमति दी जाएगी.
तो, एक बरस बाद सवाल ये उठता है कि,
तालिबान अपने वादे पर कितना खरा उतरा?
तालिबान के एक साल के शासन में क्या कुछ बदल गया?
और, अफ़ग़ानिस्तान का भविष्य किस तरफ़ बढ़ रहा है?
तालिबान का कहना था कि वो किसी से भी दुश्मनी नहीं चाहते. उनका ये दावा कई बिंदुओं पर ग़लत साबित हुआ है. तालिबान के दो सबसे करीबी पड़ोसी हैं. पूरब की तरफ़ पाकिस्तान है. जबकि पश्चिम की सीमा से सटा है, ईरान. तालिबान पिछले एक बरस में दोनों से लड़ चुका है. 01 दिसंबर 2021 को तालिबानी लड़ाके ईरान की सीमा में घुस गए थे. उन्होंने ईरानी सेना की कई चौकियों पर क़ब्ज़ा कर लिया. ये झगड़ा आगे बढ़ता, उससे पहले ही दोनों पक्षों ने समझौता कर लिया. समझौते के तहत, तालिबान ने ईरान के इलाकों पर से अपना दावा छोड़ दिया.
दोनों देशों के बीच दूसरी बड़ी झड़प जुलाई 2022 में हुई. इसमें तालिबान का एक लड़ाका मारा गया. दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर झगड़ा शुरू करने का आरोप लगाया था. ईरान का दावा था कि तालिबान ने उनकी सीमा में अपना झंडा फहराने की कोशिश की. इसके बाद विवाद बढ़ा था.
जहां तक पाकिस्तान की बात है, तालिबान कई बार पाकिस्तानी सैनिकों से उलझ चुका है. पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान से लगी सीमा पर फ़ेंसिंग का काम करवा रहा है. तालिबान इस सीमा को नहीं मानता. जनवरी 2022 में उसने कई इलाकों में फ़ेंसिंग उखाड़ दी थी. उसने धमकी भी दी कि अगर दोबारा ऐसी कोशिश हुई तो ख़ून की नदियां बह जाएंगी.
फिर अप्रैल 2022 में पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के ठिकानों पर हवाई हमले किए. तालिबान ने दावा किया कि इन हमलों में 40 से अधिक आम नागरिक मारे गए. पाकिस्तान ने इस हमले की ज़िम्मेदारी लेने से मना कर दिया था. इस घटना के बाद दोनों देशों में तनाव बढ़ गया था.
ये तो रही बाहरी मोर्चे की बात. घरेलू मोर्चे पर तालिबान इस्लामिक स्टेट ऑफ़ खुरासान प्रॉविंस (ISKP) और दूसरे विरोधी आतंकी संगठनों से भी जूझ रहा है. ISKP ने एयरपोर्ट, गुरुद्वारा, स्कूल, मस्जिद जैसी जगहों पर आतंकी हमले किए हैं. तालिबान इनसे निपटने में नाकाम साबित हुआ है.
अब दूसरे पॉइंट की तरफ़ चलते हैं.
दावा - किसी से भी कोई बदला नहीं लिया जाएगा.तालिबान के शासन की शुरुआत में ही विरोधियों और आलोचकों को ठिकाने लगाया जा रहा था. इसी वजह से नेटो सैनिकों के बाहर जाने के बाद काबुल एयरपोर्ट पर भगदड़ मचा. बहुत सारे अफ़ग़ानों ने ईरान और पाकिस्तान में शरण लेने की कोशिश की. जो बच गए, उनके लिए ज़िंदगी पहले जैसी नहीं रही.
जनवरी 2022 की TRT वर्ल्ड की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के पहले पांच महीने के शासन में कम-से-कम 31 पत्रकारों को गिरफ़्तार किया गया. जनवरी 2022 में काबुल यूनिवर्सिटी के प्रफ़ेसर फ़ेज़ुल्लाह जलाल की गिरफ़्तारी की ख़बर ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थी. जलाल ने नेशनल टीवी पर तालिबान की आलोचना की थी.
आलोचकों और विरोध की संभावनाओं को दबाने का सिलसिला आज भी जारी है.
तीसरा दावा - महिलाओं को पढ़ने और काम करने की आज़ादी दी जाएगी.1990 के दशक में जब तालिबान पहली बार अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में आया था, तब उसने सबसे पहले महिलाओं के अधिकारों में कटौती की थी.
महिलाओं को अकेले घर से बाहर जाने की मनाही थी. उन्हें सावर्जनिक जगहों पर जाने के लिए किसी पुरुष को साथ में लेना होता था. उन्हें कहीं भी जाने के लिए घर के पुरुषों की परमिशन लेनी होती थी. किसी दूसरे पुरुष से संबंध रखने पर जानलेवा सज़ा दी जाती थी. इसके अलावा, स्कूल-कॉलेज से महिलाओं को लगभग गायब कर दिया गया था. उन्हें घर की चहारदीवारी के भीतर क़ैद करके रखा जा रहा था.
दूसरे कार्यकाल में तालिबान ने बदलाव का वादा किया था. लेकिन जल्दी ही उसका मन बदल गया. उसने कपड़ों पर पाबंदी लगा दी है. महिलाओं को घर से बाहर जाने के लिए पुरुष का साथ होना अभी भी ज़रूरी है.
मार्च 2022 में स्कूलों को खोला गया. लड़कियां स्कूल पहुंचीं भी. लेकिन ऐन मौके पर उन्हें लौटना पड़ा. सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों को पढ़ाई की अनुमति अभी भी नहीं है. तालिबान का कहना है कि ऐसा महिला टीचर्स की कमी की वजह से हो रहा है. कुछ यूनिवर्सिटीज़ में लड़कों और लड़कियों, दोनों को इजाज़त है, लेकिन पाबंदियां इतनी हैं कि लड़कियां खुलकर अपने अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पा रहीं है.
जहां तक कामकाजी महिलाओं का सवाल है, लेबर फ़ोर्स में उनकी संख्या काफ़ी घटी है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के सत्ता में आने से पहले लेबर फ़ोर्स में महिलाओं की संख्या 22 प्रतिशत थी. तालिबान के आने के बाद ये संख्या घटकर 15 प्रतिशत रह गई. जुलाई 2022 की ऐमनेस्टी ने अपनी रिपोर्ट में बच्चों और महिलाओं के अधिकारों के हनन की बात कही थी.
तालिबान का चौथा बड़ा दावा प्रेस की आज़ादी से जुड़ा था. ये दावा भी झूठा साबित हुआ.
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान के शासन के पहले तीन महीनों में 43 प्रतिशत मीडिया संस्थान बंद हो गए. 84 प्रतिशत महिला पत्रकारों की नौकरी चली गई. 52 प्रतिशत पुरुष पत्रकार बेरोज़गार हो गए. आलोचना करने वाले पत्रकारों की पिटाई और गिरफ़्तारी आम हो चुकी है.

तालिबान के कई और भी दावे सफ़ेद झूठ साबित हुए हैं. अफीम उत्पादन की बात हो या अफ़ग़ानिस्तान की धरती से आतंकियों को निकालने की, तालिबान का दावा कई मोर्चों पर ग़लत साबित हुआ है.
31 जुलाई को अमेरिका ने ड्रोन हमले में अलक़ायदा के सरगना अल-जवाहिरी को मारा. ये ऑपरेशन काबुल में चलाया गया था. जिस घर में अल-जवाहिरी था, वो तालिबान सरकार के गृहमंत्री सिराज़ुद्दीन हक़्क़ानी के करीबी का था. इससे अंदाजा हो जाता है कि तालिबान अपने दावे को लेकर कितना गंभीर है. ये उसकी साख के लिए बड़ी चुनौती है.
इन सबके बीच अफ़ग़ानिस्तान की आम जनता पिसती जा रही है. वे कुएं से निकलकर खाई में गिर चुके हैं. उनका रहनुमा कब आएगा, फिलहाल ये दावे से नहीं कहा जा सकता.
अब सुर्ख़ियों की बारी
पहली सुर्खी ईरान से है. मशहूर लेखक और उपन्यासकार सलमान रश्दी पर न्यू यॉर्क में हुए हमले के बाद पूरी दुनिया से प्रतिक्रिया आई. लेकिन जिस देश पर सबसे ज़्यादा नज़र थी, वो ईरान था. हमले के बाद ये बात भी उठी कि इसके पीछे ईरान का हाथ हो सकता है. अब ईरान ने एक-एक कर इन आरोपों से इनकार किया है. 15 अगस्त को ईरान के विदेश मंत्रालय का बयान आया. उनकी तरफ़ से कहा गया,
- किसी को ईरान पर इल्ज़ाम लगाने का अधिकार नहीं है. ईरान ने कहा कि इस हमले के लिए रश्दी और उनके समर्थक ज़िम्मेदार हैं और उन्हें निंदा या किसी दूसरे पर आरोप लगाने का कोई हक़ नहीं है.
- इस्लाम के पवित्र प्रतीकों का अपमान और डेढ़ अरब से अधिक मुसलमानों और इस्लाम के उपासकों का तिरस्कार करके, सलमान रश्दी ने लोगों के गुस्से को न्यौता दिया है.
- ईरान ने ये भी कहा कि हमें हमलावर के बारे में बस उतना ही पता है, जितना मीडिया में आया है.
ये तो था ईरान का आधिकारिक बयान. उन्होंने आधिकारिक तौर पर हमले से किसी भी तरह का संबंध होने से साफ़ इनकार कर दिया है. हालांकि, ईरान के सरकारी अख़बारों ने रश्दी को किसी भी तरह की रियायत नहीं दी है. उन्होंने रश्दी पर हुए हमले को अल्लाह का बदला और पश्चिमी देशों की साज़िश करार दिया है. एक अख़बार ने लिखा कि न्युक्लियर डील को पटरी से उतारने के लिए इस हमले को अंज़ाम दिया गया है.
अब सवाल ये उठता है कि इस मामले में ईरान पर इतना फ़ोकस क्यों है?इसका संबंध तीन दशक पहले की एक घटना से है. 1988 में सलमान रश्दी ने ‘द सेटेनिक वर्सेज़’ नामक एक उपन्यास लिखा था. दुनियाभर के मुसलमान इससे नाराज़ हो गए. भारत में भी हिंसक प्रतिक्रिया देखी गई. अराजकता रोकने के लिए राजीव गांधी सरकार ने किताब को भारत में बैन कर दिया. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह रुहुल्लाह ख़ोमैनी ने रश्दी की हत्या के लिए फतवा जारी किया. उनके सिर पर 30 लाख डॉलर (अभी के हिसाब से लगभग 24 करोड़ रुपये) का इनाम घोषित कर दिया गया. जब रश्दी को ख़तरा महसूस हुआ, तब वो यूके चले गए. वहां की सरकार ने उन्हें सुरक्षा और नागरिकता दे दी. इसके बावजूद उनके ऊपर हमले नहीं रुके. सबसे हालिया हमले के बाद उन्हें वेंटिलेटर पर रखना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि उन्हें फिलहाल वेंटिलेटर से तो हटा लिया गया है, लेकिन रश्दी अपनी एक आंख खो सकते हैं.
जहां तक ईरान के फतवे की बात है, ये आज भी ऐक्टिव हैं. हालांकि, ईरान सरकार ने 2012 में इससे किनारा कर लिया था. इसके बाद एक दूसरे कट्टर इस्लामी संगठन ने फतवे की राशि बढ़ाकर लगभग 28 करोड़ रुपये कर दी थी.
रश्दी के हमलावर पर क्या अपडेट है?हमलावर हादी मतार लेबनान मूल का है. उसे अटैक के तुरंत बाद गिरफ़्तार कर लिया गया. शुरुआती जांच से पता चला है कि वो ईरान का समर्थक है. रश्दी पर हमला करने के लिए वो छह सौ किलोमीटर गाड़ी चलाकर न्यू यॉर्क आया था. उसने अभी तक हमले की असली वजह नहीं बताई है. हादी के ऊपर हत्या के प्रयास का मुकदमा चलेगा.
अतिम सुर्खी ऑस्ट्रेलिया से है. ऑस्ट्रेलिया के पूर्व प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन अपनी करतूतों के चलते घिरते नज़र आ रहे हैं. मॉरिसन पर आरोप है कि प्रधानमंत्री रहते हुए वो गुप्त तरीके से पांच मंत्रालय चला रहे थे. ये मंत्रालय थे - हेल्थ, फ़ाइनेंस, ट्रेज़री, गृह और रिसोर्सेज़.
इस जानकारी को आम जनता से छिपाकर रखा गया. यहां तक कि जिन मंत्रियों की आधिकारिक तौर पर नियुक्ति हुई थी, उन्हें भी ये बात पता नहीं थी.
इस खुलासे के बाद मॉरिसन की ख़ूब आलोचना हो रही है. उन्हें सांसदी छोड़ने के लिए कहा जा रहा है. ऑस्ट्रेलिया के मौजूदा प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने कहा है कि मॉरिसन ने लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाया है. वो इस मामले में कानूनी सलाह ले रहे हैं.
इस मसले पर मॉरिसन का क्या कहना है?उन्होंने बिना किसी को बताए एक्स्ट्रा मंत्रालय संभालने की बात स्वीकार की है. मॉरिसन ने फ़ेसबुक पोस्ट लिखकर अपना पक्ष रखा. उन्होंने अपना बचाव करने की कोशिश की. बोले, मैंने एक्स्ट्रा पोर्टफ़ोलियो इसलिए लिया, ताकि अगर कोई मंत्री कोरोना से संक्रमित हो जाए तो भी सरकार का काम चलता रहे. मॉरिसन ने माना कि ये गैर-ज़रूरी था और वो इस बात को पहले ही भुला चुके हैं.
मॉरिसन की सफ़ाई के बावजूद लोगों की नाराज़गी कम नहीं हुई है. उनका कहना है कि अगर उन्हें मंत्रियों के बीमार होने की इतनी चिंता थी, तो उन्होंने इतनी बड़ी बात छिपाई क्यों?
अभी इस बात का हिसाब होना है कि क्या मॉरिसन ने मंत्री रहते हुए किसी को ग़लत तरीके से फायदा पहुंचाया? इस सवाल की जांच बाकी है. हालांकि, इतना तो तय है कि ये ऐपिसोड स्कॉट मॉरिसन के पोलिटिकल कैरियर का हिसाब कर सकता है.
भारत की आज़ादी के मौके पर विदेशी मीडिया ने क्या छापा था?






















