मार्च 2020 से पहले बहुत कम लोग थे जिन्होंने तब्लीगी जमात का नाम सुना था. लेकिन दिल्ली के निज़ामुद्दीन मर्कज़ पर हुए कार्यक्रम में जब एक के बाद एक कोरोना संक्रमित मिलने लगे तो ये नाम घर-घर तक पहुंच गया. जो तब्लीगी जमात का नाम पहले से जानते भी थे, उनके लिए भी उसका मतलब बिलकुल बदल गया. बात एक कोविड हॉटस्पॉट से चली, लेकिन बतंगड़ होकर मुसलमानों के खिलाफ एक वीभत्स प्रोपेगेंडा में बदल गई. तब से लेकर अब तक कोरोना संक्रमण, उसके फैलने के तरीके और सरकार द्वारा उठाए गए, या नहीं उठाए गए कदमों पर खूब बात हो चुकी है. लेकिन इन सारी बातों के आलोक में, कभी इस बात पर अफसोस नहीं जताया गया कि कैसे एक धर्म को एक जानबूझकर एक महामारी जनने के लिए ज़िम्मेदार बताने की कोशिश हुई. ये देश बड़े आराम से हाथ झाड़कर आगे बढ़ गया, जैसे हमसे कोई चूक हुई ही नहीं. जमात मामले में आरोपी एक के बाद अदालतों से बरी होते रहे और अदालत एजेंसियों को लताड़ लगाती रही. लेकिन सुनने की फुर्सत किसे है. लेकिन अब एक बार फिर हम जमात का नाम सुन रहे हैं. एक और इल्ज़ाम के साथ. खबर है कि सउदी अरब ने तब्लीगी जमात को गेट ऑफ टेरर बताकर बैन कर दिया है. भारत में इसकी आलोचना भी हुई है और तारीफ भी. फिर एक किस्म का कंफ्यूज़न भी है कि जो बैन हुआ है और जो अपने यहां है, वो अलग अलग संस्थाएं हैं. ये सारा कंफ्यूज़न दूर करेंगे. तबलीगी जमात, बैन, आतंकवाद. इस विषय पर आज हम बात करेंगे. और ये विषय सऊदी अरब से आया है. सऊदी अरब ने तबलीगी़ ग्रुप पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया और इसे आतंक के दरवाज़ों में से एक कहा. यानी आतंकी संगठन कहा. जिसके बाद हमारे मीडिया में भी खबरें चलने लगी कि तबलीगी जमात को सऊदी अरब ने बैन कर दिया है. देश के कई धार्मिक संगठनों ने सऊदी अरब के खिलाफ ज़ुबानी मोर्चा खोल दिया है. लेकिन तबलीगी जमात से जुड़े लोगों ने कहा कि हम वो नहीं, जिसे सऊदी अरब ने आतंकी कहा है. तो फिर सऊदी अरब ने कौनसे तबलीगी ग्रुप को आतंकी कहा है. क्या वाकई जिस तबलीगी जमात को सऊदी अरब ने बैन किया है, वो भारत वाले तबलीगी जमात या उससे जुड़ा कोई संगठन नहीं है. और दूसरी बात ये कि क्या तबलीगी ग्रुप वाकई आतंक के दरवाज़ों में से एक है- जैसा सऊदी अरब ने कहा है. तो पहले तो बात ये कि सऊदी अरब में असल में हुआ क्या है? सऊदी अरब में एक मिनिस्ट्री ऑफ इस्लामिक अफेयर्स होती है, यानी इस्लामिक मामलों का मंत्रालय. ये ही मंत्रालय वहां की सभी मस्जिदों या बाकी दीनी इदारों पर नियंत्रण रखता है. तो 6 दिसंबर को इस मंत्रालय की तरफ से सभी मस्जिदों के मौलवियों और इमामों के लिए एक आदेश निकाला गया. जो मंत्रालय के ट्विटर हैंडल पर भी आया. क्या लिखा था इसमें – कि इस्लामिक मामलों के मंत्री डॉ अब्दुल लतीफ अल अलशेख की तरफ से सारी मस्जिदों के इमाम या मौलवियों को कुछ निर्देश दिए थे जो अगले जुम्मे को खुत्बे में यानी शुक्रवार को नमाज़ से पहले जो धर्मोपदेश मस्जिदों में दिए जाते हैं, उसमें शामिल करना था. और निर्देश ये थे कि तबलीगी और दावा ग्रुप जिन्हें अल अहबाब कहना है. इसको लेकर लोगों को चेतावनी देनी है. क्या चेतावनी देनी है- इसके भी कुछ बिंदु ट्वीट में बताए गए.
- ऐलान हो कि ये ग्रुप मिस गाइडडे है, भ्रमित है और खतरनाक है. ये आतंक के दरवाज़ों में से एक है, चाहे ये खुद से कुछ भी दावा करें.
- दूसरा बिंदु- उनकी बड़ी गलतियों का ज़िक्र किया जाए.
- समाज से उनको क्या खतरा है, ये बताया जाए.
- और ये बताया जाए कि तबलीगी और दावा जैसे ग्रुप सऊदी अरब किंगडम में प्रतिबंधित हैं.
तो ये निर्देश सऊदी अरब के इस्लामिक मंत्री की तरफ से मस्जिदों को दिए गए कि वो जुम्मे के दिन मस्जिदों से ये बातें बताएं. अब ये खबर सऊदी अरब से चलकर भारत तक आई. आने में तीन चार दिन लग गए. भारत में कल से ये खबर अखबारों में छपना शुरू हुई कि वहां तबलीग़ी जमात को बैन कर दिया है. आपने सऊदी अरब के बयान में सुना होगा कि उन्होंने तबलीगी को अल अहबाब ग्रुप भी कहा है. हालांकि जब दूसरी बार तबलीगी का ज़िक्र किया तो अल अहबाब साथ नहीं लिखा. अब भारत के तबलीगी जमात ले जुड़े धर्मगुरु, नेता कह रहे हैं कि असल में सऊदी अरब ने अल अहबाब ग्रुप को बैन किया है. अल अहबाब अफ्रीका का कोई कोई गुट है. जिसका तबलीगी जमात से कोई लेना देना नहीं है. इस मसले पर ज़फर सरेशवाला ने हमें बताया –
लगभग 35 साल से एक संगठन के तौर पर ये सऊदी अरब में तबलीगी जमात तो है ही नहीं. मसला यह है कि हर मूवमेंट अपने आप को तबलीग कहती है. तबलीग का मतलब प्रोपगेशन होता है. वहां अल अहबाब नाम के संगठन में बैन लगाया है.
अब ये अल अहबाब ग्रुप क्या है. इसके बारे में हमने गूगल से जानकारी जुटाने की कोशिश की. अहबाब का मतलब तो दोस्ती होता है. लेकिन अलबाब जैसे किसी ग्रुप की जानकारी हमें किसी क्रेडिबल सोर्स से नहीं मिली. सऊदी अरब की तरफ से भी कोई स्पीष्टीकरण या ऐसा कोई बयान इस मसले पर नहीं आया. हालांकि सऊदी अरब के बयान की भारत के इस्लामिक संगठनों ने मज़मत भी शुरू कर दी है. भारत के इस्लामिक स्कॉलर और धर्म गुरू कह रहे हैं कि इसके पीछे सऊदी अरब की राजनीति है. सऊदी अरब वहाबी इस्लाम को बढ़ावा देता है. इसलिए सूफी किस्म के इस्लाम को सऊदी खतरा मानता है. और इसीलिए उनको आतंकी कह देता है.
अब आते हैं इस बात पर कि असल में तबलीगी जमात है क्या?
आपने मिशनरी शब्द तो सुना ही होगा. मिशनरी शब्द का नाता ईसाई धर्म के साथ है. मिशन होता है ‘धर्म का प्रचार’. तबलीगी का मतलब भी यही होता है. तबलीग़ी का मतलब है ‘अल्लाह की कही बातों का प्रचार करने वाला’. वहीं जमात या ‘जमाअत’ का अर्थ है समूह, झुंड, क़तार. यानी तबलीग़ी जमात का मतलब हुआ अल्लाह के संदेशों का प्रचार करने वाला समूह. जब भारत में ब्रिटिश राज था, उस समय तबलीग़ी जमात की नींव पड़ी. ब्रिटिश राज के पहले देश में मुग़ल थे. अब जैसा लिखा मिलता है, मुग़लों के समय बहुतेरे लोगों ने इस्लाम क़ुबूल किया. लेकिन मुग़लों के जाने के बाद जब ब्रिटिश आए तो उसी समय आर्य समाजियों का आंदोलन शुरू हुआ. उन्होंने कई मुस्लिमों का तथाकथित शुद्धिकरण करवाना और हिंदू धर्म में परिवर्तन कराना शुरू किया. इसको रोकने, या कहें कि मुसलमानों को इस्लाम में रोके रखने के लिए तबलीग़ी जमात की ज़रूरत पड़ी. 1927 का साल था. दिल्ली के निज़ामुद्दीन में मौजूद एक मस्जिद में मौलाना इलियास कांधलवी ने तबलीग़ी जमात का गठन किया. उद्देश्य? मुसलमानों को अपने धर्म में बनाए रखना और इस्लाम का प्रचार. तभी से दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाका तबलीग़ी जमात का केंद्र भी है. कहते हैं कि अपने गठन के बाद के कुछ समय तक तबलीग़ी जमात शांत रहा. गतिविधि कम रही. लेकिन साल 1941 आते-आते एक बार फिर से तबलीग़ी जमात को जमाया गया. मौलाना इलियास इसे दिल्ली से उठाकर हरियाणा के मेवात ले गए. वहां 25 हज़ार लोगों के साथ मीटिंग हुई और बस जम गया मामला. साल 1946 तक आते-आते देश के कई हिस्सों में तबलीग़ी जमात संगठन फैल चुका था. साल 1947 में भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश का कालांतर में जन्म हुआ. और साल 1947 से ही तबलीग़ी जमात का भारत के बाहर भी ठिकाना बनने लगा. इसके बाद से तबलीग़ी जमात दक्षिण एशिया के दूसरे देशों के साथ-साथ यूरोप और अन्य एशियाई देशों में भी फैलने लगा. खाड़ी देशों तक गया. और यूं ही देश दुनिया के इलाक़ों से तबलीग़ी जमात के लिए पैसा आने लगा. चंदे के रूप में. और इसी चंदे से तबलीग़ी जमात का ख़र्च चलता है. हर साल इज़्तेमा, यानी सालाना जलसा, का भी आयोजन होता है. इसमें लाखों के संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग और इस्लामिक स्कॉलर शिरकत करते हैं. और ‘बेहतर इंसान’ बनने की हिदायत और सीख के साथ विदा होते हैं. ज़फर सरेशवाला ने हमें बताया –
तबलीग जमात एक मूवमेंट है जो 1920 में मौलाना इलियास ने शुरू किया. यह एक देवबंदी वैचारिक प्रक्रिया है. इसका देवबंद से सीधा सम्बन्ध नहीं है. तबलीग जमात का काम कनवर्ज़न करना नहीं है.
तो तबलीगी जमात ये है मोटा मोटा. दुनिया के डेढ सौ से ज्यादा देशों में ये संगठन फैला है. आतंकी घटनाओं में शामिल होने का सीधे सीधे कोई मामला हमें ज्ञात नहीं है.