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यूरेनियम से कैसे होता है न्यूक्लियर ब्लास्ट? 5% पर विकास, 90% पर विनाश ही विनाश!

Iran US tension: ईरान के पास 60% संवर्धित 400 किलो यूरेनियम है. अमेरिका का दावा है कि यही स्टॉक ईरान को परमाणु बम बनाने की दहलीज पर ले आया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रंप इसे जब्त करने के लिए ईरान के अंदर सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहे हैं.

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दुनिया की नींद उड़ाने वाला ‘परमाणु बोरा’ और ट्रंप का खतरनाक प्लान

मिडिल ईस्ट की रेत में एक बार फिर बारूद की गंध फैल रही है. और इस बार कहानी किसी मिसाइल, किसी ड्रोन या किसी धमकी वाले भाषण की नहीं है. कहानी है एक ऐसी चीज की, जो दिखती तो धूल जैसी है, लेकिन अगर गलत हाथों में चली जाए तो दुनिया के बड़े-बड़े शहरों को राख बना सकती है.

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नाम है, 400 किलो यूरेनियम.

अब आप कहेंगे, 400 किलो तो कोई बहुत बड़ा वजन नहीं हुआ. एक ट्रक में आ जाएगा. लेकिन जनाब, मामला वजन का नहीं है. मामला उस खतरनाक ‘क्वालिटी’ का है जो इस यूरेनियम में मौजूद है. ये कोई साधारण यूरेनियम नहीं. 

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समाचार एजेंसी रॉयटर्स का दावा है कि ये 60% तक संवर्धित यूरेनियम है. जिसे परमाणु दुनिया की भाषा में ‘बॉर्डर लाइन’ कहते हैं. आसान भाषा में कहें तो न्यूक्लियर बॉम्ब बनाने में "बस अब आखिरी सीढ़ी बाकी है."

और यही आखिरी सीढ़ी अमेरिका की नींद उड़ाए बैठी है.

30 मार्च 2026 को वॉल स्ट्रीट जर्नल में छपी ताजा रिपोर्ट्स ने हड़कंप मचा दिया है. रिपोर्ट कहती है कि डॉनल्ड ट्रंप ईरान के अंदर घुसकर इस यूरेनियम को जब्त करने के लिए बड़े सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहे हैं. यानी सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका सोच रहा है कि अगर बात से नहीं मानता, तो ईरान के घर में घुसकर उसका परमाणु सामान उठा लाए.

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अब सवाल ये है कि अमेरिका इतना बड़ा रिस्क क्यों ले रहा है? ईरान इसे छुपाकर क्यों बैठा है? और दुनिया क्यों डर रही है कि ये 400 किलो यूरेनियम कल सुबह होते-होते 8-10 परमाणु बमों का टिकट बन सकता है?

चलिए, इसी पूरे खेल को लल्लनटॉप स्टाइल में खोलते हैं. बिना भारी-भरकम भाषा, बिना साइंटिस्ट वाली भाषा. सीधी बात, साफ हिसाब.

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ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अमेरिका की नजर (फोटो-AP)
सबसे पहले समझिए, ये 400 किलो यूरेनियम है क्या?

यूरेनियम कोई रेडियोएक्टिव पत्थर जैसा पदार्थ है. जिसे जब सही तरीके से प्रोसेस किया जाए, तो उससे परमाणु बिजली भी बन सकती है और परमाणु बम भी.

ईरान के पास जो यूरेनियम है, वो 60% तक संवर्धित (Enriched) बताया जा रहा है.

मतलब ये कि यूरेनियम के अंदर जो असली काम का तत्व होता है, U-235, उसकी मात्रा 60% तक बढ़ा दी गई है. जबकि प्राकृतिक यूरेनियम में ये सिर्फ 0.7% के आसपास होता है.

अब आप समझिए, ये ऐसा है जैसे दूध में मलाई बढ़ाते-बढ़ाते आप उसे मक्खन के करीब पहुंचा दें. फिर उसे घी बनाना बस आखिरी स्टेप रह जाता है.

यूरेनियम का असली खेल क्या है? प्रतिशत का खेल

यहां सबसे जरूरी चीज है Enrichment Level यानी संवर्धन स्तर.

संवर्धन स्तर और उपयोग का सीधा मतलब

संवर्धन स्तरउपयोग
0.7%प्राकृतिक यूरेनियम
3% से 5%परमाणु बिजली घरों का ईंधन
20%मेडिकल और रिसर्च
60%खतरनाक बॉर्डर लाइन
90%+परमाणु बम बनाने लायक

अब इसमें सबसे डरावनी बात ये है कि 60% का कोई बड़ा नागरिक उपयोग नहीं होता.  यानी अगर कोई देश 60% तक पहुंच गया, तो दुनिया को लगेगा कि भाईसाहब कुछ तो गड़बड़ है.

400 किलो यूरेनियम से अमेरिका को डर क्यों लग रहा है?

अब असली सवाल यही है. अमेरिका आखिर इतना टेंशन में क्यों है? क्योंकि 60% संवर्धित 400 किलो यूरेनियम का मतलब ये है कि ईरान ने परमाणु हथियार की तरफ जाने वाला रास्ता लगभग आधा नहीं, बल्कि 90% तय कर लिया है.

बम का गणित

  • 60% से 90% तक ले जाना आसान है
  • 90% होने के बाद हथियार बनाने की प्रक्रिया तेज हो जाती है
  • 400 किलो स्टॉक से अनुमानतः 8 से 10 परमाणु बम बनाए जा सकते हैं

और यही वजह है कि अमेरिका को लग रहा है कि ये "अभी नहीं तो कभी नहीं" वाला समय है.

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ईरान के पास यूरेनियम का भंडार (फोटो- रॉयटर्स)

60% से 90% तक जाना इतना खतरनाक क्यों है?

क्योंकि परमाणु दुनिया का नियम बड़ा सीधा है.

  • 0.7% से 20% तक जाना बहुत कठिन और समय लेने वाला काम है.
  • 20% से 60% तक जाना भी मेहनत वाला काम है.
  • लेकिन 60% से 90% तक पहुंचना ऐसा है जैसे पहाड़ की चढ़ाई पूरी हो गई और अब बस ढलान पर दौड़ना बाकी है.

यही कारण है कि दुनिया में 60% को एक तरह से "Pre-Weapon Stage" माना जाता है.

सेंट्रीफ्यूज क्या होता है? आसान भाषा में समझिए

यूरेनियम को संवर्धित करने के लिए एक मशीन इस्तेमाल होती है, जिसे कहते हैं Centrifuge. ये मशीन एक लंबे बेलन जैसी होती है और इतनी तेज घूमती है कि कई बार इसकी रफ्तार ध्वनि की गति के आसपास बताई जाती है.

ये मशीन करती क्या है?

  • यूरेनियम को गैस (UF6) बनाकर इस मशीन में डाला जाता है.
  • घूमने पर भारी तत्व U-238 बाहर की तरफ चला जाता है.
  • हल्का और जरूरी तत्व U-235 अंदर की तरफ रह जाता है.

फिर वही हल्का तत्व निकालकर दोबारा मशीन में डाला जाता है. ऐसे बार-बार करने पर प्रतिशत बढ़ता जाता है.

‘कैस्केड’ क्या है? मशीनों की लाइन

एक सेंट्रीफ्यूज अकेला कुछ नहीं कर सकता. इसके लिए सैकड़ों या हजारों मशीनों को जोड़कर एक सिस्टम बनता है जिसे कहते हैं Cascade. जैसे एक कारखाने में एक बेल्ट पर सामान चलता है, वैसे ही यूरेनियम अलग-अलग मशीनों से गुजरता है और हर चरण में थोड़ा और शुद्ध होता जाता है.

और जब किसी देश के पास आधुनिक कैस्केड सिस्टम हो, तो वह 60% से 90% तक तेजी से पहुंच सकता है.

ईरान के पास IR-6 और IR-9 मशीनें क्यों खतरनाक हैं?

अब कहानी में आता है ईरान का असली हथियार. मिसाइल नहीं, बल्कि मशीन. ईरान के पास दो खास किस्म के सेंट्रीफ्यूज बताए जाते हैं-

IR-6

  • पुरानी IR-1 मशीनों से करीब 10 गुना तेज
  • कम जगह में फिट हो जाती है
  • छोटे बंकर में भी लग सकती है

IR-9

  • सबसे एडवांस और सुपर-फास्ट
  • दावा है कि पुरानी मशीनों से 50 गुना ज्यादा ताकतवर
  • अगर ईरान के पास बड़ी संख्या में IR-9 हुईं, तो enrichment की स्पीड कई गुना बढ़ सकती है
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ईरान के सेफ्टी फ्यूजन डिवाइस (फोटो- रॉयटर्स)

मतलब ये कि ईरान को अब बड़े-बड़े प्लांट की जरूरत नहीं.  वह एक छोटे से गुप्त कमरे में भी परमाणु रास्ता तेज कर सकता है.

2025 की बमबारी के बाद भी यूरेनियम बचा कैसे?

2025 में अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई परमाणु ठिकानों पर हमला किया था. लेकिन रिपोर्ट्स कहती हैं कि 400 किलो यूरेनियम का स्टॉक नष्ट नहीं हुआ. 

दावा है कि ईरान ने हमले से पहले ही इसे- नतान्ज़ (Natanz), इस्फहान (Isfahan) या फोर्डो (Fordo) जैसे इलाकों में गहरे बंकरों में छिपा दिया था. और ये बंकर ऐसे हैं कि ऊपर से बम गिराओ तो ऊपर की इमारत टूट जाएगी, लेकिन नीचे का सामान सुरक्षित रह सकता है.

ये यूरेनियम रखा कहां है? यही सबसे बड़ा रहस्य

ईरान ने यूरेनियम को लेकर सबसे बड़ी चाल यही चली है कि वह इसे एक जगह नहीं रख रहा.

रणनीति

  • कई हिस्सों में बांटना
  • अलग-अलग सुरंगों में छिपाना
  • सुरक्षा सेंसर लगाना
  • इलेक्ट्रॉनिक साइलेंस रखना

यानी दुनिया के पास सैटेलाइट है, लेकिन सैटेलाइट भी हर सुरंग के अंदर नहीं देख सकता. और यही बात अमेरिका को परेशान कर रही है.

अमेरिका क्या चाहता है? दो ही रास्ते

अमेरिका का मैसेज काफी साफ है. या तो ईरान ये स्टॉक खुद सौंप दे.  या फिर अमेरिका खुद इसे उठाकर ले जाए. अब ये सुनने में जितना आसान लगता है, असल में उतना ही खतरनाक है.

क्योंकि अगर अमेरिका ईरान के अंदर घुसता है, तो यह सिर्फ एक ऑपरेशन नहीं रहेगा. यह सीधी जंग की शुरुआत हो सकती है.

ट्रंप के दिमाग में क्या चल रहा है?

डॉनल्ड ट्रंप की राजनीति का पैटर्न दुनिया देख चुकी है. उनकी नीति अक्सर यही रही है कि धमकी दो, दबाव बढ़ाओ और जरूरत पड़े तो सीधे हमला कर दो.

अब अगर रिपोर्ट्स सही हैं कि ट्रंप एक बड़े ऑपरेशन पर विचार कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि अमेरिका "डील" की जगह "एक्शन" वाला रास्ता सोच रहा है.

लेकिन ट्रंप यह भी जानते हैं कि युद्ध में जाना आसान है, बाहर निकलना मुश्किल. इसलिए अमेरिका अभी दो नावों पर पैर रखे बैठा है.

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ईरान का यूरेनियम भंडार (फोटो- रॉयटर्स)
ईरान का जवाब क्या है? वही पुराना, लेकिन ज्यादा सख्त

ईरान की तरफ से भी संदेश साफ है. वह कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण है.  वह यह भी कहता है कि उसे ऊर्जा और रिसर्च के लिए enrichment चाहिए.

लेकिन अमेरिका और इजरायल का जवाब है कि 60% enrichment का कोई नागरिक फायदा नहीं. यानी ईरान की बात पर भरोसा करना खुद को धोखा देना है.

अमेरिका के लिए ऑपरेशन इतना मुश्किल क्यों है?

अगर अमेरिका सच में 400 किलो यूरेनियम उठाने के लिए ऑपरेशन करता है, तो यह किसी फिल्म का सीन नहीं होगा. यह कई परतों वाला खतरा होगा.

पहली दिक्कत: यूरेनियम उठाना कोई सूटकेस उठाना नहीं है. यूरेनियम को रखने के लिए भारी कंटेनर होते हैं. रेडिएशन से बचाने के लिए मोटी शील्डिंग चाहिए. इन कंटेनरों का वजन कई टन हो सकता है.

मतलब सैनिक आए, यूरेनियम उठाया और हेलिकॉप्टर में बैठकर निकल गए. ऐसा नहीं होता.

दूसरी दिक्कत: समय लगेगा. अगर यूरेनियम मलबे के नीचे है या सुरंग में है, तो उसे निकालने में कई दिन लग सकते हैं. और इतने दिन ईरान के अंदर टिकना मतलब अपने सैनिकों को खतरे में डालना.

तीसरी दिक्कत: ईरान का सैन्य जवाब भी अमेरिका को झेलना पड़ेगा और वो भी लंबे समय के लिए.

ईरान के पास:

  • मिसाइलें
  • ड्रोन
  • मिलिशिया नेटवर्क
  • समुद्री ताकत

और सबसे बड़ी बात, ईरान के पास "जवाबी हमले" की भूख भी है.

ईरान का डिफेंस सिस्टम: किले की सात परतें

ईरान ने अपने परमाणु ठिकानों को बचाने के लिए तकनीक और भूगोल दोनों को हथियार बना लिया है.

S-400 और बावर-373

ईरान के पास रूस का S-400 सिस्टम होने की चर्चाएं हैं.  और उसका अपना सिस्टम है Bavar-373. ये सिस्टम लंबी दूरी तक मिसाइल और विमान को ट्रैक कर सकते हैं. अगर अमेरिका हवाई हमला करता है, तो उसे सीधा रास्ता नहीं मिलेगा.

फोर्डो और नतान्ज़: पहाड़ों के अंदर छिपी फैक्ट्री

ईरान के कुछ परमाणु ठिकाने पहाड़ों के अंदर हैं.

फोर्डो: यह ठिकाना 250 से 300 फीट नीचे बताया जाता है.

नतान्ज़: यहां भी सुरंगों का नेटवर्क है.

अब अमेरिका के पास GBU-57 जैसे बंकर बस्टर बम हैं. लेकिन अगर ठिकाना उससे भी ज्यादा गहरा है, तो बम का असर सीमित रह जाएगा. मतलब ये कि अमेरिका के लिए "बम मारकर खत्म कर देना" भी आसान नहीं.

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ईरान के परमाणु कार्यक्रम से डरा अमेरिका (फोटो- रॉयटर्स)
ईरान का साइबर डिफेंस: Stuxnet का बदला

2010 में Stuxnet वायरस ने ईरान के सेंट्रीफ्यूज खराब कर दिए थे. ये साइबर वॉर का सबसे चर्चित उदाहरण है.

उसके बाद ईरान ने-

  • नेटवर्क को एयर-गैपिंग किया
  • अलग इन्ट्रानेट सिस्टम बनाया
  • सुरक्षा सेंसर बढ़ाए
  • बाहरी कनेक्शन कम किए

यानी अब साइबर हमला भी उतना आसान नहीं.

ये भी पढ़ें: ट्रंप भी हुए मुरीद! पाबंदियों के पिंजरे में रहकर ईरान ने कैसे बनाए दुनिया को दहलाने वाले 'सुपर मिसाइल'?

मोसाद के पुराने ऑपरेशन और ईरान की डरावनी सीख

ईरान की सुरक्षा व्यवस्था अचानक इतनी मजबूत नहीं हुई. इसके पीछे इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का डर है.

2018: तेहरान परमाणु दस्तावेज चोरी
मोसाद ने 50,000 पन्नों के दस्तावेज और सीडी चोरी कर लीं.

2020: मोहसिन फखरीजादेह की हत्या
AI नियंत्रित मशीन गन से हमला, इतना सटीक कि पत्नी को खरोंच तक नहीं आई.

2010-2021: साइबर और अंदरूनी हमले
नतान्ज़ में धमाके, बिजली सप्लाई ठप, मशीनें खराब.

इन घटनाओं ने ईरान को सिखा दिया कि दुश्मन सिर्फ मिसाइल से नहीं आता, वह लैपटॉप और ट्रक में भी आ सकता है.

अमेरिका अगर घुसा तो क्या होगा? फुल-स्केल वॉर का खतरा

अगर अमेरिकी सैनिक ईरान की सीमा के अंदर घुसते हैं, तो ईरान इसे सीधा हमला मानेगा. और जवाब में वह-

  • इराक और सीरिया में अमेरिकी बेस पर हमला कर सकता है
  • इजरायल पर मिसाइल अटैक तेज करा सकता है
  • खाड़ी में तेल टैंकर निशाना बना सकता है
  • होर्मुज जलडमरूमध्य पर दबाव बढ़ा सकता है

यानी एक ऑपरेशन से पूरी दुनिया की सप्लाई चेन हिल सकती है.

होर्मुज जलडमरूमध्य: दुनिया का तेल वाला ‘गला’

दुनिया का करीब 20% तेल Strait of Hormuz से गुजरता है. ये समुद्री रास्ता इतना संकरा है कि अगर ईरान वहां- माइन बिछा दे, टैंकर रोक दे, मिसाइल या ड्रोन से धमकी दे तो तेल का बाजार पागल हो जाएगा. 

पिछले कुछ दिनों में दुनिया ये मंजर देख भी रही है. पूरे विश्व में तेल महंगा हो गा, दुनिया में महंगाई का भूत फिर जाग जाएगा. 

तेल महंगा हुआ तो दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

तेल महंगा होना सिर्फ पेट्रोल-डीजल महंगा होना नहीं है. तेल महंगा मतलब,

  • ट्रांसपोर्ट महंगा
  • सामान ढुलाई महंगी
  • बिजली उत्पादन महंगा
  • प्लास्टिक, केमिकल और खाद महंगी
  • खाना महंगा
  • महंगाई बढ़ी
  • ब्याज दरें बढ़ीं
  • बाजार गिरा

यानी एक तरफ बम की चर्चा और दूसरी तरफ आम आदमी की थाली पर असर.

इजरायल का रोल: क्यों उसका धैर्य खत्म हो रहा है?

इजरायल की चिंता सीधे उसकी सुरक्षा से जुड़ी है. इजरायल मानता है कि अगर ईरान के पास परमाणु बम आ गया, तो उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.

इजरायल ने पहले भी दिखाया है कि वो सीरिया में हमला कर सकता है, इराक में रिएक्टर उड़ा सकता है और जरूरत पड़े तो अकेले भी कदम उठा सकता है

इसलिए अमेरिका पर भी दबाव है कि वह ईरान को रोकने के लिए निर्णायक कदम उठाए.

पाकिस्तान, तुर्की, मिस्र क्यों बीच में कूद रहे हैं?

कुछ देश इस मामले में बीच-बचाव इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि अगर युद्ध हुआ तो आग सबको जला देगी. पाकिस्तान को डर है कि क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी.

तुर्की को डर है कि व्यापार और ऊर्जा सप्लाई प्रभावित होगी. जबकि मिस्र को डर है कि मिडिल ईस्ट फिर से टूटेगा. लिहाजा इन देशों की कोशिश यही है कि ईरान किसी समझौते में यूरेनियम सौंप दे या IAEA को जांच की इजाजत दे.

IAEA का रोल: दुनिया का परमाणु चौकीदार

IAEA यानी International Atomic Energy Agency. यह संस्था परमाणु कार्यक्रमों की निगरानी करती है. लेकिन समस्या यह है कि ईरान कई बार निरीक्षण सीमित कर चुका है. कई जगहों पर कैमरे बंद किए गए और enrichment की रिपोर्टिंग पर विवाद हुआ.

इसलिए दुनिया को ईरान की बात पर भरोसा नहीं हो रहा.

‘ब्रेकआउट टाइम’ क्या है और क्यों सब डर रहे हैं?

ब्रेकआउट टाइम मतलब वो समय, जिसमें कोई देश परमाणु हथियार बनाने लायक यूरेनियम तैयार कर सकता है. पहले ईरान का ब्रेकआउट टाइम महीनों में माना जाता था.

लेकिन 60% enrichment के बाद यह कुछ हफ्तों या उससे कम में आ सकता है. यानी दुनिया को डर है कि ईरान एक रात चुपचाप enrichment बढ़ाएगा और सुबह तक कह देगा कि हमारे पास बम है.

और उसके बाद उसे रोकना लगभग असंभव हो जाएगा.

ये भी पढ़ें: परमाणु हथियार से पहले दुनिया खत्म कर देंगे ये हथियार, खौफ के मारे लगा है बैन

अमेरिका की असली रणनीति क्या है? यूरेनियम नहीं, संदेश

अमेरिका सिर्फ यूरेनियम नहीं रोकना चाहता. अमेरिका असल में दुनिया को संदेश देना चाहता है कि,

"अगर कोई देश परमाणु हथियार की तरफ बढ़ेगा, तो अमेरिका उसे बीच में रोक देगा."

ये संदेश सिर्फ ईरान के लिए नहीं. यह उत्तर कोरिया, रूस के सहयोगी देशों और भविष्य के किसी परमाणु महत्वाकांक्षी देश के लिए भी है.

ईरान का मकसद क्या है? हथियार या डर की ढाल?

ईरान बार-बार कहता है कि वह बम नहीं बना रहा. लेकिन दुनिया मानती है कि ईरान की नीति हो सकती है कि "बम बनाना नहीं, बम के करीब रहना" 

अब आप पूछेंगे- ऐसा क्यों? क्योंकि अगर ईरान के पास बम नहीं भी हो, लेकिन बम बनाने की क्षमता हो, तो वह-

  • दुश्मनों को डराकर रख सकता है
  • बातचीत में मजबूत स्थिति बना सकता है
  • प्रतिबंध हटवाने के लिए दबाव बना सकता है

मतलब परमाणु क्षमता ईरान के लिए हथियार कम, राजनीति ज्यादा है.

अमेरिका ने जमीनी हमला किया तो ईरान का जवाब कैसे आएगा?

ईरान का जवाब सीधे अमेरिका पर नहीं भी हो सकता. वह "प्रॉक्सी वॉर" में माहिर है. संभावित जवाब के तौर पर

  • हिजबुल्लाह के जरिए इजरायल पर हमला
  • यमन के हूती विद्रोहियों से समुद्री हमले
  • इराक में अमेरिकी बेस पर रॉकेट
  • ड्रोन अटैक और साइबर अटैक

ये सारे तरीके वो पिछले कुछ दिनों से आजमा भी रहा है. मगर जमीनी हमले की सूरत में अमेरिका को हर मोर्चे पर और ज्यादा आग झेलनी पड़ सकती है.

इस पूरे खेल में रूस और चीन कहां हैं?

रूस और चीन दोनों अमेरिका के विरोधी खेमे में हैं. और दोनों का फायदा इसी में है कि अमेरिका मिडिल ईस्ट में उलझा रहे.

रूस चाहता है कि तेल महंगा हो ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को फायदा मिले. जबकि चीन, ईरान के साथ ऊर्जा और व्यापार के रिश्ते रखता है. वो 
अमेरिका को कमजोर दिखाना चाहता है. लेकिन युद्ध भी नहीं चाहता क्योंकि सप्लाई चेन हिल जाएगी.

यानी दोनों खेल को आगे बढ़ने भी देंगे और पूरी तरह टूटने भी नहीं देंगे. एक तरह से "संतुलित आग" की राजनीति.

भारत पर असर: भारत की रसोई से लेकर शेयर बाजार तक

अब आते हैं अपने देश पर. भारत की हालत इस मामले में वैसी है जैसे शादी में दो पक्ष लड़ रहे हों और दूल्हा बीच में फंसा हो. भारत पहले ही मिडिल ईस्ट संकट की वजह से कई बुरे असर झेल रहा है.

पहला असर: पेट्रोल-डीजल और महंगाई

भारत 85% तेल आयात करता है. होर्मुज में तनाव बढ़ने के बाद कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुका है. LPG सिलेंडर की कमी से देश जूझ रहा है.

लिहाजा जंग का भारत के लिए मतलब -

  • पेट्रोल-डीजल महंगा
  • ट्रांसपोर्ट महंगा
  • सब्जी-दाल महंगी
  • महंगाई बढ़ी

कुल मिलाकर अगर जमीनी जंग शुरु हुई तो भारत सरकार पर और दबाव बढ़ेगा.

दूसरा असर: चाबहार पोर्ट का भविष्य

भारत ने ईरान में चाबहार पोर्ट में निवेश किया है. यह पोर्ट भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया से जोड़ता है, पाकिस्तान को बायपास करके.

युद्ध के चलते पहले ही पोर्ट प्रोजेक्ट ठप हैं. व्यापार रास्ता बाधित है और निवेश जोखिम में हैं. जाहिर सी बात है जमीनी जंग मुश्किलें और बढा़एंगी.

तीसरा असर: प्रवासी भारतीय

खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. अगर युद्ध बढ़ा तो उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ेगी. साथ ही रेमिटेंस (विदेशों से पैसों का ट्रांसफर) प्रभावित होगा. जिसका सीधा बुरा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.

भारत की कूटनीति: इधर अमेरिका, उधर ईरान

भारत के सामने सबसे बड़ा संकट है कि वह किसके साथ खड़ा हो. एक तरफ अमेरिका और इजरायल हैं जो हमारे बड़े ट्रेड पार्टनर और डिफेंस टेक्नोलॉजी का बड़ा स्रोत हैं.

दूसरी तरफ ईरान है जो भारत का पुराना दोस्त है. ईरान ना सिर्फ हमारा रणनीतिक साझेदार है बल्कि चाबहार प्रोजेक्ट का पार्टनर भी है.

मतलब भारत को वही करना पड़ेगा जो वह अक्सर करता है. बैलेंस बनाना, बयान संभालना, और बिना दुश्मनी लिए अपना हित निकालना.

क्या भारत मध्यस्थ बन सकता है?

भारत की खासियत यही है कि उसके रिश्ते वॉशिंगटन और तेहरान दोनों से हैं. भारत मध्यस्थता की कोशिश कर सकता है क्योंकि:

  • भारत के पास भरोसे की डिप्लोमैटिक छवि है
  • भारत ऊर्जा और व्यापार के कारण स्थिरता चाहता है
  • भारत युद्ध नहीं, बातचीत की नीति को पसंद करता है

लेकिन सच्चाई यह भी है कि अमेरिका और ईरान दोनों जिद्दी हैं. इसलिए भारत का रोल सीमित हो सकता है, लेकिन कोशिश जरूरी है.

असल में लड़ाई यूरेनियम की नहीं, कंट्रोल की है

अब जरा इस कहानी की असली परत समझिए. अमेरिका की लड़ाई सिर्फ यूरेनियम से नहीं है. अमेरिका की लड़ाई है कि मिडिल ईस्ट में कौन ताकतवर रहेगा.

ईरान की जिद सिर्फ परमाणु ऊर्जा नहीं है. ईरान की जिद है कि वह अमेरिका के दबाव में नहीं झुकेगा.

और इजरायल की चिंता सिर्फ सुरक्षा नहीं है. इजरायल की चिंता है कि ईरान अगर परमाणु ताकत बन गया, तो मिडिल ईस्ट का पावर बैलेंस उलट जाएगा.

मतलब ये जो 400 किलो यूरेनियम है, यह असल में "400 किलो राजनीति" है.

अमेरिका ऑपरेशन करता है तो क्या यह इतिहास का सबसे बड़ा स्पेशल फोर्सेज मिशन होगा?

रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो ऐसी काफी संभावना है. क्योंकि ईरान के न्यूक्लियर साइट्स एक भारी टारगेट हैं. ये लोकेशन अंडरग्राउंड हैं. यहां की सुरक्षा परतें बहुत मजबूत हैं. 

ऐसे में ऑपरेशन को अंजाम देने में अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस को समय ज्यादा लगेगा और एक्सट्रैक्शन भी बेहद मुश्किल होगा.

यह ऑपरेशन सिर्फ सैनिक भेजने का मामला नहीं होगा. इसमें- एयर सपोर्ट, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सैटेलाइट इंटेलिजेंस, ड्रोन कवर और भारी ट्रांसपोर्ट सब चाहिए होगा. और यही वजह है कि अमेरिका अभी सोच में है.

ईरान अगर यूरेनियम नहीं देता तो आगे क्या?

इस केस में तीन रास्ते बनते हैं.

  • रास्ता 1- डील और निगरानी: ईरान कुछ शर्तों पर IAEA को जांच दे दे और enrichment रोक दे.
  • रास्ता 2- सीमित सैन्य हमला: अमेरिका या इजरायल कुछ ठिकानों पर हमला करे, लेकिन जमीन पर न जाए.
  • रास्ता 3- फुल वॉर: अमेरिका ऑपरेशन करे, ईरान जवाब दे, और पूरा क्षेत्र युद्ध में झुलस जाए.

तीनों में सबसे कम नुकसान वाला रास्ता पहला है. लेकिन राजनीति अक्सर नुकसान वाले रास्ते पर ही चलती है.

ये भी पढ़ें: ईरान के फतेह-2 और खैबर ने इजरायल में मचाई तबाही, आयरन डोम की 'ढाल' तक चीर डाली

400 किलो यूरेनियम दुनिया का सबसे महंगा डर बन गया है

400 किलो सुनने में छोटा लगता है. लेकिन ये 400 किलो उस स्तर पर है जहां से दुनिया का नक्शा बदल सकता है. अमेरिका को डर है कि ईरान एक दिन अचानक परमाणु शक्ति बन जाएगा.

ईरान को डर है कि अगर उसने झुकना सीख लिया तो उसकी संप्रभुता खत्म हो जाएगी. और दुनिया को डर है कि मिडिल ईस्ट में एक चिंगारी उठी तो आग वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच जाएगी.

आसान भाषा में कहें तो ये कहानी ऐसी है जैसे दो पहलवान अखाड़े में खड़े हों और बीच में एक बारूद की बोरी रखी हो. कोई भी पहला हाथ उठाएगा, तो धमाका सिर्फ दोनों का नहीं होगा. दुनिया का होगा.

और यही वजह है कि 400 किलो यूरेनियम आज सिर्फ ईरान का स्टॉक नहीं है. यह पूरी दुनिया के लिए टाइम बम बन चुका है. 

वीडियो: ईरान-इजरायल जंग के बीच UN के पीसकीमर की लेबनान में कैसे हुई मौत?

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