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कान फिल्म फेस्टिवल में हम कहां?

भारत से किसका सेलेक्शन हुआ. कब हुआ. कौन जीता. और कौन आपको मूरख बना रहा है. खबर लें.

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IMAGE : REUTERS

ऐश्वर्या राय का कान में पंद्रहवा साल ऐश्वर्या राय की 'सरबजीत' की कान में रंगारंग स्क्रीनिंग अनुराग कश्यप की 'रमण राघव 2.0' कान में चुनी गई भारत की कोई फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल में चयनित नहीं हुई नवज़ुद्दीन सिद्दीकी की कान में आठवीं फिल्म टेंटों में चलनेवाली फिल्मों पर बनी डाक्यूमेंट्री 'दी सिनेमा ट्रेवेलर्स' का नाम सुना है?

ये तमाम ख़बरें, हेडलाइंस, सवाल इस समय कान फिल्म फेस्टिवल के नाम पर मुख्यधारा मीडिया और सोशल मीडिया में घूम रहे हैं. कान फिल्म समारोह भारतीय मीडिया और सिनेमा के चाहनेवालों के लिए गूंगे का गुड़ बन गया है. सब इसके अपने अपने अर्थ निकाल रहे हैं. पहली बात तो ये कि कान में होनेवाली बहुत सारी स्क्रीनिंग की खबर दरअसल फेस्टिवल में चयन की खबर नहीं होती, जैसा 'सरबजीत' के साथ हुआ है. यह सिर्फ प्रायोजकों और निर्माताओं की अपनी फिल्म के प्रचार के लिए की गई कोशिशों का एक हिस्सा है. इसी तरह बहुत सारे फ़िल्मी सितारे भी जो कान के रेड कार्पेट पर नज़र आते हैं, वो दरअसल उनके प्रायोजकों की वजह से है, जिनका कान फिल्म फेस्टिवल के आयोजन में बड़ा हिस्सा है. ऐश्वर्या राय और सोनम कपूर का नाम इसी क्रम में आता है. जबकि अभिनेता नवाज़ की आधे दर्जन से ज्यादा फिल्में कान फिल्म फेस्टिवल और उसके सहयोगी विभिन्न खण्डों में बीते सालों में चयनित हुई हैं. भारत के मुखर मीडिया में अगर आप कान फिल्म फेस्टिवल की ख़बरें देखें तो ये पता चलने की संभावना बहुत कम है कि दो जवान भारतीय नौजवानों की महाराष्ट्र में ख़तम होती टेंट सिनेमा की परंपरा पर बनाई डाक्यूमेंट्री 'दी सिनेमा ट्रेवेलर्स' इस साल कान फिल्म फेस्टिवल में भारत की चुनिंदा प्रतिनिधि फिल्मों में से एक है.
ये कान का हल्ला क्या है? असल में वो कौनसी भारतीय फिल्में हैं, जिन्हें सच में कान के मंच पर सम्मान मिला. जिनका बाकायदे फेस्टिवल में चयन हुआ.
आइये सबसे पहले यह स्वीकार करें की कान जैसे चर्चित यूरोपीय फिल्म फेस्टिवल में भारत आज भी एक हाशिये का देश है. हमारे सिनेमा की स्वीकार्यता विश्व सिनेमा में कला माध्यम के तौर पर हालांकि बढ़ रही है, लेकिन आज भी सीमित है. इसका एक सीधा प्रमाण तो ये है कि प्रतियोगिता खंड में भारतीय फिल्मों का चयन नई सदी में मुश्किल खेल बन गया है. लेकिन पिछली शताब्दी में कई फिल्में रहीं जिनका प्रतियोगिता खंड में मुकाबला रहा. क्या है ये प्रतियोगिता खंड? सबसे ख़ास है प्रतियोगिता खंड जहाँ बीस फिल्में चुनी जाती हैं, जो प्रतियोगिता के सबसे बड़े पुरस्कार 'पाल्म डे'ओर' (गोल्डन पाल्म) के लिए मुकाबला करती हैं. पिछले साल ये पुरस्कार फ्रेंच फिल्म 'धीपन' को मिला था. 'धीपन' श्रीलंका के गृहयुद्ध और तमिल आबादी के विस्थापन की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म थी, और इसकी कुछ शूटिंग भारत में भी हुई थी. कुछ भारतीय अभिनेताओं ने इसमें छोटे रोल भी निभाये. लेकिन ये तो बहाने से नाम जोड़ना हुआ.
अधिकृत रूप से भारत का नाम इस पुरस्कार के साथ जुड़े पांच दशक से ज्यादा बीत चुके हैं. चेतन आनंद की 'नीचा नगर' का नाम कान फिल्म फेस्टिवल से जुड़ा, जब उन्हें 1946 में द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद पहले फिल्म समारोह में यह सर्वोच्च पुरस्कार दिया गया.
हालाँकि उस साल कई फिल्मों को सयुंक्त रूप से 'गोल्डन पाल्म' मिला था, विश्वयुद्ध के छूटे सालों में जो पुरस्कार नहीं मिल पाया, उन्हें शामिल करते हुए. 'नीचा नगर' इप्टा के कॉमरेड साथियों का प्रयास था, जिसकी कहानी गोर्की के नाटक 'लोवर डेप्थ्स' से प्रेरित थी. पचास के दशक में राज कपूर की 'आवारा', व्ही शांताराम की 'अमर भूपाली' जैसी फिल्में प्रतियोगिता खंड में चयनित होती रहीं. नीचा नगर - चेतन आनंद (1946), अपूर भूपाली - व्ही शांताराम (1952), आवारा - राज कपूर (1953), दो बीघा ज़मीन - बिमल राय (1954), मयूरपंख - किशोर साहू (1954), बिराज बहू - बिमल राय (1955), शेवग्याच्या शेंगा - शांताराम अठावले (1956), पारस पत्थर - सत्यजित रे (1958), लाजवंती - नरेंद्र सूरी (1959), सुजाता - बिमल राय (1959), देवी - सत्यजित रे (1959), मुझे जीने दो - मोनी भट्टाचार्या (1959), गरम हवा - एम एस सथ्यू (1973), निशांत - श्याम बेनेगल (1976), एक दिन प्रतिदिन - मृणाल सेन (1980), घरे बायरे - सत्यजित रे (1984), जेनेसिस - मृणाल सेन (1986), स्वाहम - शाजी करुण (1994) प्रतियोगिता खंड से बाहर भी फिल्में चुनी जाती हैं, जिनकी स्क्रीनिंग भी 'लूमियर थियेटर' में ही होती है. इसकी भी बड़ी इज़्ज़त है. इस साल फेस्टिवल की ओपनिंग फिल्म वुडी एलन की 'कैफे सोसाइटी' इसी आउट-ऑफ़-कम्पटीशन सेक्शन का हिस्सा है. सत्यजित रे की 'गणशत्रु' से लेकर संजय लीला भंसाली की 'देवदास' तक एकदम भिन्न फिल्में कान में 'आउट ऑफ़ कम्पटीशन सेक्शन में स्क्रीन हो चुकी हैं. मृणाल सेन की 'खारिज' ने 1983 में आउट ऑफ़ कम्पटीशन खंड में जूरी पुरस्कार भी हासिल किया.
कान में पुरस्कारों में 'भारत' का नाम कई बार आया है, जिनमें पहला और सर्वोच्च पुरस्कार 'नीचा नगर' ने हासिल किया था. इसके बाद 1955 में 'बूट पॉलिश' में शानदार अभिनय के लिए बेबी नाज़ ने स्पेशल मेंशन पुरस्कार जीता. सत्यजित रे की पाथेर पांचाली ने भी 1956 में 'बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट' के लिए 'गोल्डन पाल्म' हासिल किया.
कान में गोल्डन पाल्म के अलावा सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म के लिए कैमरा डे'ओर पुरस्कार दिया जाता है. मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' (1988) और मुरली नायर की 'माराना सिंहासनम' (1999) ने यह पुरस्कार जीता है. शाजी करुण की 'पीरावी' ने भी 1989 में गोल्डन कैमरा पुरस्कार के लिए स्पेशल मेंशन हासिल किया. पिछले साल 'मसान' ने आलोचकों द्वारा दिया जाने वाला पुरस्कार हासिल किया था. साल 1978 में इंट्रोड्यूस हुआ 'अन सर्टेन रिगार्ड' भारतीय सिनेमा के लिए ख़ास सेक्शन रहा. यह भी कान फिल्म फेस्टिवल के ऑफिसियल सेलेक्शन का हिस्सा है. लेकिन इसकी नज़र हमेशा 'मौलिक' और 'भिन्न' किस्म के सिनेमा पर रहती है. भारतीय सिनेमा का बाकी प्रचलित सिनेमा से अलग होना शायद यहाँ उतना अजीब नहीं माना गया, और नियमित रूप से भारतीय फिल्में फेस्टिवल का हिस्सा बनने लगीं. 'सतह से उठता आदमी' - मणि कौल (1981) 'इलिपत्तयम' - अडूर गोपालकृष्णन (1982) 'खंडहर' - मृणाल सेन (1984) 'अंतरजली जात्रा' - गौतम घोष (1988) 'दी चोज़न वन' - अनिर्बन श्याम शर्मा (1991) 'दी ब्रोकन जर्नी' - संदीप राय (1994) 'इंद्राधनुरा छाई' - सुसांत मिश्रा (1995) 'लूलू' - श्रीनिवास कृष्णा (1996) 'गुड़िया' - गौतम घोष (1996) 'वानप्रस्थम' - शाजी करुण (1999) 'उड़ान' - विक्रमादित्य मोटवाने (2010) 'मिस लवली' - अशीम अहलूवालिया (2011) 'तितली' - कनु बहल (2014) 'मसान' - नीरज घेवान (2015) 'चौथी कूट' - गुरविंदर सिंह (2015) udaan कान फिल्म फेस्टिवल के साथ ही दो पेरेलल फेस्टिवल भी आयोजित होते रहे हैं, जिन्हें कान के वृहत आयोजन का हिस्सा माना जाता है. इनके नाम हैं 'डायरेक्टर्स फोर्थनाईट' और 'इंटरनेशनल क्रिटिक्स वीक'. ये भी तगड़े प्रतियोगी खंड हैं, जिन्हें विश्व सिनेमा में बहुत इज़्ज़त हासिल है. 'इंटरनेशनल क्रिटिक वीक' 1962 में फ़्रांस के आलोचकों ने शुरू किया था. इसकी खासियत है कि यह विश्व भर से पहली या दूसरी फिल्म निर्देशित करने वाले निर्देशकों की फिल्मों का चयन करता है. कई बड़े निर्देशकों को विश्व मंच कर पहली बार इंट्रोड्यूस करने का श्रेय इसे ही जाता है, जैसे वोंग कार वाई, बर्नार्डो बेर्तोलुच्ची, गेस्पर नो, एलेजान्द्रो गोंज़ालेज़ इनरेत्तु. इस ख़ास सेलेक्टिव हिस्से में सात फीचर फिल्में और सात शार्ट फिल्में शामिल की जाती हैं.
भारत का 'इंटरनेशनल क्रिटिक वीक' में प्रतिनिधित्व - 'ट्रू लव स्टोरी' - गीतांजलि राव, 'दी लंचबॉक्स' - रितेश बत्रा, 'पैडलर्स' - वासन बाला, 'घटोत्कच्छ' - राव सिंगीतम, 'प्रिंटेड रेनबो' - गीतांजलि राव, 'हरि विल्लू' - बी नरसिंह राव, 'दी लव चैरियट' - राव सिंगीतम
दूसरा पैरेलल फेस्टिवल है 'डायरेक्टर्स फोर्थनाईट', जिसका आयोजन 1969 में हड़ताल कर रहे मजदूरों के समर्थन में फेस्टिवल स्क्रीनिंग्स के रुक जाने की वजह से शुरू हुआ था. बीते सालों में यह भी कान का मज़बूत सहयोगी बनकर उभरा है, और अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ़ वासेपुर' और इस साल 'रमण राघव 2.0' भी इसी का हिस्सा रही हैं. इसके अलावा स्पेशल स्क्रीनिंग्स हैं. जैसे 'मिडनाइट स्क्रीनिंग्स' जिसमें अमित कुमार की 'मानसून शूटआउट' की स्क्रीनिंग हुई थी. कान क्लासिक्सभी फेस्टिवल का एक और प्रतिष्ठित हिस्सा है. इसमें ही कुछ साल पहले उदय शंकर की 1948 की 'कल्पना' की रिस्टोर वर्जन स्क्रीन हुआ था. यहीं इस साल 'दी सिनेमा ट्रेवेलर्स' स्क्रीन हो रही है. निर्देशक अमित मधेशिया और शर्ली अब्राहम की सात-आठ साल की मेहनत का नतीजा. भारत में लुप्त हो रही टेंट में सिनेमा दिखाने की कल्चर को डॉक्यूमेंट करती फिल्म. इस खंड में सिनेमा उद्योग और उसके नास्टैल्जिया से जुड़ी फिल्में स्क्रीन की जाती रही हैं.

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