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2047 का भारत सिर्फ GDP से नहीं बनेगा, बूढ़ी होती आबादी, AI और Climate Change राज्यों का बजट कैसे बदलेंगे?

2047 तक भारत के विकसित देश बनने की यात्रा में राज्यों के बजट की भूमिका बेहद अहम होगी. बूढ़ी होती आबादी, AI, बदलती तकनीक, तेजी से बढ़ते शहर और जलवायु जोखिम आने वाले वर्षों में राज्यों के खर्च की प्राथमिकताएं बदल सकते हैं. जानिए इन चार बड़े बदलावों का सरकारी बजट और विकास पर क्या असर पड़ेगा.

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2047 में भारत सरकार को कहां-कहां ज्यादा खर्च करना होगा (Courtesy: AI)

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  • भारत सरकार ने सितंबर 2026 में राज्य वित्त मंत्रियों की बैठक से पहले एक पृष्ठभूमि पत्र साझा किया है जिसमें 2047 तक राज्यों के वित्तीय दबावों और विकास आवश्यकताओं पर विस्तार से सुझाव दिए गए हैं।
  • जनसंख्या में वृद्धावस्था की वृद्धि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और जलवायु जोखिम के कारण राज्यों को स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं, पेंशन और बुनियादी ढांचे में अधिक खर्च करना होगा जिससे बजट पर दबाव बढ़ेगा।
  • इस पृष्ठभूमि से यह अनुमान लगाया गया है कि राज्यों को राजस्व बढ़ाने, कर अनुपालन सुधारने और गैर-कर आय के साधनों को बढ़ावा देने की जरूरत होगी ताकि बढ़ते खर्चों को पूरा किया जा सके।

भारत जब 2047 में विकसित देश बनने की तरफ देख रहा है, तब सबसे बड़ा सवाल सिर्फ ये नहीं है कि अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी होगी. असली सवाल ये भी है कि उस समय सरकारें अपना पैसा कहां खर्च कर रही होंगी. स्कूल, अस्पताल, सड़क और सिंचाई जैसी पारंपरिक जरूरतें तो रहेंगी ही, लेकिन इनके साथ कुछ ऐसे खर्च भी तेजी से बढ़ सकते हैं जिनका दबाव आज राज्यों के बजट में उतना दिखाई नहीं देता.

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सितंबर 2026 में राज्य वित्त मंत्रियों की बैठक से पहले केंद्र सरकार की ओर से साझा किए गए एक पृष्ठभूमि पत्र ने इसी बदलाव की तरफ ध्यान खींचा है. भारतीय रिजर्व बैंक के आर्थिक और नीति अनुसंधान विभाग की शोधकर्ता संगीता दास और वी. धन्या के इस पत्र में जनसंख्या की बढ़ती उम्र, तकनीकी बदलाव और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI), शहरीकरण और जलवायु जोखिम को आने वाले वर्षों में राज्यों के वित्त पर असर डालने वाले बड़े कारकों के रूप में रेखांकित किया गया है.

2047 का लक्ष्य सिर्फ जीडीपी की रफ्तार का सवाल नहीं

विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए भारत को लंबे समय तक करीब 8 फीसदी की वास्तविक सालाना आर्थिक वृद्धि की जरूरत होगी, ऐसा इस पृष्ठभूमि पत्र में अनुमान दिया गया है. लेकिन आर्थिक वृद्धि सिर्फ केंद्र सरकार के फैसलों से नहीं आएगी.

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भारत के सामान्य सरकारी खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी करीब दो-तिहाई है. यानी देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, शहरी सेवाओं, सामाजिक सुरक्षा और बड़ी संख्या में दूसरी सार्वजनिक सेवाओं पर होने वाले खर्च का बड़ा हिस्सा राज्यों के बजट से आता है. इसलिए 2047 की आर्थिक कहानी का एक बड़ा हिस्सा राज्यों के वित्तीय फैसलों से तय होगा.

यहीं से कहानी दिलचस्प होती है. आने वाले वर्षों में राज्यों को एक साथ कई मोर्चों पर पैसा लगाना होगा. कुछ खर्च पुराने होंगे, लेकिन उनकी मात्रा बढ़ेगी. कुछ बिल्कुल नए तरह के खर्च होंगे.

पहला दबाव: आज जवान भारत, कल बूढ़ा भारत

भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत लंबे समय तक उसकी युवा आबादी रही है. लेकिन जनसंख्या की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है.

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पृष्ठभूमि पत्र के मुताबिक भारत की मध्य आयु यानी Median Age मौजूदा करीब 29 साल से बढ़कर 2047 तक 37 साल हो सकती है. इसी दौरान वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात 2026 के 11.1 फीसदी से बढ़कर 2047 में करीब 20 फीसदी होने का अनुमान है. आसान भाषा में समझें तो काम करने वाली आबादी के मुकाबले बुजुर्गों की संख्या का दबाव बढ़ेगा.

इसका सीधा असर राज्य के बजट पर पड़ेगा. बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी तो स्वास्थ्य सेवाओं, वृद्ध देखभाल और पेंशन जैसे खर्चों की जरूरत भी बढ़ सकती है. खासकर उन राज्यों में जहां जनसंख्या पहले ही तेजी से बूढ़ी हो रही है.

लेकिन दूसरी तरफ कम उम्र वाली आबादी वाले राज्यों की चुनौती अलग होगी. वहां सरकारों को स्कूल, पोषण, कौशल विकास और रोजगार से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं पर ज्यादा खर्च करना होगा. यानी भारत के सभी राज्यों का भविष्य एक जैसा नहीं होगा. किसी राज्य का सबसे बड़ा खर्च अस्पताल और पेंशन हो सकता है, तो किसी दूसरे राज्य के लिए स्कूल और कौशल विकास ज्यादा जरूरी हो सकता है.

दूसरा दबाव: AI आएगा तो सिर्फ नौकरियां नहीं बदलेंगी

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) यानी AI को आम तौर पर निजी कंपनियों और रोजगार के नजरिये से देखा जाता है. लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. सरकारों को भी बदलती तकनीक के हिसाब से अपनी सेवाओं और कर्मचारियों को तैयार करना होगा.

स्वचालन और AI से श्रम बाजार में बदलाव आएगा तो कौशल विकास पर सरकारी खर्च बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है. ऐसे समय में सिर्फ ज्यादा लोगों को शिक्षा देना पर्याप्त नहीं होगा. शिक्षा की गुणवत्ता, नए कौशल और डिजिटल बुनियादी ढांचे पर भी निवेश जरूरी होगा.

तकनीक सरकार के खर्च को कम करने का साधन भी बन सकती है. डिजिटल ढांचे के इस्तेमाल से सरकारी सेवाओं की पहुंच बेहतर हो सकती है और योजनाओं में दोहराव तथा रिसाव कम किया जा सकता है. पृष्ठभूमि पत्र में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी DBT को इसका एक उदाहरण बताया गया है.

इसलिए AI की कहानी सिर्फ मशीन बनाम इंसान की कहानी नहीं है. ये सरकारी बजट में कौशल, डिजिटल ढांचे और सेवा वितरण के नए खर्च की कहानी भी है.

तीसरा दबाव: मौसम बदलेगा तो बजट भी बदलेगा

बाढ़, गर्मी की लहर, सूखा और दूसरी चरम मौसमी घटनाएं अब सिर्फ आपदा प्रबंधन विभाग की समस्या नहीं रह गई हैं. इनके असर से सड़क, पुल, पानी की व्यवस्था, खेती और शहरों का बुनियादी ढांचा प्रभावित होता है.

मतलब साफ है. किसी राज्य में एक बड़ी बाढ़ आती है तो सरकार को राहत और पुनर्वास के अलावा सड़क, पुल, सिंचाई व्यवस्था और दूसरी सार्वजनिक संपत्तियों की मरम्मत पर भी पैसा लगाना पड़ सकता है.

इसी वजह से पृष्ठभूमि पत्र में जलवायु जोखिम को सामान्य बजट योजना का हिस्सा बनाने की जरूरत बताई गई है. इसमें Climate Budget Tagging और Green Budgeting जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. षि, पानी, शहरी व्यवस्था और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचे पर खर्च आने वाले वर्षों में राज्यों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है.

चौथा दबाव: भारत शहरों में जाएगा तो खर्च भी शहरों में बढ़ेगा

भारत के विकास की अगली कहानी तेजी से बढ़ते शहरों से भी जुड़ी है. शहरों में आबादी बढ़ने का मतलब सिर्फ ज्यादा मकान नहीं है.

ज्यादा लोगों के लिए सार्वजनिक परिवहन चाहिए. पानी की आपूर्ति बढ़ानी होगी. सीवर व्यवस्था का विस्तार करना होगा. कचरा प्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाएं और आवास जैसी सुविधाओं पर भी खर्च बढ़ेगा. यानी शहरीकरण जितना तेज होगा, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों के सामने बुनियादी सेवाओं की मांग उतनी ही बढ़ेगी. अगर ये निवेश समय पर नहीं हुआ तो शहर आर्थिक गतिविधि के केंद्र बनने के बजाय बुनियादी सुविधाओं के दबाव से जूझ सकते हैं.

सबसे बड़ी चुनौती: पैसा आएगा कहां से?

सवाल सिर्फ खर्च बढ़ने का नहीं है. सवाल ये भी है कि राज्यों के पास उस खर्च के लिए पर्याप्त पैसा होगा या नहीं.

पृष्ठभूमि पत्र में राज्यों के सामने सीमित राजस्व, ऊंचे कर्ज और बढ़ते खर्च के दबाव की ओर ध्यान दिलाया गया है. राज्यों से कर आधार बढ़ाने, कर अनुपालन सुधारने और गैर-कर राजस्व तथा सार्वजनिक संपत्तियों का बेहतर इस्तेमाल करने की जरूरत बताई गई है. 2021-22 से 2025-26 के बजट अनुमान तक राज्यों की अपनी राजस्व उछाल दर औसतन 1.4 रही, जबकि पिछले दशक में राज्यों के समेकित अपने कर राजस्व में 11.6 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई.

यहीं असली वित्तीय चुनौती सामने आती है. अगर स्वास्थ्य, पेंशन, कल्याण और दूसरी नियमित जरूरतों पर खर्च तेजी से बढ़ता है, तो सड़क, सिंचाई, परिवहन और दूसरे पूंजीगत निवेश के लिए पैसा बचाना मुश्किल हो सकता है.
2047 की कहानी में राज्य सबसे अहम कड़ी क्यों हैं?

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2047 का विकसित भारत सिर्फ बड़ी जीडीपी, बड़े उद्योग और बड़े निर्यात से नहीं बनेगा. उस भारत में करोड़ों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल, सुरक्षित शहर, विश्वसनीय पानी और जलवायु जोखिम से सुरक्षित बुनियादी ढांचा भी चाहिए होगा.

इसलिए आने वाले वर्षों में राज्यों के बजट का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है. आज जहां बजट की बहस अक्सर सड़क, बिजली, सब्सिडी और कल्याण योजनाओं के आसपास दिखाई देती है, वहीं अगले दो दशकों में उम्रदराज आबादी, AI से बदलता रोजगार, शहरों का विस्तार और जलवायु जोखिम भी बजट की दिशा तय कर सकते हैं.

2047 का भारत कितना समृद्ध होगा, इसका जवाब सिर्फ जीडीपी के आंकड़े में नहीं मिलेगा. ये भी देखना होगा कि सरकारें उस बढ़ती अर्थव्यवस्था का पैसा किन जरूरतों पर खर्च करती हैं और बदलती आबादी, तकनीक, शहरों और मौसम के लिए कितनी पहले से तैयारी करती हैं.

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